जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

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17 अगस्त 2015

ना तुने हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।

ना तुने  हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।
बन कर अनजान बेवफा, क्यों भूल गए दिवाने ।
जिंदगी में क्या बचा है, क्या रह गए तराने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
सुबह-सुबह उठने पर, सोचते है ऑफिस जाने ।
समय का बड़ा पाबंदी है, न चलेगा कोई बहाने ।
बॉस से डॉट पड़ेगी, क्यों देर कर दी आने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
शाम को छूटने पर, सोचते है जल्द घर जाने ।
यहाँ भी पाबंदी है, न चलेगा कोई बहाने ।
मैडम से डॉट पड़ेगी, क्यों देर कर दी आने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
रात को कहाँ खैर है जब सो गए सिढ़ाने ।
सुबह का क्या इंतजाम है, इसे अभी है बताने ।
जिंदगी बन गई है फुटबॉल, क्यों कोई हाल जाने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।
ना तुने  हाल जाने, ना मैंने हाल जाने ।
बन कर अनजान बेवफा, क्यों भूल गए दिवाने ।
जिंदगी में क्या बचा है, क्या रह गए तराने ।
समय बचा सोचने को शहर बीच मयखाने ।


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