जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

सुविचार

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14 नवंबर 2014

धारा पर धारा


मंच पर बैठे-बैठे
बहुत देर हो गई थी,
हमारी एक टांग भी
सो गई थी ।
सो हम उठे ।    
एक कवि मित्र पूछ बैठे-
                   -कहाँ ?
हमने अपनी कन्नी उंगली उठाई-
                   -वहाँ
और मंच से उतर आए ।
उतर आए तो सोचा
हो भी आएं,
चलो इस तरफ से भी
राहत पा जाए
फिर मंच के पिछवाड़े घूमने लगे
कोई उचित, सही-सी स्थान
ढूंढने लगे ।
चलते-चलते
एक गली के मोड़ तक आ गए
सही जगह पा गए
और जब हम गुनगुनाते हुए.....करने लगे
किसी ने कमर में डंडा गड़ाया
मुड़कर देखा तो
सिपाही नजर आया
हम हैरान,
उसके चेहरे पर क्रूर मुस्कान
डंडा हटा के गुर्राया-
          चलो एक तो पकड़ में आया ।
हमने कहा-
          क्या मतलब?
वो बोला-
          मतलब के बच्चे
          पब्लिक प्लेस पर
          ............करना मना है
हमने कहा-
          ऐसा कोई कानून नहीं बना है ।
उसने कहा-
          जबान लड़ाता है
          अबे हमीं को कानून पढ़ाता है
          चल थाने ।
और हम लगे हकलाने-
सि........सि........सि.......सिपाही जी
हम कवि है,
कविताए सुनाते है
आपने गलत आदमी को छेड़ा है
वो बोला-
          पिछले दो भी
अपने आप को कवि बता रहे थे
इसलिए छोड़ा है
तुझे नहीं छोड़ूंगा
हो जा मुस्तैद
दिल्ली पुलिस ऐक्ट सैक्शन पिचानवै
सौ रूपया जुर्माना
आठ दिन की कैद
हल्ला मचाएगा
बानवै लग जाएगी,
तू तड़ाक बोलेगा
तिरानवै लग जाएगी
हमने कहा-
सिपाही जी
ये बानवै, तिरानवै, पिचानवै
क्या बलाएं हैं ?
वो मूंछो पर हाथ घुमाते हुए बोला
कानून की धाराए हैं ।
हमने सोचा-
          वाह वाह रे कानून हमारा
          अरे, धारा बहाने पर भी धारा
-         अशोक चक्रधर (हास्य कवि)



क्या खत्म हो जाएगी लेखनी की दुनिया- भाग-1

             
जी, हाँ दोस्तों हम उस चीज की बात कर रहे हैं, जिसका मानव जीवन में अति महत्वपूर्ण योगदान होता है, जिसकी विद्यार्थी पूजा भी करते हैं, लेकिन उसे आज तकनीकी युग में बहुत की कम इस्तेमाल किया जा रहा है । यों तो कहे कि नही के बराबर इस्तेमाल होता है, वह है लेखनी - मतलब कलम ।
            अगर आज के जमाने में महात्मा गाँधी होते तो यह शायद इस बात का अफसोस नहीं होता कि उनकी हैंडराईटिंग बेहद खराब है । मोती जैसे अक्षर गढ़ने वाले रवींद्रनाथ टैगोर और लियोनार्दो द विंची भी इस एस.एम.एस और इमेल और चैटिंग के जमाने में जी रहे होते तो इसके लिखावट की कोई कद्र नहीं होती । जी हाँ, यह तकनीकी का वह दौर है, जिसमें यह मायने नहीं रखती कि आपकी हैंडराइटिंग कैसी है, क्योंकि हाथ से लिखने का चलन की बात दिन-प्रति-दिन खत्म होती जा रही है । कार्यालयों में कागज और कलम का उपयोग लगातार कम होता जा रहा है । मुहावरों की भाषा में कहे कि कंप्यूटर, मोबाईल और टबलेट ने हमसे हमारी कलम छीन ली है और जब कलम ही नहीं बचेगी तो कलम के जादू का क्या होगा ? कलम का क्या काम है? लिखना, पर यह तो अब सजने लगी है जेब में, शो-केस में । क्योंकि अब लिखने के लिए कलम से ज्यादा इस्तेमाल कंप्यूटर के की-बोर्ड का होने लगा है तो क्या खतरे में है हस्तलिपि का भविष्य ? जब कलम ही नहीं चलेगी तो कैसे चलेगा कलम का जादू । अब सवाल यह उठता है कि हस्तलिपि का भविष्य क्या होगा? भाषाशास्त्री इस बात के चिंतित तो है कि कंप्यूटर के दखल से कलम की कमान की-बोर्ड को सौप दी है, जिससे हस्तलिपि का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है पर वह यह बात भी बताते हैं कि आने वाले दिनों में एक बार फिर लोगों को कलम और हैंडराइटिंग की याद आएगी । भाषाविद् और केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व निदेशक कहते है, यह सच है कि अब लोग लिखते नहीं है, उंगलियों से टाइप करते हैं , पर वह दौर भी लौटेगा, जब कलम सिंर्फ जेब से ताकेगी नहीं, बल्कि बीते दिनों की तरह फिर से आग उगलेगी ।