सुविचार

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30 नवंबर 2014

गीता जयंती 2 दिसम्बर पर विशेष

विश्व के किसी भी धर्म या संप्रदाय में ग्रंथ एवं काव्यों की जयंती नहीं मनाई जाती, लेकिन समस्त विश्व में हिंदू धर्म के श्रीमद्भगवद् गीता ही एक ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाने की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है, इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि अन्य सभी ग्रंथों को किसी मनुष्य द्वारा लिखा या संकलित किया गया है, जबकि गीता का जन्म स्वयं श्री कृष्ण भगवान के श्रीमुख से हुआ है या स्वयं...
                                    पद्यनाभस्य मुखपद्याद्विनीःसृता ।।
            श्रीमद्भगवद् गीता का जन्म कुरुक्षेत्र के मैदान में मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को हुआ था, यह तिथि वर्तमान में मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात है । श्रीमद्भगवद् गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है । यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं, अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए है, इसे स्वयं श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है, इसलिए इस ग्रंथ में श्री भगवानुवाच का प्रयोग किया गया है । इस छोटे से ग्रंथ में इतने सत्य, ज्ञान और उपदेश भरे हैं जो मनुष्यमात्र को भी देवताओं के स्थान पर बैठाने की शक्ति प्रदान करते हैं । भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में पवित्र गीता का दिव्य उपदेश तो अर्जुन को दिया था, लेकिन वास्तव में अर्जुन को माध्यम मात्र था । श्री कृष्ण उसके माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को सचेत करना चाहते थे । श्रीमद्भगवद् गीता सब तरह के संकटों से मानव जाति को उबारने का सर्वोत्तम साधन है । गीता विश्व में भयमुक्त समाज की स्थापना का मंत्र देती है, जो विश्व में शांति कायम करने में सर्वथा सक्षम है । ब्रह्मपुराण के अनुसार, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का बहुत बड़ा महत्व है । द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को श्रीमद्भगवद् गीता का उपदेश  दिया था । यह एकादशी मोह का क्षय करने वाली है, इसीलिए इसका नाम मोक्षदा रखा गया है । भगवान श्री कृष्ण मार्गशीर्ष में आने वाली इस मोक्षदा एकादशी के कारण ही कहते हैं कि मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूँ । इसके पीछे मूल भाव यह है कि मोक्षदा एकादशी के दिन मानवता को नई दिशा देने वाली गीता का उपदेश हुआ था ।
महाकाव्य महाभारत से उद्धत है गीताः महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख काव्य ग्रंथ है, जो स्मृति वर्ग में आता है, कभी-कभी केवल  जय भारत कहा जाने वाला यह काव्यग्रंथ भारत का अनुपम धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है । विश्व का सबसे लंबा यह साहित्यिक ग्रंथ और महाकाव्य, हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है । इस ग्रंथ हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है । यद्यपि इस साहित्य की सबसे अनुपम कृतियों में से एक माना जाता है, किन्तु आज भी यह ग्रंथ प्रत्येक भारतीय के लिए एक अनुकरणीय स्त्रोत है । यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है । इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ श्रीमद्भगवद् गीता सन्निहित है । पूरे महाभारत में लगभग 1,10,000 श्लोक हैं, जो यूनानी काव्यों इलियड और ओडिसी से परिमाण में दस गुणा अधिक हैं ।
            हिन्दू मान्यताओं, पौराणिक संदर्भों एवं स्वयं महाभारत के अनुसार, इस काव्य का रचनाकार वेदव्यास जी को माना जाता है । इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों, वेदांगो और उपनिषदों के गुह्तम रहस्यों को निरूपण किया हैं । इसके अतिरिक्त इस काव्य में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया है ।
विशालताः महाभारत की विशालता और दार्शनिक गुणता न केवल भारतीय मूल्यों का संकलन है, बल्कि हिन्दू धर्म और वैदिक परम्परा का भी सार है । महाभारत की विशालता का अनुमान उसके प्रथमपर्व में उल्लेखित एक श्लोक से लगाया जा सकता है, जो यहाँ (महाभारत में) है वह आपको संसार में कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेगा, जो यहां नहीं है वह संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा । इसे महाभारत का अखिल भाग भी कहते हैं । इसमें विशेषकर भगवान श्री कृष्ण की वर्णन है । वेदव्यास जी को पूरी महाभारत रचने में 3 वर्ष लग गये थे । इसका कारण यह हो सकता है कि उस समय लेखन लिपि कला का इतना विकास नहीं हुआ था । उस काल में ऋषियों द्वारा वैदिक ग्रंथों को पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परागत मौखिक रुप से याद करके सुरक्षित रखा जाता था ।
महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि और इतिहासः महाभारत चंद्रवंशियों के दो परिवारों कौरव और पाण्डव के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत है । 100 कौरव भाइयों और पांच पाण्डव भाइयों के बीच भूमि के लिए जो संघर्ष चला उससे अंततः महाभारत युद्ध का सृजन हुआ, इस युद्ध की भारतीय और पश्चिमी विद्वानों द्वारा कई भिन्न-भिन्न निर्धारित की गया तिथियां निम्नलिखित हैं- विश्व विख्यात भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ वराहमिहिर के अनुसार महाभारत युद्ध 2449 ईसा पूर्व हुआ था । विश्व विख्यात भारती गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व में हुआ था । चालुक्य राजवंश के सबसे महान सम्राट पुलकेशियन-2 के 5वीं शताब्दी के ऐहोल अभिलेख में यह बताया गया है कि भारत युद्ध को हुए 3,735 वर्ष बीत गए है, इस दृष्टिकोण से महाभारत का युद्ध 3100 ईसा पूर्व लड़ा गया होगा ।





25 नवंबर 2014

चुनावी ड्यूटी का खत


सुना है फिर एक खत आया है
चुनाव कराने के बावत,
मेरा भी बुलावा आया है ।
                   आज चुनाव कराना भी एक जंग है ।
                   नये-नये युवक-युवतियों में काफी उमंग है ।
                   पर जो-जो प्रत्याशी दबंग है ।
                   उन सबके कार्यकर्ताओं में छिड़ी एक जंग है ।
                   पता नहीं ये छिड़ा हुआ जंग,
                   क्या संदेश लाता है ।
                   सुना है फिर एक खत आया है ।
चुनाव पर जाने से पहले
बड़ी खामोशी छाँती है ।
शादी-शुदा लोगों को घर की
बहुत याद आती है,
पर जो कुवाँरे होते हैं उनकी
प्रेमिका आरती उतारती है ।
आरती उतारने का ये कैसी माया है ।
सुना है फिर एक खत आया है ।
                   बैलेट सिस्टम खत्म हुआ है ।
                   अब ईवीएम का जमाना है ।
                   बुथ लुटना, डराना, धमकाना ।
                   ये खबर बहुत पुराना है ।
                   पुराने खबरों से हूँ बेखबर,
                   क्योंकि नया सिस्टम आया है ।
                   सुना है फिर एक खत आया है ।
कर्मचारी होकर भी हम,
एक दिन के अधिकारी बनेंगे ।
बुढ़ा-बुढ़ी या नौजवान,
सभी मुझे पोलिंग अधिकारी कहेंगे
अधिकारी बनकर भी हमें,
हाथों में रंग लगाना है ।
सुना है फिर एक खत आया है ।
                   नोटा पर वोट पड़े या लोटा पर,
                   हमें अपना कर्तव्य निभाना है ।
                   हम सरकारी मुलाजिम है
                   ना हम कोई प्रत्याशी के दिवाना है ।
                   कोई हारे कोई जीते,
                   हमें केवल लोकतंत्र को जिताना है ।
                   सुना है फिर एक खत आया है ।
                   चुनाव कराने के बावत,
                   मेरा भी बुलावा आया है ।
                                                 जे.पी. हंस







18 नवंबर 2014

क्या खत्म हो जाएगी लेखनी की दुनिया- भाग-2


कहा जाता है कि एक अच्छा ऐक्टर अपनी ऐक्टिंग से कुछ भी छुपा सकता है, पर उसकी हैंडराइटिंग उसके सारे भेद खोल सकती है । हैंडराइटिंग से व्यक्तित्व और भविष्य बांचने की कला कई सौ साल पुरानी है । अब जब हाथ से लिखना कम होता जा रहा है, तो ऐसे में हस्तलिपि में अटपटापन आएगा ही । लेखन का ताल्लुक आत्मा से है, व्यक्तित्व से है । अब चिट्ठियों को ही ले लीजिए । हाथ से लिखी सामग्री को पढ़ने पर लगता है कि शब्द प्रेम की चाशनी में घुलाकर कागज पर सहेज दिए गए हैं । पर अफसोस कि अब चिठ्ठियों लिखने की परंपरा खत्म हो रही है । अपराध और फॉरेंसिक साइंस के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैंडराइटिंग भी है । जिस तरह शातिर का सुराग कभी डीएनए टेस्ट, तो कभी फिंगर प्रिंट से लगाया जाता है, वैसे ही जरूरत पड़ने पर फॉरेसिंक साइंस एक्सपर्ट मौका-ए-वारदात पर मिली हैंडराइटिंग से अपराधी का पता लगाते हैं या किसी पेचीदा केस को सॉल्व करते हैं । पर हाथ की लिखावट तो अब गुम हो रही है । जो लोग लिख भी रहे हैं, तो उनकी हैंडराइटिंग में एकरूपता नहीं रहती ।
याद कीजिए उस दिन को जब मास्टर जी हर रोज सुलेख लिखवाते थे । वह भी नरकट की कलम से, जी हॉ, कोई 20-25 साल पहले क्लासरूम में बॉलपेन रखना बस्ते में बम रखने के समान था । दरअसल नरकट की कलम से लिखना हैंडराइटिंग अच्छी करने का सबसे कारगर तरीका होता है । क्लास में जिसकी राइटिंग सबसे अच्छी होती थी, उसके भाव चढ़े रहते थे । खराब हैंडराइटिंग वाला न सिर्फ हीनता बोध से ग्रस्त रहती थी, बल्कि इम्तिहान में नंबर भी कम आते थे । हैंडराइटिंग में फिसड्डी आशिक अपने प्रेमपत्र तक दूसरों से लिखवाते थे । अब प्रेमी और प्रेमिका भी अब हैंडराईटिंग वाले प्रेमपत्र नहीं के बराबर भेजते है । क्योंकि उनके जगह एस.एम.एस ने जगह बना लिया है । अब व्हाट्सऐप, टेलिग्राम, हाईक जैसे मैसेजिंग एप ने जगह अपना लिया है । इन एपों के माध्यम से पल-पल का हाल बिना प्रेमपत्र लिखे ही  जान जाता है । बहरहाल, दौर बदला, तो कलम भी बदल गई । नरकट की जगह पहले वॉलपेन ने ली और अब कंप्यूटर और मोबाइल वॉलपेन को भी छीनने पर आमदा है ।

14 नवंबर 2014

धारा पर धारा


मंच पर बैठे-बैठे
बहुत देर हो गई थी,
हमारी एक टांग भी
सो गई थी ।
सो हम उठे ।    
एक कवि मित्र पूछ बैठे-
                   -कहाँ ?
हमने अपनी कन्नी उंगली उठाई-
                   -वहाँ
और मंच से उतर आए ।
उतर आए तो सोचा
हो भी आएं,
चलो इस तरफ से भी
राहत पा जाए
फिर मंच के पिछवाड़े घूमने लगे
कोई उचित, सही-सी स्थान
ढूंढने लगे ।
चलते-चलते
एक गली के मोड़ तक आ गए
सही जगह पा गए
और जब हम गुनगुनाते हुए.....करने लगे
किसी ने कमर में डंडा गड़ाया
मुड़कर देखा तो
सिपाही नजर आया
हम हैरान,
उसके चेहरे पर क्रूर मुस्कान
डंडा हटा के गुर्राया-
          चलो एक तो पकड़ में आया ।
हमने कहा-
          क्या मतलब?
वो बोला-
          मतलब के बच्चे
          पब्लिक प्लेस पर
          ............करना मना है
हमने कहा-
          ऐसा कोई कानून नहीं बना है ।
उसने कहा-
          जबान लड़ाता है
          अबे हमीं को कानून पढ़ाता है
          चल थाने ।
और हम लगे हकलाने-
सि........सि........सि.......सिपाही जी
हम कवि है,
कविताए सुनाते है
आपने गलत आदमी को छेड़ा है
वो बोला-
          पिछले दो भी
अपने आप को कवि बता रहे थे
इसलिए छोड़ा है
तुझे नहीं छोड़ूंगा
हो जा मुस्तैद
दिल्ली पुलिस ऐक्ट सैक्शन पिचानवै
सौ रूपया जुर्माना
आठ दिन की कैद
हल्ला मचाएगा
बानवै लग जाएगी,
तू तड़ाक बोलेगा
तिरानवै लग जाएगी
हमने कहा-
सिपाही जी
ये बानवै, तिरानवै, पिचानवै
क्या बलाएं हैं ?
वो मूंछो पर हाथ घुमाते हुए बोला
कानून की धाराए हैं ।
हमने सोचा-
          वाह वाह रे कानून हमारा
          अरे, धारा बहाने पर भी धारा
-         अशोक चक्रधर (हास्य कवि)



क्या खत्म हो जाएगी लेखनी की दुनिया- भाग-1

             
जी, हाँ दोस्तों हम उस चीज की बात कर रहे हैं, जिसका मानव जीवन में अति महत्वपूर्ण योगदान होता है, जिसकी विद्यार्थी पूजा भी करते हैं, लेकिन उसे आज तकनीकी युग में बहुत की कम इस्तेमाल किया जा रहा है । यों तो कहे कि नही के बराबर इस्तेमाल होता है, वह है लेखनी - मतलब कलम ।
            अगर आज के जमाने में महात्मा गाँधी होते तो यह शायद इस बात का अफसोस नहीं होता कि उनकी हैंडराईटिंग बेहद खराब है । मोती जैसे अक्षर गढ़ने वाले रवींद्रनाथ टैगोर और लियोनार्दो द विंची भी इस एस.एम.एस और इमेल और चैटिंग के जमाने में जी रहे होते तो इसके लिखावट की कोई कद्र नहीं होती । जी हाँ, यह तकनीकी का वह दौर है, जिसमें यह मायने नहीं रखती कि आपकी हैंडराइटिंग कैसी है, क्योंकि हाथ से लिखने का चलन की बात दिन-प्रति-दिन खत्म होती जा रही है । कार्यालयों में कागज और कलम का उपयोग लगातार कम होता जा रहा है । मुहावरों की भाषा में कहे कि कंप्यूटर, मोबाईल और टबलेट ने हमसे हमारी कलम छीन ली है और जब कलम ही नहीं बचेगी तो कलम के जादू का क्या होगा ? कलम का क्या काम है? लिखना, पर यह तो अब सजने लगी है जेब में, शो-केस में । क्योंकि अब लिखने के लिए कलम से ज्यादा इस्तेमाल कंप्यूटर के की-बोर्ड का होने लगा है तो क्या खतरे में है हस्तलिपि का भविष्य ? जब कलम ही नहीं चलेगी तो कैसे चलेगा कलम का जादू । अब सवाल यह उठता है कि हस्तलिपि का भविष्य क्या होगा? भाषाशास्त्री इस बात के चिंतित तो है कि कंप्यूटर के दखल से कलम की कमान की-बोर्ड को सौप दी है, जिससे हस्तलिपि का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है पर वह यह बात भी बताते हैं कि आने वाले दिनों में एक बार फिर लोगों को कलम और हैंडराइटिंग की याद आएगी । भाषाविद् और केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व निदेशक कहते है, यह सच है कि अब लोग लिखते नहीं है, उंगलियों से टाइप करते हैं , पर वह दौर भी लौटेगा, जब कलम सिंर्फ जेब से ताकेगी नहीं, बल्कि बीते दिनों की तरह फिर से आग उगलेगी ।




10 नवंबर 2014

वक्त की पुकार

खग-मृग छोड़ मनुज तन मिला
फिर भी लाखों है शिकवे गिला
गिले-शिकवे भूलाने को
तन-मन में सपने बुनो
वक्त की पुकार सुनो, वक्त की पुकार सुनो
            सपने साकार करने में तुम्हे
            लख-लख कष्ट सहने पड़े
            कर्मवीर सेना की भाँति
            अग्नि की मशाल बनो
            वक्त की पुकार सुनो, वक्त की पुकार सुनो
कर्म-पथ दुर्गम है
वक्त भी न तेरे संगम है
समय समहित करने को
कंटिल पथ तुम सुगम मानो
वक्त की पुकार सुनो, वक्त की पुकार सुनो
            कंटिल पथ पर न लौटे अनन्तर
            सब होगा एक दिन छू-मंतर
            छू-मंतर करने में चाहे
            आसमान टुटे, पहाड़ टुटे
            अन्तर्मन की पहचान करो
            वक्त की पुकार सुनो, वक्त की पुकार सुनो
                                                                जे.पी. हंस