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22 अक्तूबर 2015

“मूषक” अपनाये, देशभक्ति की भैलिडीटी बढ़ाये ।



            स्वदेशी और देशभक्ति की बात तो हर कोई कहता है, लेकिन जब लागू करने की बारी आती है तो कोसों दूर हट जाते हैं । दोस्तों, हम 10 सितम्बर, 2015 को भारत के एक हिन्दी पुत्र द्वारा 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में मूषक सोशल नेटवर्किंग साईट को लोगों के बीच लाया गया है । यह साइट आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ हिन्दी को लोगों से परिचित कराती है ताकि लोग रोमन लिपि से पिछड़कर अपनी पहचान न खो दे । इसे कम्प्यूटर पर गूगल सर्च में www.mooshak.in के नाम से खोजा जा सकता है तथा स्मार्टफोन में इसके एप्प को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है ।
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अगर हम इसके विशेषताओं की बात करते है तो ट्विटर पर जहाँ अधिक से अधिक 140 अक्षरों को टाइप करने की सुविधा थी वही मूषक पर अपने संदेश को 500 अक्षरों तक टाइप की सुविधा दी गई है । मूषक पर आप हिन्दी में भी टाइप कर सकते हैं और अगर रोमन में टाइप करते हैं तो मूषक खुद उसे देवनागरी लिपि में बदल देगा । आगे चलकर देश की सभी भाषाओं में मूषक को संचालित किया जायेगा । भाषा वैज्ञानिकों का विचार है कि जो भाषा हम बोलना जानते हैं उसे थोड़े प्रयत्नों से ही सरलता से लिखना सीख सकते हैं ।
            ट्विटर पर एक व्यक्ति कई-कई फर्जी खाते खोल लेता है, लेकिन मूषक पर अकाउंट मोबाईल नम्बर के जरिये खुलेगा ताकि एक व्यक्ति की पहचान एक ही रहे । मूषक में दोस्तों, रिश्तेदारों, अभिनेताओं, राजनेताओं आदि को अलग-अलग सूची में रखा जा सकता है, जिससे ढेर सारी सम्पर्कों के बीच किसी को खोजने में परेशानी न होगी ।

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            देशभक्ति का ताजा उदाहरण है चीन की माइक्रोब्लॉगिग साइट वेइबो । जिसने वहाँ के बाजार में ट्विटर के पसीने छुड़ा रखे है । अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक वेइबों के यूजरों का आंकड़ा 45 करोड़ से भी ज्यादा है वही वर्ष 2006 मे शुरु हुए ट्विटर पर फिलहाल 30 करोड़ से भी ज्यादा यूजर है । भारत की जनसंख्या इतनी है कि विश्व के किसी भी सोशल साइट को अर्श से ले जाकर फर्ज तक पहुँचा सकता है । यहाँ तक कि अमेरिका के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में भारतवासियों की संख्या ज्यादा है । इतना ही नहीं फेसबुक, गुगल, ट्विटर जैसे सोशल साइटों के कार्यालयों में भारतवासी अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात की स्वदेश निर्मित इस प्रकार की सोशल साइट आज तक नहीं बन पाया था ।

            इस प्रकार, अगर सभी भारतवासी भारत निर्मित इस सोशल साइट का उपयोग करेंगे तो चीन की भांति हम भी ट्विटर को टक्कर दे सकते हैं तो देर किस बात की देशभक्ति बढ़ानी है तो कम से कम एक बार प्रयोग करके देख सकते हैं ।
                                 “मूषक अपनाये, देशभक्ति की भैलिडीटी बढ़ाये।


7 अक्तूबर 2015

संपूर्ण क्रांति के सूत्रधार- लोकनायक श्री जयप्रकाश नारायण

                

                                                                      
            “डरो मत अभी मैं जिंदा हूँ के चमत्कारिक नारों की उद्घोषणा करने वाले, भारतवर्ष में गाँधी जी के बाद सबसे लोकप्रिय राजनेता जिसने राज सत्ता से दूर रहकर लोक सत्ता, लोक नीति तथा लोक-चेतना का जीवन पर्यन्त पालन करने वाले, दलगत राजनीति को त्याग, सादगी, समता और सर्वोदय की त्रिवेणी में गोता लगाने वाले युग पुरुष श्री जयप्रकाश नारायण का जन्म उत्तर-प्रदेश और बिहार की सीमाओं का निर्धारण करने वाली पतित पावनी गंगा के कटाव पर स्थित सिताब दियारा गाँव में 11 अक्टूबर, 1902 को हुआ था । सिताब दियारा गाँव बिहार के सारण जिले में स्थित है । उन्होंने सनं 1919 में हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी से उतीर्ण किया । 1921 में इंटरमीडिएट की परीक्षा में न बैठकर उन्होंने छात्राओं और छात्रों को कॉलेज छोड़ने का आग्रह किया । बाद की पढ़ाई श्री जयप्रकाश नारायण ने विदेश जाकर पूरी की । वह 17 मई, 1922 से सितम्बर 1929 तक अमेरिका में रहे और कुछ न कुछ कार्य करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की । उन्होंने ओहिया विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की ।
            विदेश से लौटकर श्री जयप्रकाश नारायण ने जैसे ही अपनी मातृभूमि पर कदम रखा तो उन्हें लगा जैसे दासता की लौह श्रृंखला में आबद्ध भारत माता उन्हें धिक्कार रही हो, सागर की विवश तरंगे जैसे उन्हें ललकार रही हों और ब्रिटानी सल्तनत का दमन-चक्र उनके सामने चुनौती दे रहा था । यह वह समय था, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था । उनका मानस पटल उद्वेलित हो उठा, भुजाएं फड़कने लगी और उनका यौवन हुंकार भरने लगा तब जवाहर लाल नेहरू के पारिवारिक सदस्य बनकर आनंद भवन, इलाहाबाद में रहने लगे । उन्होंने कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए संगठन पक्ष को अपनी शक्ति प्रदान की । यह काम अंग्रेजों की नजर में संगीन जुर्म था इसलिए उन्हें 1932 ई. में नजरबंद कर दिया गया । स्वाधीनता आंदोलन के तूफानी सफर में अनेकों बार वे कारागार के शिकंजों में जकड़ दिए गए, उन्हें घोर यातनाएं दी गयी. लेकिन उनका सफर नहीं रूका, बल्कि और भी तीव्रतर होता गया । कारागार की कालकोठरियों में उत्पन्न उनकी विप्लवी विचारधारा ने कांग्रेस की नीतियों को नकार दिया और उसी ने मई. 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को जन्म दिया । 11 अप्रैल, 1946 को जब लाहौर जेल से उन्हें मुक्ति मिली तब वे युवकों और क्रांतिकारियों का हृदय सम्राट बन चुके थे ।
            15 अगस्त, 1947 को जब भारत विदेशी दासता की बेड़ियों से आजाद हुआ तब भारतवासी देश के नव-निर्माण के स्वप्निल सागर में गोते लगा रहे थे, तभी अचानक 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गाँधी की निर्मम हत्या हो गया तब वे विचलित हो उठे और गाँधीवाद के प्रवाह में बहते चले गए । युवावस्था में वे मार्क्सवाद और लेनिनवाद के घोर समर्थक थे ।
            जब भारत आजाद हुआ तब कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन श्री जयप्रकाश नारायण ने अपने को सता की राजनीति से दूर रखा । हालांकि उनको भारत का प्रधानमंत्री बनाने की आवाज भी उठ चुकी थी, लेकिन उन्होंने नकार दिया । वे राजनीति से अलग रहकर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति सतत संवेदनशील रहे । इन्हीं लोक सेवा के कारण उन्हें सनं 1965 में मैंग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया ।
            सन् 1974 आते-आते देश के तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के विरुद्ध असंतोष की लहर व्याप्त होने लगी । गुजरात में नौजवानों ने आंदोलन छेड़ दिया । बिहार में भी छात्रों का असंतोष विस्फोटक हो उठा और छात्रों एवं युवाओं ने आंदोलन का नेतृत्व संभालने हेतु श्री जयप्रकाश नारायण से अनुरोध किया । 9 अप्रैल, 1974 को पटना के गाँधी मैदान की एक सभा में छात्रों ने श्री जयप्रकाश नारायण को लोकनायक की उपाधि से विभूषित किया । उन्होंने जब आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने की घोषणा की तो संपूर्ण देश का राजनैतिक माहौल गरमा गया । 5 जून, सन् 1974 को पटना के गाँधी मैदान की विशाल ऐतिहासिक सभा में लोकनायक ने संपूर्ण क्रांति की घोषणा की । 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया तथा श्री जयप्रकाश नारायण सहित सभी विरोधी दलों के सभी प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया गया । जेल मे वे अस्वस्थ हो गए क्रमशः उनकी स्थिति नाजुक होती गई । दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और फिर बम्बई के जसलोक अस्पताल में डायलिसिस के सहार चिकित्सा चलती रही । जनवरी, 1977 मे देश में आम चुनाव की घोषणा हुई तो जयप्रकाश ने सभी विरोधी दलों को एक मंच पर इकटठा किया, जिसमें भिन्न सिद्धांतों के गठजोड़ से जनता पार्टी का जन्म हुआ और मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में केन्द्र में जनता सरकार गठित हुई । उनका स्वास्थ्य ज्यादा साथ नहीं दे सका, अंततः 8 अक्टूबर, 1979 को उनका देहांत हो गया । आज बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में इनके अनुयायी ही सक्रिय है ।