सुविचार

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30 अक्तूबर 2014

राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी- सरदार पटेल


सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 ई. को नडियाद, गुजरात के एक कृषक जमींदार परिवार में हुआ था । वे चार भाई थे । सोमभाई, नरसीभाई और विट्टल भाई पटेल इनसे बड़े थे । उनकी शिक्षा मुख्यतः स्वाध्याय से हुई । वे लन्दन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई की और भारत आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे । महात्मा गाँधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया । स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में उनका सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा संघर्ष हुआ । गुजरात का खेड़ा स्थान उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था । पटेल ने वहाँ के वासियों के लिए कर में छुट की मांग की , जिसका अंग्रेजी शासन नें इनकार कर दिया था । सरदार पटेल, गाँधीजी और अन्य लोगों ने किसानों के साथ कर न देने के लिए प्रेरित किया अंततः अंग्रेजी शासन मान गई । यह इनकी पहली सफलता थी । वे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की दौड़ में थे, लेकिन गाँधी जी के इच्छा के चलते वे उपप्रधानमंत्री बने और गृहमंत्री का भी कार्य संभाला ।

            गृहमंत्री रहते हुए भारत के 562 देशी रियासतों को भारत में शामिल में शामिल कराया । उन्हें इस महान कार्य में योगदान देने के कारण भारत का लौहपुरुष कहा जाने लगा । गृहमंत्री के रूप में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं बनाया । वे भारत के बिस्मार्क की तरह थे । सरदार पटेल के दो बच्चे थे, मणिबेन पटेल और दयाभाई पटेल । 31 अक्टूबर, 2013 को सरदार बल्लभ भाई पटेल की 137वीं जयंती के अवसर पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेद्र मोदी ने गुजरात के नर्मदा जिले के सरदार वल्लभ भाई पटेल के स्मारक का शिलान्यास किया, जिसका नाम एकता की मूर्ति (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी) रखा । यह मूर्ति स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊँची बनेगी । यह संभवतः दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति होगी और 5 वर्ष में बनकर तैयार होगी । 31 अक्टूबर को भारत के निर्वतमान प्रधानमंत्री द्वारा एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई है । इनकी मृत्यु 15 दिसम्बर, 1950 को हुआ था ।

25 अक्तूबर 2014

जिन-जिन लोगों को हमने दिये हैं कंधे ।

जिन-जिन लोगों को हमने दिये हैं कंधे ।       
उन्हीं लोगों ने हमें बना डाला भिखमंगे ।
वक्त का ऐसा नजारा था कि वे फिरते थे एक दिन खुले पाँव ।
उसी शख्स के चलते हमने लगा डाला था अपना सारा दाँव ।
दाँव उलटी पड़ी हम पर समझ न पाए हम उनके धंधे ।
जिन-जिन लोगों को हमने दिये हैं कंधे ।
उन्हीं लोगों ने हमें बना डाला भिखमंगे ।
                                दुनिया ऐसी कहती है कि यहाँ हर शख्स है मददगार ।
                                उन लोगों से हम पूछतें हैं क्यों हमें दिया  दुत्कार ।
                                दुत्कारना ही था तो हमें अब तक क्यों बनाया अंधे ।
                                जिन-जिन लोगों को हमने दिये हैं कंधे ।
                                उन्हीं लोगों ने हमें बना डाला भिखमंगे ।
वक्त फिर ऐसी आएगी
मिलेगी ना एक भी फुटी-कौड़ी ।
वो सब भुगतना पड़गा तुम्हें
जितना किया है हमने भाग-दौड़ी ।
भाग-दौड़ी से फिर पाई है फुरसत
सुन लो ये दुनिया के बंदे ।
जिन-जिन लोगों को हमने दिये हैं कंधे ।
उन्हीं लोगों ने हमें बना डाला भिखमंगे ।

19 अक्तूबर 2014

दोषी कौन ?



जग्गू ने शाम के समय अपनी नौकरी पर से काम खत्म कर जैसे ही अपने किराये वाले कमरें में बल्ब का स्विच ऑन करने से पहले पैर रखा । वह इस सपने में खो गया कि मैं कहीं रात को सोये-सोये सपने तो नहीं देख रहा हूँ । जग्गू का पैर पानी से डूबा था । उसने मन ही मन सोचा कि अब तक उतराखण्ड में बाढ़, कश्मीर में बाढ़, बिहार, उड़िसा में बाढ़ तो सुना है, लेकिन मेरे दो मंजिले कमरे में बाढ़ । यह बात तो उससे हजम नहीं हो रही थी । जैसे-तैसे उसने बल्ब जलाया, थैला रखा । अब उसने देखा कि पूरा कमरा जलमग्न है । कमरे में बिखरे सामान नाव की भाँति तैर रहा है । कुछ देर के बाद पता चला कि पीने के पानी का नल खुला रहा गया था । नल के बगल में ही जग्गू का कमरा था ।  दरअसल पीने की पानी तो सुबह- शाम आती थी । आज दिन में कैसे आया ? जग्गू ने कमरा से पानी के निकास का स्थान को बंद कर दिया था, क्योंकि चूहा उसे बहुत तंग करता था । चूहा रोज इसी रास्ते से आता था । कमरे में न रहने पर तरह-तरह के सामान को बेमतलब से चुहा कुतर देता था । पानी के निकास बंद होने के कारण आज कमरे में बाढ़ आ गई थी । अगर पानी के निकास बंद नहीं होता तो पानी पूरा निकल जाता और बाढ़ नहीं आती । जग्गू ने अपने नल को खुले होने का दोष नहीं माना । उसने चुहे के ऊपर सारा दोष मढ़ दिया । अगर चुहा कमरे में तंग नहीं करता तो वह पानी का निकास नहीं बंद करता, यदि पानी का निकास बंद नहीं होता तो कमरे में बाढ़ आने की नौबत नहीं आती । साथ ही इसका दोष अपने मकान मालिक के ऊपर भी मढ़ दिया । अगर मकान मालिक दिन में पानी नहीं  दिया होता तो कमरे में बाढ़ नहीं आती ।  

चूहें पर टैक्स

प्रधानमंत्री ने दुखड़ा सुनाया,
राजस्व घट रही है , क्या किया जाए ?
अधिकारियों ने बताया सर,
किसी और पर टैक्स लगाया जाए ।
बजट का सत्र आया ।
वितमंत्री ने फरमान सुनाया ।
आदमी पर टैक्स लगाते-लगाते थक गया हूँ
अब चूहों पर टैक्स लगेगा ।
आदमी सुस्त पड़ गया है
चूहों  से आमद बढ़ेगा ।
यह बात जब चूहों तक आई
सबने एकाएक मिटिंग बुलाई ।
नेता लोग सेठिया गया है
अब हम पर ही टैक्स लगा रहा है ।
अरे हमारी आमदनी ही क्या है ?
जिस पर टैक्स लगाई जाए ।
हम तो दूसरों के घर जाते हैं
जो मिलता है वही खाकर रह जाते हैं ।
कोई उपाय नहीं सूझ रहा था
क्या किया जाए ।
चलो सब मिलकर,
जंतर-मंतर पर धरना दिया जाए ।
संसद में बहस हो रही थी ।
कैसे और किस तरह लगाई जाए ।
बाहर धरना-प्रदर्शन हो रहा था ।
नारे लग रहे थे, वित्त मंत्री हाय हाय...
चूहों पर टैक्स लगा रहे हो
पहले अपनी दो सफाई
कोई और नहीं बचा है
मेरी वो हरजाई ।
संसद में कृषि मंत्री ने कहा-
चुहा हमारा गेहूँ खा जाता है
बचता है वो अपने घर ले जाता है
इनके यहाँ बहुत अघोषित सम्पत्ति है ।
इन्हीं पर टैक्स लगाया जाए ।
चुहों ने कहाँ,
ये तो हमारा अघोषित सम्पत्ति है ।
तुम्हारा जो स्विस बैंक में जमा है वो क्या स्वपोषित सम्पत्ति है ।

10 अक्तूबर 2014

जे.पी (शांति और क्रांति के अमर योद्धा)


भारतवर्ष में गाँधीजी के बाद जयप्रकाश नारायण ही ऐसे राजनेता हुए, जो लोकप्रिय होते हुए भी राज सत्ता से दूर रहकर लोक सत्ता, लोक नीति तथा लोक-चेतना को जीवन पर्यन्त सुदृढ़ करते रहे । देश की आजादी के महासंग्राम में और स्वतंत्र भारत में भी वे राष्ट्रहित एवं लोकहित के लिए निःस्वार्थ भाव से सदैव समर्पित थे । उनका जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताव दियारा गाँव में एक सामान्य परिवार में हुआ था । उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में पाने के उपरांत मैट्रिक एवं कॉलेज की पढ़ाई पटना में रहकर पूरी की । अध्ययन काल में ही वे प्रभावती जी के साथ प्रणय-सूत्र में बंध गए । इसके बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु वे मई, 1922 में अमेरिका चले गए ।
विदेश से लौटर जयप्रकाश जी ने जैसे ही अपनी मातृभूमि पर कदम रखा तो उन्हें लगा जैसे दासता की लौह श्रृंखला में आबद्ध भारत माता उन्हें धिक्कार रही हों, सागर की विवश तरंगें जैसे उन्हें ललकार रही हों और ब्रितानी सल्तनत का दमन-चक्र उनके सामने चुनौती दे रहा हो । यह वह समय था, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था । उनका मानस उद्वेलित हो उठा, भुजाएं फड़कने लगीं और उनका यौवन हुंकार भरने लगा । फलस्वरूप वे आजादी की जंग में कूद गए ।
स्वाधीनता आंदोलन के तूफानी सफर में अनेकों बार वे कारागार के शिकंजों में जकड़ दिए गए, उन्हें घोर यातनाएं दी गयी, लेकिन उनका सफर रुका नहीं । बल्कि, और भी तीव्रतर होता गया । कारागार की कालकोठरियों में उत्पन्न उनकी विप्लवी विचारधारा ने कांग्रेस की नीतियों को नकार दिया और उसी ने मई, 1934 में जन्म दिया कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को  । 11 अप्रैल, 1946 को जब लाहौर जेल से उन्हें मुक्ति मिली, उस समय तक वे युवकों और क्रांतिकारियों का हृदय सम्राट बन चुके थे ।
15 अगस्त, 1947 को विदेशी दासता की बेड़ियां टूट गयीं । भारतवासी देश के नव-निर्माण के स्वप्निल सागर में गोते लगा रहे थे, तभी अकस्मात 30 जनवरी, 1948 को बापू की निर्मम हत्या हो गया । जयप्रकाश जी विचलित हो उठे और गांधीवाद के प्रवाह में बहते चले गए ।
आजाद देश में प्रथम आम चुनाव हुआ । कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन जयप्रकाश जी ने अपने को सत्ता की राजनीति से अलग रखा । उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा । गांधीवाद और समाजवाद के समन्वित मार्ग पर चलते हुए उन्होंने सर्वोदय की कुटिया में श्रान्ति ली । दलगत राजनीति को त्याग, सादगी, समता और सर्वोदय की त्रिवेणी में गोते लगाते हुए 19 अप्रैल, 1954 को सर्वोदय के लिए उन्होंने जीवनदान की घोषणा कर दी ।
राजनीति से अलग रहकर भी जयप्रकाश जी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति सतत् संवेदनशील रहे । लोक-सेवा के लिए सन् 1965 में उन्हें  मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।
सन् 1974 आते-आते देश में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के विरूद्ध असंतोष की लहर व्याप्त होने लगी । गुजरात में नौजवानों ने आंदोलन छेड़ दिया । बिहार में छात्रों का असंतोष विस्फोटक हो उठा और छात्रों एवं युवाओं ने आंदोलन का नेतृत्व संभालने हुतु जयप्रकाश नारायण से आग्रह किया । 9 अप्रैल, 1974 को पटना के गांधी मैदान की एक महती सभी में छात्रों ने जयप्रकाश नारायण को लोकनायक की उपाधि से विभूषित किया । उन्होंने जब आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने की घोषणा की तो संपूर्ण देश का राजनैतिक माहौल गरमा गया ।
5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान की विशाल ऐतिहासिक सभा में लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की घोषणा की । 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया तथा जयप्रकाश नारायण सहित विरोधी दलों के सभी प्रमुख नेता जेल भेज दिये गये । जेल में वे अस्वस्थ हो गए । क्रमशः उनकी स्थिति नाजुक होती गया । दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और फिर बम्बई के जसलोक अस्पताल में डायलिसिस के सहारे चिकित्सा चलती रही । जनवरी, 1977 में देश में आम चुनाव की घोषणा हुई । जयप्रकाश नारायण ने सभी विरोधी दलों को एक मंच पर इकट्ठा किया, जिसमें भिन्न सिद्धांतों के गठजोड़ से जनता पार्टी का जन्म हुआ और मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में केन्द्र में जनता सरकार गठित हुई । संपूर्ण क्रांति के पुरोधा लोकनायक के सपनों का हश्र क्या हुआ । हुआ यही कि कुछ ही दिनों बाद से उनका मोह भंग होने लगा । उन्हें लगने लगा कि जनता पार्टी जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही । उनके इस चिंतन के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की स्थिति भी चिंताजनक होने लगी थी । 8 अक्टूबर, 1979 को उनका देहांत हो गया । संपूर्ण क्रांति का उनका सपना अब भी अधूरा है । भारत में बेहतर समाज के निर्माण के लिए उनके इस आंदोलन को सफलीभूत करने की आवश्यकता है ।


4 अक्तूबर 2014

दर्शन दो मईया दर्शन दो


दर्शन दो मईया दर्शन दो
मईया दर्शन दो..............2
कि तेरा भक्त बुला रहा है।
            इस जग का है कैसा नाता
            कोई न भक्तन की सुधि लाता
            भक्तों की है मैया यही पुकार
            दर्शन दो मईया दर्शन दो
काली घटा देख मन घबराता
बीच भॅवर में कुछ न सुहाता
नित्य दिन करू मैं तेरी इंतजार
दर्शन दो मईया दर्शन दो.............2
            भाग-दौड़ का है यह जमाना
            सब के सपनों का तुही खजाना
            तेरी करू मैं सदा जयजयकार
            दर्शन दो मईया दर्शन दो............2
                                                 जे.पी. हंस




जूते की अभिलाषा


चाह नहीं मैं आम जनों के
पैरों में पहना जाऊँ
चाह नहीं मैं बस ट्रकों के
पीछे ही लटकाया जाऊँ
            चाह नहीं मैं मोची बाबू
            के थैलों में पड़ा रहूँ
            चाह नहीं घरों की दीवार के
            सामने ही लटकाया जाऊँ
मुझे पहन लेना ओ क्रोधी
उस जन पर देना तू फेंक
अपने वतन की नाक काटने
जिस मंच विराजे भीड़ अनेक
                             जे.पी. हंस