जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । वर्तमान में हिन्दी आशुलिपिक के पद पर पटना में कार्यरत । बेझिझक सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करना । अपनी मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

सुविचार

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24 जून 2019

सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” सिस्टम की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने के संबंध में ।


सेवा में,
माननीय ......................................
.....................................................
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ
             सिस्टम की जगह  प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने के संबंध
             में ।
महोदय,
          सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति उच्च योग्यता वाले पद को भरने में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने की मांग करते हैं ।
1.                                   महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई (C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E) बोर्ड के औसत छात्रों से भी 20% तक कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है ।
2.                                   महोदय, बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65% पर गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक सामान्य छात्र भी 80% तक अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.                                   महोदय, बिहार में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.                                   महोदय, डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है । फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
अतः हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा भर्ती कराने की कृपा करें, ताकि बिहार के सभी विद्यार्थियों को इस नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें।
                                                                            निवेदक
बिहार के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं
         

26 मई 2019

सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” प्रणाली की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं डोमिसाइल नीति लागू करने के संबंध में ।

सेवा में,
माननीय...................
बिहार
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ
             सिस्टम की जगह  प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं
             डोमिसाईल नीति लागू करने के संबंध में ।
महोदय,
          सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति उच्च योग्यता वाले पद को भरने में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने एवं बिहार की अपनी डोमिसाईल नीति लागू करने की मांग करते हैं ।
1.                                   महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई (C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E) बोर्ड के औसत छात्रों से भी 20% तक कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है ।
2.                                   महोदय, बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65% पर गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक सामान्य छात्र भी 80% तक अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.                                   महोदय, बिहार में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.                                   महोदय, डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है । फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
5.                                   महोदय, मध्यप्रदेश, ओडिसा, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश आदि अन्य अनेक राज्य खुली प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करवाते है एवं अपने-अपने राज्य का डोमिसाईल नीति भी लागू करते है, जिससे वहां के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा अवसर मिलता है, उसी तरह हमारा राज्य बिहार से भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति की उम्मीद करते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो सके, साथ ही अपने राज्य की डोमिसाईल नीति को लागू किया जाये, जिससे यहाँ के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें ।
6.                                   महोदय, बिहार में अब तक जितने सहायक प्रोफेसर की भर्ती हुई है, उसमें बिहार के बाहर के विद्यार्थी ज्यादा से ज्यादा नियुक्त हुए हैं । वें एक बार नियुक्त तो होते हैं पर इस ताक में रहते हैं कि अपने स्टेट में किस तरह जाऊं, वे मन से यहां ड्यूटी भी नहीं करते हैं और अततः वें यहाँ के भैकेन्सी बर्बाद कर अपने स्टेट चले जाते हैं । अगर डोमिसाईल नीति लागू होता है तो बिहार के विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और वे मन से यहां ड्यूटी भी करेंगे । कहीं और जगह जाने की ताक में भी नहीं रहेंगे ।
7.                                    महोदय, हमलोग अहिंदी-भाषी राज्यों में जा ही नहीं सकते, क्योंकि वे मूल भाषा का ज्ञान माँगते हैं और बाकि बचे हुए हिंदी-भाषी राज्य भी मूल निवासियों को प्राथमिकता देते हैं । यहाँ तक कि राज्य के बाहर के छात्रों के लिए उम्र अत्यंत कम रखी जाती है । ऐसे में हम बिहारी छात्र जाएँ तो कहाँ जाएँ? क्या मज़दूर बनने को ही हम अपनी नियति मान लें? महोदय, अगर डोमिसाईल नीति लागू होती हैं तो यहाँ के छात्रों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और यहाँ के बेरोजगार युवकों की समस्या भी दूर होगी ।
अतः हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा भर्ती कराने एवं बिहार की अपनी डोमिसाईल नीति लागू करने की कृपा करें, ताकि बिहार के निवासी को इस नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें ।
                                                                             निवेदक
बिहार के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं
         

6 मई 2019

रिश्ते, समाज और हम


कहा जाता है कि रिश्ते और परिवार समाज की अहम डोर होते हैं । जब नये-नये रिश्ते जुड़ते है तो नये समाज का निर्माण होता है । आधुनिकता के इस दौर में भौतिकता के चक्कर में समाज निर्माण की कार्य-गति धीमी पड़ती जा रही है । नित्य नये रिश्ते तो जुड़ रहे हैं, लेकिन पुराने रिश्ते में धीरे-धीरे दरार पैदा हो रही है । भौतिक साधनों की प्राप्ति में हम इस कदर व्यस्त हो चुके हैं कि किसी के पास बातचित और मिलने-जुलने की फुर्सत नहीं । जबकि आज बातचित का सबसे आसान और सस्ता साधन सबके पास उपलब्ध है ।
      हमारे समाज में ऐसे कई मौके आते है जिसमें मिलने-जुलने का अवसर मिलता है जैसे- शादी-विवाह, बर्थ-डे पार्टी, मैरेज एनिवर्सरी, गृह-प्रवेश, मुंडन समारोह, मृतक-भोज कार्यक्रम तथा पर्व-त्योहार । यह वह वक्त होता है जिसमें आप अगर सरकारी कार्यालय में भी कार्यरत हो तो छुट्टी मिलने की गुजाईश रहती है ।
      अभी शादी-विवाह का मौसम चल रहा है । यह वह समय है जब एक-दूसरे रिश्तेदारों से भेट-मुलाकात हो सकता है । इस समारोह में जाने से नये दोस्त और नये रिश्तेदारों के साथ अपने पुराने दोस्त, पास-पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिलकर खोयो आत्मीय रिश्तों को रिचार्ज कर सकते हैं । रिश्तों में दरार का एक ही कारण हो सकता है- आपसी मन-मुटाव या अपने आप को बड़ा महसुस करना, जिसे अहम भाव पैदा हो जाना भी कह सकते हैं । जब दो रिश्तों के बीच जब अहम भाव पैदा हो जायेंगे या मन-मुटाव कायम रहता तो इन आत्मीय रिश्तों को कभी रिचार्ज नहीं कर पायेगे और इस डोर को जुड़ने का फिर से वर्षों इंतजार करना पड़ेगा ।
      रिश्तेदारों और पड़ोसियों में टकराव इस कदर हो रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर मुंह मोड़ लिया जा रहा है । जिस किसी व्यक्ति का गाँव-घर उसके कार्यस्थल से एक-दो किलोमीटर दूर है वो पारिवारिक कलह की वजह से कार्य-स्थल का सफर पाँच-सात किलोमीटर दूर से जाना मुनासिब समझ रहा है, लेकिन पारिवारिक कलह को दूर करने का कोई प्रयास नहीं कर पा रहा है ।
      कई परिवार तो मुझे ऐसे मिले जो पास-पड़ोस और परिवार में बदले माहौल की वजह से अपने बच्चे और खुद गाँव-घर से दस-बीस किलोमीटर दूर रहते हैं । वहीं से घर आकर अपनी खेती-गृहस्थी की देखभाल करते और परिवार चलाते है । उनका कहना यहीं होता है कि गाँव-घर का माहौल बदला हुआ है । पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, जब एक-दूसरे से प्रेम पूर्वक मिलना जुलना होता था, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे, आज यह प्रचलन लगभग खत्म हो रहा है ।
      आखिर रिश्ते, रिश्तेदार, गाँव-घर में बदले माहौल के लिए कौन जवाबदेह है ? उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है ? कोई इसे सुधार करने के लिए आगे क्यों नहीं आ पा रहा है ? हमारे समाज में हर तरह की व्यवस्थायें मौजूद है, वो भी पहल क्यों नहीं कर पा रहा है ? हम कब तक इंतजार करेंगे, कही ऐसा न हो इंतजार करते-करते इतना देर हो जाए कि फिर इन्हें सुधरने की गुजाईश ही न हो । कहीं हमारे अकेले मस्त रहने की आदत हम पर ही भारी न पड़ने पड़ जाये ।


30 अप्रैल 2019

फिर चल दिये हम कहाँ, तुम कहाँ...


     इस धरती का वो नमुना व्यक्ति जिसे आज तक किसी लड़की से प्यार नहीं हुआ । जिसने प्यार शब्द के बारे में दूर-दूर तक सोचा भी नहीं था और जिसे प्यार शब्द से भी चिढ़ था । उसे गाँव से शहर आते ही आज से लगभग 15 वर्ष पहले एक अनजानी परी से मुलाकात हुई । देखते- देखते पल भर तो ठिठका, पर वो पहला प्यार, न जाने कब हो गया, पता नहीं, पहली नजर में अपना होश खो बैठा । वो चुलबुली, हँसती-खिलखिलाती अपने सहेलियों संग मस्तियों में मशगुल । मैं देहात के साधारण-सा लड़का, वो शहर की हसीन छोरी । अपने दिल की बात तो दूर, चंद बाते करने की हिम्मत नहीं पर उस दिन के बाद हर पल हर वक्त उसकी यादों में खोया रहता । उससे मिलना लगभग रोज हो ही जाता था । दिल की बात तो नहीं कह पाता, पर उसकी याद ख्वाबों में संजोये रहता । मै भी किसी न किसी बहाने जरूर मिल लेता । अब मेरा दिल हर बार उससे मिलने को बेताब रहता, जब वो नहीं आती तो घंटों इतजार करता ।
दुर्भाग्य से मेरा जॉब दूसरे शहर में हो गया । अब दिन-रात बेचैन । इधर-उधर, पार्क में घंटो बैठा, उसके साथ गुजरे पल को याद करता । इश्क की तड़पन और दिल की धड़कन बढ़ गई थी, होठ खामोश थे, पर इस कातिल का उम्मीद जिंदा था क्योंकि मैं उससे सच्चा प्यार करता था। अब ऑफिस से छुट्टी के बाद एस्कॉन टेम्पल जाकर राधा-कृष्ण की मूर्तियों को निहारता । आज मेरी राधा मुझसे जुदा थी, बाते बिल्कुल बंद थी । एक दिन एक अनजान कॉल ने फिर से दिल में खलबली पैदा कर दी, अब धीरे-धीरे दिल खुलकर बाते होने लगी । ऑफिस खत्म होते ही साढ़े पाँच बजे रोज उसका फोन आ जाता, वो भी मेरे ऑफिस खत्म होने का इंतजार करती । कभी-कभी तो लंच आवर में भी घंटो बात होती । मैं तो उसके लंच आवर लड़की और साढ़े-पाँच बजे वाली लड़की ही कहता । ऑफिस से निकलने में देर होते ही, मिस-क़ॉल की सुनामी आ जाती । फिर क्लास शुरू, कहाँ थे ? क्या कर रहे थे ? तरह-तरह की बाते... मजाक- मजाक में कभी-कभार उसे चिढ़ाने के लिए किसी और को भी अपनी जिंदगी में होने की बात करता, पर हो एक बहाना था । वो एक नायाब नमुना, मेरी जिंदगी में अकेली और अजुबा थी । एक बार तो ऐसा हुआ कि मैं ऑफिस के कार्य में ज्यादा व्यस्त था । उसने फोन की तो मैं गुस्से से झूझलाकर कहाँ- मुझे तुमसे बात नहीं करना, उसने भी कहाँ, ठीक है आज से बात नहीं करेंगे । दस मिनट बाद ही उसने रोते हुए कॉल किया, कहा- आज से हम गुस्सा नहीं करेंगे, आप जब कहियेगा तब ही कॉल करेगे । उस दिन मुझे पता चल गया कि कितना प्यार करती है वो मुझसे !
      वक्त में मोड़ आया, जब हम अपनी एक छोटी- सी गलती की वजह से अलग हो गये. जॉब का घमंड, भौतिकता के मद में चूर । दोषी खूद मैं । वो हर-बर मुझे अपनाने को तैयार मैं परिस्थितिवस ना-ना करता रहा । मैं डिसीजन लेने में चुक गया । आज दुसरी जीवन संगिनी आने के बाद भी उसकी यादों में खोया रहना, अपने को गलत डिसीजन के लिए कोसना, कभी-कभार सोचते-सोचते आंसु आ जाना । पर अब देर हो चुकी थी, वो किसी और की हो चुकी थी । आज जब ऑफिस में काम करता हूँ, मोबाईल चालू कर, यू-ट्यूब से उसी याद में दर्द भरे गाने सुनकर दिल बहलाता । जिंदगी की वो छोटी सी गलती मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी । आज भी मैं उससे संपर्क में तो हूँ पर मैं किसी की जिंदगी को बिखेरना नहीं चाहता,  किसी की खुशियाँ छिनना नहीं चाहता । आज मैं वाट्सएप्प पर रोज ऑनलाईन तो देखता हूँ, पर चंद बाते दिल की नहीं लिख सकता, क्यों ? क्योंकि अब वो किसी और की है । पर उसके वाट्सएप्प की बार-बार बदलते डीपी और स्टेट्स से संतोष करता हूँ । बस इंतजार है अगले जन्म का कि अगली बार ऐसी गलत डिसीजन  नहीं लूंगा, चाहे मुझे दुनिया से लोहा लेना पड़े । क्योंकि प्यार क्या होता है, वो बिछड़ने के बाद पता चलता है ? हम दोनों एक तो नहीं हो सके, पर राधा-कृष्ण की भाँति दोनों एक-दूसरे से प्रेम से जुड़े रहने की कसम खाई है । मैने तो अपने जीवन के लॉगिन का पासवर्ड बना लिया है तुम्हें, जिसे किसी को नहीं बताता पर यादों में हमेशा रहता हूँ  और एक वो है जो हमें भूल गयी । दो पल रूका ख्वाबों का कारवाँ और फिर चल दिये तुम कहाँ, हम कहाँ...

19 फ़रवरी 2019

शहीद वीर जवानों को श्रद्धांजलि।

14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद भारतीय नौजवानों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।

31 जुलाई 2018

पत्र लिखियें और पाईये 50,000/- रूपये इनाम।


जी हाँ, दोस्तों, इंटरनेट के इस दौर में पत्र लेखन करीब बंद होती जा रही हैं । एक तरह से लोगों ने पत्र लिखना बंद कर दिया है साथ ही सोशल मीडिया के कारण पत्र लेखन विधा विलुप्त हो रही है । सोशल मिडिया द्वारा लोगों में नकारात्मक विचार जल्दी पनप रही हैं । इसलिए हमें अपनी लेखनी के जरिये ऐसे विचारों को आगे बढ़ाना है जो समाज के सभी वर्गों को एक साथ जोडें । डाक विभाग, भारत सरकार ने इसे बढ़ावा देने और लोगों में पत्र लेखन की कला विकसित करने के उद्देश्य से पूरे देश में ढाई आखर नाम से पत्र लेखन प्रतियोगिता शुरू किया है । यह प्रतियोगिता रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित आमार देशेर माटी से प्रेरित मेरे देश के नाम खत विषय पर होगी ।
यह प्रतियोगिता 18 वर्ष से कम एवं 18 वर्ष से अधिक दो आयु वर्गों में होगी । इसके लिए कोई ऊपरी आयु सीमा नहीं है । राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर दोनों वर्गों के प्रथम, द्वितीय और तृतीय विजेताओं को नकद पुरस्कार दिया जायेगा । डाक विभाग, भारत सरकार द्वारा आयोजित इस ढाई आखर प्रतियोगिता में अगर आपका पत्र चुना गया तो पाँच हजार से लेकर पचास हजार रूपये तक का पुरस्कार मिलेगा ।
पत्र हिन्दी, अंग्रेजी अथवा स्थानीय भाषा में हाथ से लिखा होना चाहिए और यह मुख्य पोस्टमास्टर जनरल को संबोधित करके लिखा जाना चाहिए। पत्र में अपना पूरा नाम, पता व जन्मतिथि लिखकर अपने सर्किल के चीफ पोस्टमास्टर जनरल को 30 सितम्बर, 2018 तक निर्धारित लेटर बॉक्स में डाल दें या डाक द्वारा प्रेषित कर सकते हैं । इसके बाद प्राप्त पत्र स्वीकार नहीं किये जायेगे । जबकि गाँवों के लोग इसे अपने ब्रांच पोस्टमास्टर के माध्यम से भेज सकते हैं । प्रतियोगिता के तहत आने वाले पत्रों के लिए पोस्ट ऑफिस में स्पेशल लेटर बॉक्स लगाये जा रहे है ।
दूसरे देश में रहने वाले भारतीय नागरिकों को अपना पत्र सहायक महानिर्देशक, फिलेटेली, डाक विभाग, कमरा नंबर-108, डाक भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली-110001 को भेजना होगा ।
प्रतिभागी अपने पत्र की स्कैन प्रति माई गोव www.mygov.in पोर्टल पर भी 30 सितम्बर, 2018 तक डाल सकते हैं ।
     अगर प्रतियोगी लिफाफे में पत्र भेजना चाहते हैं तो ए फोर साइज पेपर पर अधिक से अधिक 1000 शब्दों में चिट्ठी लिख सकते हैं, जबकि अंतरदेशीय पत्रों के लिए शब्द सीमा 500 है ।
तीन कैटेगरी में पुरस्कार राशि
सर्किल स्तर में प्रथम पुरस्कार के रूप में 25,000 रूपये, द्वितीय पुरस्कार में 10,000 रूपये और तृतीय पुरस्कार के रूप में 5,000 रूपये दिये जायेगें ।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों श्रेणियों में अलग-अलग प्रथम पुरस्कार 50,000 रूपये, द्वितीय पुरस्कार 25,000 रूपये और तृतीय पुरस्कार के रूप में 10,000 रूपये की राशि दी जायेगी ।
     पत्र में प्रतिभागियों को अपनी आयु संबंधी प्रमाण पत्र संलग्न करना होगा, जिसमें लिखना होगा मैं प्रमाणित करता हूँ कि मैं 01/01/2018 को 18 वर्ष से कम या अधिक हूँ ’।
कैसे करें आवेदन
     आवेदन ऑनलाईन किया जा सकता है । इसके लिए खुद को भारत सरकार की वेबसाईट www.mygov.in पर रजिस्टर करना होगा । इसके बाद क्रिएटिव कॉनर पर क्लिक करें फिर ढाई आखर लेटर राईटिंग कॉन्टेस्ट पर जाकर अपनी चिट्ठी की स्कैन कॉपी अपलोड करें ।