सुविचार

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21 दिसंबर 2014

हिन्दी के साथ अन्याय का पत्र देश के नीति-नियंता के नाम

 सेवा में,
1. महामहिम राष्ट्रपति, भारत सरकार, नई दिल्ली
2. माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
3. राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, नई दिल्ली
4. मानव संसाधन एवं विकास मंत्री, भारत सरकार
5. क्षेत्रीय निर्देशक, कर्मचारी चयन आयोग, नई दिल्ली
महोदय,
निवेदनपूर्वक आपका ध्यान इस विषय की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ जिससे हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अनुचित व्यवहार ही नहीं, वरन राष्ट्रीय अपमान भी हो रहा है । महोदय, कर्मचारी चयन आयोग, जिसका मुख्यालय सीजीओ कम्पलेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली में है । जिसकी देश भर में चार-पाँच क्षेत्रीय शाखाएं है । वह देश भर के लिए कर्मचारियों की भर्ती करती है । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रति वर्ष आशुलिपिक हिन्दी ग्रेड-डी और ग्रेड-सी की भर्ती की जाती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस आशुलिपिक हिन्दी के पद की भर्ती के पाठ्यक्रम में हिन्दी से एक भी प्रश्न तक पूछा नहीं जाता है । इसके पाठ्यक्रम है- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक । क्या यह हिन्दी भाषी छात्रों को इस पद पर बहाली से दूर रखने का कही षड्यंत्र तो नहीं ? या वे अन्य भाषा को बढ़ावा देना चाहते है? क्या वे हिन्दी दिवस पर केवल गोष्ठियाँ और सप्ताह मनाकर अपने कर्तव्य की ईतिश्री नहीं कर रहे हैं ? क्या यह हिन्दी का अपमान नहीं है कि हिन्दी आशुलिपिक की भर्ती किये जाए और उसमें एक भी प्रश्न हिन्दी से पूछे नहीं जाए ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि हिन्दी और अंग्रेजी आशुलिपिक दोनों पद के लिए पाठ्यक्रम में हिन्दी-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक होता । या हिन्दी आशुलिपिक के हिन्दी-100, अंग्रेजी आशुलिपिक के लिए अंग्रेजी-100 और दोनों के लिए सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक हो ।
साथ ही साथ इस तरफ भी ध्यान आकृष्ट करूँ कि कर्मचारी चयन आयोग देशभर में मैंट्रिक लेबल परीक्षा, इन्टर लेबल परीक्षा और स्नातक लेबल परीक्षा आयोजित करती है, लेकिन यहाँ हिन्दी भाषा के साथ इतना भेदभाव है कि इनमें से किसी भी लेबल के परीक्षा में एक भी अंक हिन्दी भाषा से जुड़े प्रश्न नहीं होते हैं । क्या यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अन्याय नहीं है कि केन्द्रीय भर्ती बोर्ड द्वारा इस तरह के भेदभाव किए जाए और उसके नाक के तले बैठे हमारे नीति-नियंता चुपचाप देखते रहे ? क्या केवल हिन्दी दिवस पर देशभर में गोष्ठियाँ और हिन्दी-सप्ताह मनाने से राष्ट्रभाषा अपने मुकाम तक पहुँच सकती है, इस बात पर विचार किया जाए ।
कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली कुछ परीक्षाएं और उनके पाठ्यक्रम इस प्रकार हैः-
मैट्रिक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-अंग्रेजी-50 अंक
इन्टर स्तरीय
पद- क्लर्क, डाटा इन्ट्री ऑपरेटर प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट
इन्टर स्तरीय
पद- आशुलिपिक हिन्दी व अंग्रेजी प्रथम परीक्षा- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-शॉर्टहैंड का टेस्ट
स्नातक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा गणित-100, अंग्रेजी-100
तृतीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट व इंटरभ्यू (पदानुसार)
अतः इस संबंध में भारतवर्ष के एक नागरिक होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि भारतीय संविधान में उल्लेखित हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की अस्मिता और गरिमा को बरकरार रखने हेतु आपका ध्यान दिलाऊँ । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा संचालित उपरोक्त परीक्षाओं के पाठ्यक्रमों में हिन्दी को शामिल करें, ताकि राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास हो, हिन्दी का उत्थान हो, हिन्दी भाषियों के साथ न्याय हो ।
                                                                                                  आपका भारतवासी,
                                                                                                  जयप्रकाश नारायण
                                                                                                ग्राम-दनियाला (पश्चिमी)
                                                                                                     डाकघर- शादीपुर
                                                                                                   जिला-अरवल (बिहार)
                                                                                          ईमेल- jpn.nsu@gmail.com
                                                                                 ब्लॉग- www.jphans.blogspot.com 




पप्पू का घड़ी


क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब सोता हूँ तो,
उठने का समय बताती है घड़ी ।
जब उठता हूँ तो,
स्कूल जाने के समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब खेलता हूँ तो,
घर वापस जाने की याद दिलाती है घड़ी ।
जब घर आता हूँ तो,
टीवी देखने की याद दिलाती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब टीवी देखता हूँ तो,
पढ़ने का समय बताती है घड़ी ।
जब पढ़ता हूँ तो,
दोस्तों से मिलने का समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब दोस्तों से मिलता हूँ तो,
माँ की याद दिलाती है घड़ी,
कि जल्दी घर आना ।
पर जब  घर पहुँचने में लेट होती है,
माँ डाँट सुनाती है , सोचता हूँ
काश ये घड़ी न होती ।
चैन से सोता ।
चैन से उठता ।
चैन से खेलता ।
चैन से टीवी देखता ।
चैन से पढ़ता ।
                  जे.पी. हंस






18 दिसंबर 2014

भोजपुरी का शेक्सपीयर-श्री भिखारी ठाकुर


बिहार के प्रसिद्ध गवइया श्री भिखारी ठाकुर का नाम शायद कौन नहीं जानता ? यह गवइया के साथ-साथ प्रसिद्ध नाटककार, गीतकार, कवि, भाषासेवी, लोक कलाकार, रंगकर्मी, लोक जागरण के संदेशवाहक, नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के उद्घोषक, लोकगीत एवं भजन कीर्तन के अनन्य साधक थे । इनका जन्म 18 दिसम्बर, 1887 ई. को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर (दियारा) गॉव में एक नाई परिवार में हुआ था । उनके पिता जी का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता जी का नाम शिवकली देवी था । वे एक गरीब परिवार से थे । बचपन में ही जीविकोपार्जन के लिए गॉव छोड़कर खड़गपुर चले गए । वहाँ उन्होंने काफी रूपया-पैसा कमाया, किन्तु वे अपने काम से संतुष्ट नहीं रहते थे । रामलीला में उनका मन लग गया था, इसके चलते ही वे अपने गॉव आकर एक नृत्य मण्डली बनाया और रामलीला खेलने लगे । इसके साथ ही वे गाना-गाते एवं सामाजिक कार्यों से जुड़े । उनकी पढ़ाई-लिखाई 30 वर्ष की उम्र में हुआ, इससे पहले वे अपने पुश्तैनी काम नाई का कार्य करते थे । इसके साथ ही उन्होंने नाटक, गीत और पुस्तकें लिखना भी आरम्भ किया । इनके पुस्तके की भाषा बहुत सरल होती थी, जिसके चलते ही बहुत लोग उनके तरफ आकृष्ट हुए । उनके द्वारा लिखे गए नाटक है- विदेशिया, भाई-विरोध, पुत्रवध, विधवा-विलाप, गवर-घिचोर, बेटि बेचवा, बिरहा-बहार, राधेश्याम-विहार, कलियुग-प्रेम । इसने भोजपुरी भाषा को जन-जन तक पहुँचाने में अहम योगदान दिया, जिसके कारण इन्हें भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा जाता है । इनका निर्धन 10 जुलाई सन् 1971 को हुआ था । यह हिन्दी के लिए दुर्भाग्य की बात है कि इस महान लोक कलाकार को भोजपुरी का शेक्सपीयर तो कहती है पर इनको साहित्य में पहुच से दूर रखा गया है ।




17 दिसंबर 2014

इंसाफ-ए-पेशावर













वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
थी इतनी छोटी सी उम्र ।
 किया क्या था उसने जुर्म ।
अगर जुर्म उसने नहीं किया  ।
क्यों फिर ऐसा बदला लिया ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
पढ़ रहा था पाठ जीवन में,
इंसानियत और सच्चाईयों का ।
फिर क्या समझकर तुने,
तरफदारी किया बुराईयों का ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
कर दिया उनको किनारा,
सच्चाईयों की राह से ।
दरिंदों को मजबुती मिली है,
बुराईयों की स्याह से ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
अगर सियासत में खोट है,
तो क्या करेंगा ये चाँद तारा ।
सोचा था हमने एक दिन,
लाएंगे अमन और भाईचारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
ये जमीं है तेरी,
ये वतन है तेरा ।
इस तन पे लिपटे,
कफन भी है तेरा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
एक दिन निकलना था,
घर-गली से बैंड-बाजा ।
उन्हीं गलियों से आज,
क्यों निकला है जनाजा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
मरने के बाद भी इंसानियत जज्बा हमारा,
बुराईयों का नाश ही है शपथ हमारा ।
हिम्मत और इंसानियत भरी हो,
अगर देना इस धरती पर जन्म दूबारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
                         जे.पी.हंस



श्रद्धांजली (पेशावर स्कूली हमला में मारे गये बच्चों पर)










क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
माता-पिता ने उनको,
प्यार-दुलार से पाला-पोसा ।
कितनी भी की गलती उसने,
फिर भी ऐसा नहीं कोसा ।
इतनी कठोर न होता,
दिल-ए-पाषाण को  ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
कोमल-सी थी बदन उनके ।
कमल-सी थी नयन उनके ।
वाणी थे जैसे मिठे रस ।
मिठे रस को न पिलाकर,
क्यों छोड़ दिया उस नौजवान को ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
सीख रहे थे पाठ वे,
प्रेम, शांति और भाईचारे के ।
तोड़ना था तारे उनको,
पहुँचना था चाँद पे ।
ऐसे सपने को तोड़कर,
ला दिया क्यों शमशान पे ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
                 जे.पी.हंस





16 दिसंबर 2014

मजदूर का बच्चा













पुस की  कुँहरे भरी सुबह ।
एक अनजान बालक से मिला ।
आते ही उसने,
सादर प्रणाम किया ।
था वह बेहद खुश ।
लेकिन मैं सकुचाया ।
फिर भी अपनी संस्कार समझकर ।
हमने अभिवादन स्वीकार किया ।
अनजान बालक को देखकर ।
मन में हिलोड़ पैदा होने लगा ।
हिलोड़ भी ऐसी, जो थी
काफी बेजोड़ ।
सोचा-खैर छोड़ो
अपना कार्य करना था
सो अपने कार्य में लगा
मैने सोचा-
आखिर होगा इसी गाँव का
जिस गाँव गया था मैं ।
था वह एक दलित बस्ती ।
केवल एक प्राथमिक विद्यालय,
पक्की सड़क के किनारे,
बाकी थी सपनों की कश्ती ।
फिर भी विचार और व्यवहार से,
उसके वार्तालाप में खो गया ।
बात ही बात में कुछ पूछा  ।
लेकिन न पूछ सका माँ-बाप का नाम ।
कौन है यह बालक ।
अद्भुत, अदंभ है जिसमें साहस ।
अंत में वह अपने घर लाया ।
पहले तो सकुचाया ।
फिर गया
तब पहचान में आया
वह था मेरे गाँव के मजदूरनी का बच्चा ।
टूटी-फूटी घर ।
बिखरे सामान
लेकिन थे बड़े सपने
नए तराने ।
शायद इस उम्र में ,
मैंने भी ऐसे सपने नहीं देखे ।
मजदूरनी हमारे गाँव में,
खेती-बाड़ी में कार्य करता था ।
था वह जाना पहचाना ।
उसने अपने बच्चे के बारे में
बताया था मुझे,
पर कभी देखा था नहीं, नहीं सोचा भी था
कि होगा ऐसा साहसी बच्चा ।
बिना कहे ही उसने, खुशी-खुशी
अपने सारे प्रमाण-पत्र लाकर दिखाया ।
मैंने भी हौसले, इरादे और धैर्य को बढ़ाया
समझाया, बताया ।
उसके माँ के दिल में था सपना ।
मेरा लाडला एक दिन
इस गरीबी से छूटकारा दे ।
मजदूरी करके भी
दो बेटे और एक
बेटियों को पढ़ाना ।
आज के महंगी की दौर में
कैसी टेढ़ी खीर है ?
फिर भी अजीब हिम्मत वाली थी वह
खुद फटेहाल रहकर भी,
लाडले को होनहार चाह रही थी ।
कैसी होती है माँ जो लाख
कष्ट सहकर भी
पुत्र के सपने साकार करती है
धन्य है वह माँ...धन्य है...
                         जे.पी.हंस



8 दिसंबर 2014

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं और हिन्दू धर्म


भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है । मध्यप्रदेश के भीमबेटका में पाए गए 25 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा मेहरगढ के अलावा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत की भूमि आदिमानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है । यहीं से मानव ने अन्य जगहों पर बसाहट करने व वैदिक धर्म की नींव रखी थी । आज से 3500 वर्ष पूर्व जो सभ्यताएं जीवित थीं उनको पाश्चात्य इतिहासकारों ने “प्राचीन सभ्यताएं” मानकर ही मानव इतिहास और समाज का विश्लेषण किया, लेकिन उनका यह विश्लेषण एकदम गलत और ईसाई धर्म को स्थापित करने वाला था, इसके लिए उन्होंने ऐसे कई तथ्य नकारे, जो प्राचीन भारत और चीन के इतिहास को महान बताते हैं और ईसा बाद के समाज से कहीं ज्यादा उन्हें सभ्य सिद्ध करते हैं ।
प्राचीन सभ्यताओं पर अब कुछ ज्यादा ही शोध होने लगे हैं और उनसे नई-नई बातें निकलकर आ रही हैं, मसलन कि उनका एलियन से संबंध था और वे भी बिजली उत्पादन की तकनीक जानते थे । धरती पर फैली प्राचीन सभ्यताओं के बात करें तो धरती के पश्चिमी छोर पर रोम, ग्रीस और मिस्त्र देश की सभ्यताओं के नाम लिए जाते हैं तो पूर्वी छोर पर चीन का नाम लिया जाता है । मध्य में स्थित भारत की चर्चा भर करके उसे छोड़ दिया जाता है । क्यों? क्योंकि भारत को जानने से उनके समाज और धर्म के सारे मापदंड गिरने लगते हैं, तो वे नहीं चाहते हैं कि भारत और उसके धर्म का सच लोगों के सामने आए, लेकिन सच कब तक छिपा रहेगा ? दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं से हिन्दू धर्म का क्या कनेक्शन था ? या कि संपूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए नए रूप में स्थापना की थी? आज दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी धर्म हो, पारसी धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो ।
ईसा से 2300-2150 वर्ष पूर्व सुमेरिया, 2000-400 वर्ष पूर्व बेबिलोनिया, 2000-250 ईसा पूर्व ईरान, 2000-150 ईसा पूर्व मिस्त्र (इजिप्ट), 1450-500 ईसा पूर्व असीरिया, 1450-150 ईसा पूर्व ग्रीस (यूनान), 800-500 ईसा पूर्व रोम की सभ्यताएं विद्यमान थीं । उक्त सभी से पूर्व महाभारत का युद्ध लड़ा गया था । इसका मतलब कि 3500 ईसा पूर्व भारत में एक पूर्ण विकसित सभ्यता थी ।
सिन्धू-सरस्वती घाटी की सभ्यता (5000-3500 ईसा पूर्व)- हिमालय से निकलकर सिन्धु नही अरब के समुद्र में गिर जाती है । प्राचीनकाल में इस नदी के आसपास फैली सभ्यता को ही सिन्धु घाटी की सभ्यता कहते हैं । इस नदी के किनारे के दो स्थानों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) में की गई खुदाई में सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्यता के अवशेष मिले ।
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य देवियों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं । ये मूर्तियां मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं । प्राचीनकाल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं । इतना तो तय है कि इस काल में महाभारत का युद्ध इसी क्षेत्र में हुआ था । लोगों के बीच हिंसा, संक्रामक रोगों और जलवायु परिवर्तन ने करीब 4 हजार साल पहले सिन्धु घाटी या हड़प्पा सभ्यता का खात्मा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी । यह दावा एक नए अध्ययन में किया गया है ।
नॉर्थ कैरोलिना स्थित एप्पलचियान स्टेट यूनिवर्सिटी में नृविज्ञानी (एन्थ्रोपोलॉजी) की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ ग्वेन रॉबिन्स शुग ने एक बयान मे कहा कि जलवायु, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों, सभी ने शहरीकरण और सभ्यता के खात्में की प्रक्रिया में भूमिका निभाई, लेकिन इस बारे में बहुत कम ही जानकारी है कि इन बदलावों ने मानव आबादी को किस तरह प्रभावित किया ।
आज जिस हिस्से को पाकिस्तान और अफगानिस्तान कहा जाता है, महाभारतकाल में इसे पांचाल, गांधार, मद्र, कुरु और कंबोज की स्थली कहा जाता था । अयोध्या और मथुरा से लेकर कंबोज (अफगानिस्तान का उत्तर इलाका) तक आर्यावर्त के बीच वाले खंड में कुरूक्षेत्र था, जहां यह युद्ध हुआ । आजकल यह हरियाणा का एक छोटा-सा क्षेत्र है ।
उस काल में सिन्धु और सरस्वती नदी के पास ही लोग रहते थे । सिन्धु और सरस्वती के बीच के क्षेत्र में कई विकसित नगर बसे हुए थे । यहीं पर सिन्धु घाटी की सभ्यता और मोहनजोदड़ो के शहर भी बसे थे । मोहनजोदड़ो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है ।
जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोहनजोदड़ो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्होंने देखा कि वहां की गलियों में नरकंकाल पड़े थे । कई अस्थिपंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थिपंजरों ने एक-दूसरे के हाथ इस तरह पकड़े रखे थे मानो किसी विपत्ति ने उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था ।
उन नरकंकालों पर उसी प्रकार की रेडियोंएक्टिविटी के चिह्न थे, जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गए थे । मोहनजोदड़ो स्थल के अवशेषों पर नाइट्रिफिकेशन के जो चिह्न पाए गए थे, उसका कोई स्पष्ट कारण नहीं थी, क्योंकि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है । उल्लेखनीय है कि महाभारत में अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था जिसके चलते आकाश में कई सूर्यों की चमक पैदा हुई थी ।
                                                                      संभारः उदित वाणी, 30 नवम्बर, 2014





4 दिसंबर 2014

संस्कार

मेरे गाँव-मुहल्लों में जो दिवाना है ।
वहीं पर बुढ़े-बुजुर्गों का भी आशियाना है ।
मैंने गॉव-मुहल्लों के चीख से जाना ।
ये समाज कई वर्ष पुराना है ।
ऐसे संस्कारों से जिंदगी नहीं चलती ।
जिसका लक्ष्य बुजुर्गों को सताना है ।
दिल दुखाते है सब एक दूसरें को मगर
मुश्किल से हमें ही तो बचाना है ।
बुजुर्गों की आहट से डरती थी जिंदगी ।
आज उन्हें अपना घर विराना है ।
लड़ते है बाप-बेटे एक दूसरे से ।
ये हरकत बहुत बचकाना है ।
दुख-दर्द की आँधियाँ बहेगी ।
फिर भी हरपल हमें मुस्कुराना है ।
आँधी, बारिश या तुफान भी आये ।
हमें तो बस चलते ही जाना है ।
आज कु-संस्कारों से चलते पसरा है सन्नाटा ।
इस सन्नाटों से एक दास्तां बनाना है ।
चमगादड़ों की फौज से कहीं है बेहतर ।
आँधियों में एक दीप जलाना है ।
पढ़ों साहित्य, अपनाओं अपनी संस्कृति ।
फिर समाज में अच्छे संस्कार लाना है ।
मेरे गाँव-मुहल्लों में जो दिवाना है ।
वहीं पर बुढ़े-बुजुर्गों का भी आशियाना है ।
                             जे.पी. हंस