सुविचार

शब्द क्रांति में आपका स्वागत है । अपना मूल्यवान समय निकालकर आने हेतु आभार । अपनी प्रतिक्रिया देना न भूलें ।

18 दिसंबर 2016

कहाँ है मेरा भारत देश...

कल रांची में एक छात्रा के साथ गैंग रेप की बुरी तरह रूह को कंपकपाने वाली घटना से मौत हुई..इस पर तड़पती मेरी चंद पंक्तियां...
टूटे दिल,बिखरी इश्क,
रूठे चेहरे, गिरे वेश।
ढूंढ रहा हूँ इन सब में,
कहाँ हैं मेरा भारत देश ।
खोटी इंसानियत, लूटते जिस्म,
सोई मानवता, बदलते परिवेश ।
ढूंढ रहा हूँ इन सब में,
कहाँ है मेरा भारत देश।
काली निशा, उजाली उषा,
कोरी कल्पना, बहते उपदेश।
ढूंढ रहा हूँ इन सब में,
कहाँ हैं मेरा भारत देश।
                           - जेपी हंस

24 नवंबर 2016

जमशेदपुर कवि सम्मेलन

दोस्तों, कल मैं एक कवि सम्मेलन में गया था,वहां कवि सम्मेलन के पोस्टर में कवि सम्मेलन की जगह कवि सम्म लेन लिखा हुआ था. इस बात की जानकारी जब मैं सम्मेलन के अध्यक्ष महोदय को दी तो यह गुस्सा बैठे तो मैंने भी मौके का तड़का देख खड़का दिया जो इस प्रकार हैं....
अपनी बातों को वे येन- प्रकारेण कह बैठे,
सम्मेलन को वे सम्म लेन कह बैठे ,
मंच पर जो बैठे थे कविवर मित्र,
दाढ़ी देख कर उन्हें भी लादेन कहां बैठे..
इतनी बातों पर पुनः झुंझला गए..जो मैंने इस प्रकार बया किया...

इतनी सी बातों से परेशानी होने लगी,
सुन सुन के मुझे भी हैरानी होने लगी,
उलझ पड़े वो हमसे इस तरह,
  बातों ही बातों में पहलवानी होने लगी...

30 अक्तूबर 2016

दीपावली के बधाई संदेश...

मेरी दुआ है कि यह पवित्र त्योहार आपके जीवन में उत्साह, खुशियाँ, शांति और प्यार से सदा के लिए आपके जीवन को भर दे!
यह उत्साह वाला पल आपके जीवन को खुशियों से भर दे और दीपों की रोशनी सा आपका जीवन चमक उठे और आपकी सभी तमन्नाएं और सारे सपने पूरे हों!
शुभ दीपावली!

28 अक्तूबर 2016

दिवाली नहीं आते।

लगे है वाइ-फाई जबसे​ ​तार भी नहीं आते​​;​​
​बूढी आँखों के अब मददगार भी नहीं आते​​;​​
​​गए है जबसे शहर में कमाने घर के छोरे;​​
​​उनके घर में त्यौहार भी नहीं आते।
नोट: जो पर्व-त्योहार में भी अपने माँ-बाप, दादा-दादी से भेट करने नही जाते, उनको समर्पित।
#बेसहारा_माँ
#बूढ़ी_दादी
अंत में, सभी को शब्द क्रांति की तरफ से हार्दिक शुभकामनाये।

18 सितंबर 2016

धरा की जननी कौन है?


विवश है आज धरा पर नारी,
अपनी अस्मत बचाने को ।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
पल-पल उन्हें सताने को ।
मुद्दे जघन्य है जर्रा-जर्रा पर,
कर्तव्यवान जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव !
धरा की जननी कौन है ?
पैरों तले लूट जाती इज्जत,
फैलती आसमां तक दूषित विचार ।
धिक्कार है जन्मना उस धरा पर,
जहाँ होती नारी का अपमान ।
छाई है चर्चा देश-दुनिया में,
नेतृत्व जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?
भूल गया क्या तु मानव,
धरा पर तुझको किसने लाया ।
तन-बदन पर पीड़ा सहकर,
कतरा-कतरा रक्त किसने बहाया ।
चर्चा है हर घर-चौपाल पर,
पास-पड़ोस जन क्यों मौन है ?
अब बताओ हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?
रोती बिलखती गर्भस्थ गृह से ही,
अपनी जिंदगी बचाने को।
तड़पनी पड़ती है नव मास तक,
हर नारी को जनमाने को ।
रूह कराहती तब जर्रा-जर्रा में,
पुरूषत्व कहाँ अब मौन है ।
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?
कर ऐसी कारीगरी मानव,
मन से कर तु साक्षात्कार ।
भक्षक भक्ष कर, रक्षक रच कर,
नारी का कर सत्कार ।
चर्चे है हर जिह्वा-जिह्वा पर,
तरूणमन क्यों मौन है ?
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?

12 सितंबर 2016

हिंदी भाषा का इतिहास और विकास


हिन्दी मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित । हिन्दी शब्द की उत्पति सिन्धु-सिंध से हुई है, क्योंकि ईरानी भाषा में को बोला जाता है । इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है । कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी हिंद से हिन्दी शब्द बना ।
      आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है, वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है । आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत हैं, जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी । वैदिक भाषा में वेद, संहिता एवं उपनिषदों-वेदांत का सृजन हुआ है । वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी, जिसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है । संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है । अनुमानतः 8वीँ शताब्दी ई.पू. में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था । संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये । वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, अश्वघोष, भारवी, माघ, भवभूति, विशाख, मम्मट, दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है । इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है । संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते 500 ई.पू के बाद तक काफी बदल गई, जिसे पाली कहा गया । महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया । यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही ।
      पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे प्राकृत की संज्ञा दी गई । इसका काल पहली ई. से 500 ई. तक है । पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषाये-पश्चिमी, पूर्वी, पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी, जिन्हें मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, ब्रांचड़ तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है ।
      आगे चलकर प्राकृत भाषाओं के श्रेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषाये प्रतिष्ठित हुई । इनका समय 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है । अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यतः दो रूप मिलते है-पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानतः 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ । अपभ्रंश से ही हिंदी भाषा का जन्म हुआ । आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है-
अपभ्रंश-                  आधुनिक आर्य भाषा तथा उपभाषा
पैशाची-                  लहंदा, पंजाबी
ब्रांचड़-                   सिन्धी
महाराष्ट्री-                 मराठी
अर्धमागधी-               पूर्वी हिन्दी
मागधी-                   बिहारी, बंगला, उड़िया, असमिया
शौरसेनी-                  पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी गुजराती

      उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिंदी भाषा का उद्भव अपभ्रंश के अर्धमागधी, शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ है ।

हिंदी के लिए क्या करें ।


1. स्त्रियां अपनी भाषा और शब्द-चयन को लेकर अपेक्षाकृत अधिक सजग होती है । यदि वे थोड़ी और जागरूक हो जाए, तो घर की नई पीढ़ी विदेशी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद अपनी भाषा और संस्कृति से बराबर जुड़ी रहेगी ।
2. विद्यालय में भले ही अंग्रेजी अनिवार्य हो, लेकिन घर पर मातृभाषा में ही बातचीत का नियम बनाए । भोजन, पूजा-पाठ, आत्मीय क्षणों में अंग्रेजी की कड़ी मनाही हो ।
3. बच्चों को अपनी भाषा में कहानियां-कविताएं पढ़ने के लिए प्रेरित करें । स्वयं भी पठन-पाठन में शामिल होकर उनमें रूचि जगाए ।
4. बच्चों को अपनी भाषा के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक लाभों के बारे में बताएं ।
5. बेटी के साथ बेटे को भी रसोई और धार्मिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों की शब्दावली से परिचित कराएं ।
6. यदि वे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करे, तो वैकल्पिक हिंदी शब्द बताएं ।
7. हिंदी क्षेत्र के निवासी, अहिंदी परिवार के बच्चे दोस्तों से हिंदी में बोले । इस तरह से भाषा की सजगती बढ़ेगी ।
8. गैर-हिंदी भाषी से बात करें, तो उसकी टूटी-फूठी हिंदी को भी प्रोत्साहित करें । यदि आप जानते हो कि कोई व्यक्ति हिंदी क्षेत्र का है या हिंदी जानता है, तो उससे अंग्रेजी में बात न करें । अंग्रेजी उसकी मजबूरी हो सकती है, आपकी नहीं । वह अंग्रेजी में प्रश्न करे, तो आप हिंदी में उत्तर दें ।
9. ऐसी जगहों पर आप सेवाएं खरीदते है, यानी ग्राहक होते हैं । आप पैसे देते हैं, सो आपका दर्जी ऊंचा होना चाहिए । लेकिन होता उल्टा है । बैरा और अन्य कर्मचारी अंग्रेजी में बोलते हैं और आप कमतर न समझ लिया जाएं, इस डर से उसी की भाषा में बोलने लगते है । इसके बजाय, हिंदी में पूछे हिंदी में बताएं । यह बात गांठ बांध लीजिए कि यदि आपकी जेब में खर्च करने को पैसे है, तो वे हिंदी ही नहीं, आपकी स्थानीय बोली को भी झख मारकर समझेंगे ।
10. प्रपत्र, मतलब फॉर्म, चाहे बैंक का मामला हो या जीवनबीमा का, हिंदी प्रपत्रों की मांग करें । यहां भी नियम और शर्तें हिंदी में पूछे । राशियों की गणना के लिए हिंदी का सहारा लें । अंग्रेजी अंकों में बताया जाए, तो हिंदी में पूछे । यहीं नहीं, आप पासबुक और एटीएम पर्ची के लिए भी हिन्दी की मांग कर सकते है । अपनी भाषा में जानकारी प्राप्त करना आपका मौलिक अधिकार है ।
11. घर खरीदते समय या जमीन या फिर अनुबंध करते समय, उसके दस्तावेज अपनी भाषा में मांगे । अपनी भाषा में आप नियम-शर्तों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और धोखा खाने या किसी महत्वपूर्ण बात के नजर से चूक जाने के आसार कम ही होंगे । इसका एक लाभ यह भी होगा कि करोड़ो-अरबों का कारोबार करने वाले लोग हिंदी की अहमियत समझेंगे और हिंदी के अच्छे जानकारों को बतौर अनुवादक ही सही, रोजगार मिलेगा ।
12. सफर  के दौरान हिंदी की पत्रिकाएं और समाचार पत्र मांगे, खरीदें । पर्यटन स्थलों और अपनी भाषा में जानकारी की मांग करें ।
13. एक बात विशेष रूप से जान ले कि जब आप भुगतान करके सेवाएं खरीदते हैं, तो आप ऊंची स्थिति में होते हैं । कम से कम ऐसी जगहों पर अपनी भाषा को लेकर संकोच न करें ।
14. आज तकनीकी का दौर है इस दौर में स्मार्टफोन, टबलेट और कम्प्यूटर/लैपटॉप का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है । इसे इस्तेमाल करते समय भाषा का चयन हिंदी का करें ।
15. आज सोशल साइट का ज्यादा क्रेज बढ़ा है, इस पर अपनी विचार व्यक्त करते समय हिंदी का प्रयोग करें । हिंदी में भाषा को बदलने के लिए सभी सोशल साइट्स की सेंटिंग में हिंदी उपलब्ध है ।
16. भारत भी सोशल साईट बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है इसलिए बेहतर होगा विदेशी सोशल साइट के बदले स्वदेशी सोशल साइट का प्रयोग करें । फेसबुक की जगह शब्दनगरी, ट्विटर की जगह मूषक, व्हाट्सएप्प की जगह जिओ चैट उपलब्ध है, इसकी प्रयोग करें ।

17. स्मार्टफोन में हिंदी भाषा का प्रयोग करने के लिए प्ले स्टोर में हिंदी कीबोर्ड के अनेक एप्पस मौजूद है इसे इन्सटॉल कर, सेटिंग में हिंदी का चयन करें ।

हिंदी से जुड़ी रोचक बातें ।


1. हिंदी की लिपि देवनागरी है । यह दो भिन्न शब्दों से बना समस्त पद है । देवअर्थात ईश्वर तथा नागरी अर्थात नगर अथवा शहर से संबंधित । इस शब्द की व्युत्पति यह बताती है कि एक काल विशेष में यह लिपि एक मुख्य व्यवहार के लिए प्रयुक्त हुई होगी ।
2. वेद, पुराण आदि कई हिंदू धर्मग्रंथ देवनागरी में ही रचे गये है, जबकि इसके परिवर्तित रूपों में शिलालेख और पट्ट-आलेख उपलब्ध है । अतः इतिहासविदों तथा पुरातत्वविदों के लिए देवनागरी को जानना-समझना अत्यावश्यक माना गया है ।
3. सातवीं ईस्वीं में हिंदी का आविर्भाव अपभ्रंश से हुआ । 10वीं सदी के अंत तक इसके स्वरूप में स्थिरता आ गया । ब्रज, अवधी तथा खड़ी बोली आदि हिंदी की बोलियां अथवा उपभाषाए हैं । हिंदी का वर्तमान साहित्यिक मानक रूप खड़ी बोली पर आधारित है ।
4.  भाषा के विकास-क्रम में अपभ्रंश से हिंदी की ओर आते हुए भारत के अलग-अलग स्थानों पर अलग भाषा शैलियां जन्मी । हिंदी उनमें से सबसे अधिक विकसित थी । अतः उसे भाषा की मान्यता मिली । अन्य भाषा शैलियां बोलियां कहलायी ।
5. हिंदी का संबंध भारोपीय भाषा परिवार की उपशाखा भारत-ईरानी की भारतीय आर्यशाखा समूह से है । इसे भारतीय संघ की राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है तथा इसकी लिपि देवनागरी हैं ।
6. हिंदी की विकास यात्रा दिल्ली, कन्नौज और अजमेर क्षेत्रों में हुई मानी जाती है । पृथ्वीराज चौहान का उस वक्त दिल्ली में शासन था । चंदबरदाई उनके दरबारी कवि हुआ करते थे । कन्नौज का अंतिम राठौड़ शासक जयचंद था, जो संस्कृत का बहुत बड़ा संरक्षक था ।
7. जहां काव्य में हिंदी के विकास को छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग इन चार नामों से जाना गया. वहीं गद्य में इसको, भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, रामचंद शुक्ल व प्रेमचंद युग तथा अद्यतन युग का नाम दिया गया ।
8. वर्ष 1850 ई. में हिन्दी शब्द का प्रयोग उस भाषा के लिए समाप्त हो गया. जिसे अब उर्दू कहा जाता है । वर्ष 1900 में सरस्वती पत्रिका में किशोरी लाल गोस्वामी की कहानी इंदुमति का प्रकाशन हुआ । यह हिंदी की पहली कहानी मानी जाती है ।
9. वर्ष 1913 में दादा साहब फाल्के ने राजा हरिश्चंद नामक प्रथम हिंदी फिल्म (चलचित्र) का निर्माण किया । वर्ष 1931 में हिंदी की पहली बोलती फिल्म आलम आरा परदे पर आयी ।
10. हिंदी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग सरफुद्दीन यज्दी के जफरनामा (1924) में मिलता है ।
11. अमीर खुसरो के खालीक बारी (1283) में पहली बार हिंदी का प्रयोग केवल पांच बार हुआ है, जबकि हिंदवी का तीस बार प्रयोग हुआ है ।
12. 1826 ई. में पहला हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड निकला ।
13. प्राप्त प्रमाणों में 933 ई. की श्रावकाचार नामक पुस्तक अपभ्रंश हिंदी का पहला ग्रंथ है, परन्तु अमीर खुसरो हिंदी के वास्तविक जन्मदाता थे, जिन्होंने 1283 में खड़ी बोली हिंदी को इसका नाम हिन्दवी दिया । तब से ही यह हिन्दवी, हिन्दी बनती गई, बढ़ती, चढ़ती गई है ।  

हिन्दी हूँ मैं....

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल.
      उपरोक्त पंक्तियाँ भारतेंदु हरिश्चंद ने हिंदी के बारे में वैसे समय में लिखी, जब उन्हें लगा कि अब हिंदी के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है । इसी खतरे को भांपते हुए उतरोत्तर समय में 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी । हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
      वैसे जो ऐसी कल्पनाएं करके ही खुश होते है कि हिंदी दिवस मनाने वाले मानते हैं कि भाषा का संकट है, तो उन्हें अपनी खुशगहमी दूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दिन मनाना संकट का घोतक नहीं, बल्कि अपने ही देश में, सैलानियों की तरह रह रहे लोगों को याद दिलाने का तरीका है कि मुखौटे उतारो और सच्ची जबान बोलो ।
      अपनी भाषा बोलने में हिचक होने और आत्म-विश्वास की कमी को कारण हमारे स्वतंत्रता पूर्व और स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के शासन की गलत शिक्षा नीतियों के कारण हिंदी उपेक्षा की शिकार रही है । जिस स्वाधीनता संग्राम को भारतीय भाषाओं ने लड़ा, उसी स्वाधीनता के प्राप्ति के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया गया । स्वाधीनता प्राप्ति के सारे दस्तावेज ही न केवल अंग्रेजी में हस्ताक्षरित किये गये, बल्कि आधी रात को देश के प्रथम प्रधानमंत्री का स्वाधीनता प्राप्ति का पहला भाषण ही अंग्रेजी में दिया गया । यही वह क्षण था, जहाँ से हिंदी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं की दुर्गति शुरू हुई ।
      हमारी हिचकिचाहट हमारी मनोवैज्ञानिक दासता में अंतर्निहित है । उसके ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारण उतने नहीं है, जितने मनोवैज्ञानिक और वर्गीय कारण हैं । स्वाधीनता के तत्काल बाद स्वाधीनता संग्राम के उन्हीं नेताओं को, जो नई सरकार में मंत्री बनाए गए । उन्हें लगा कि अब वे जनता से कुछ अलग और विशिष्ट हो गए है, क्योंकि अब वे शासक हो चुके थे । उनके सामने यह समस्या हुई कि वे जनता से अलग दिखने के लिए क्या करे, तो उन्हें पहला हथियार मिला भाषा का । उन्होंने तत्काल अपने कामकाज की भाषा के लिए अंग्रेजी को चुन लिया ।

      एक क्षेत्र-विशेष के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले कुछ लोग तो राजनितिक रोटियां सेकने में अरसे से हिंदी विरोद्ध का झंडा उठाते रहे हैं । जब यूपीएससी में हिंदी को लागू करने की बात उठी तो एक बार फिर से सक्रिय रूप से उसके विरोध पर उतर आये थे, अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने तक पर उन्हें एतराज है यानि अपने ही देश में हिंदी लगातार विरोध के चक्रव्यूह में फंसती और लड़ती रही है । सरकारी स्तर पर उसे आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला है मगर कमाल यह है कि इतने सबके बाद भी हिंदी न हारी, न टूटी, न मरी, न गई अपितु आज दुनियाभर में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शुमार है तथा चीनी या मंडारिन के बाद उसका दूसरा स्थान है । भले ही हिंदी उस देश में ठिटकी खड़ी है, जहाँ सब उसके अपने है, पर एक बेगानेपन से त्रस्त होकर भी उसने उम्मीद नहीं छोड़ी है और हिंदी में जबरदस्त वृद्धि हो रही है, उसकी पठनीयता और साहित्य कुलांचे भर रहा है और कह रहा है हिन्दी हूँ मैं

15 अगस्त 2016

हे वीर शहीदों (देशभक्ति गीत)

हे वीर शहीदो, हे वीर शहीदों ।
जाने न दूँगा तेरा शहीदी बेकार ।
चाहे धरा पर आँधी आये ।
चाहे तन पर व्याधि आये ।
चाहे राज पर खाज आये ।
चाहे धरा पर बाज आये ।
एक मरे तो करूँगा सौ तैयार ।
हे वीर शहीदो, हे वीर शहीदों ।
जाने न दूँगा तेरा शहीदी बेकार ।
इस गण का तंत्र मै हूँ ।
सब मंत्रों का मंत्र मै हूँ ।
हाथियों का दंत मै हूँ ।
शिवजी सा निलकंठ मैं हूँ ।
वक्त पड़े तो उठा लूँगा सारा संसार ।
हे वीर शहीदो, हे वीर शहीदों ।
जाने न दूँगा तेरा शहीदी बेकार ।
चाहे कुकुर कितनो भौके ।
चाहे सुकर कितनों चौके ।
चाहे सीमा कितनो लाघें ।
चाहे कूटक कितनों बाँधे ।
पलक झपकते ही फैला दूँगा अंधकार ।
हे वीर शहीदो, हे वीर शहीदों ।
जाने न दूँगा तेरा शहीदी बेकार ।

मेरा देश महान

पास्ट हो या फ्यूचर,
फेसबुक हो या ट्विटर,
व्हाट्सएप्प हो या मूषक,
सब में है योगदान ।
मेरा देश महान, हमारा देश महान ।
इस देश का है ऐसा आइडिया,
चाहे वर्ल्ड का कोई हो सोशल मिडिया,
सब पर रखता अभिमान,
मेरा देश महान, हमारा देश महान ।
टी मैन हो या संतरी,
आउटसाईडर हो या मंत्री,
सब होते है यहाँ विराजमान,
मेरा देश महान, हमारा देश महान ।
ब्लैक मैन हो या व्हाईटर,
सब बनते है यहाँ फाईटर,
होते देश के लिए कुर्बान,
मेरा देश महान, हमारा देश महान ।

14 अगस्त 2016

हमारा राष्ट्र पर्व

स्वतंत्रता दिवस है राष्ट्र पर्व,
हम राष्ट्र ध्वज फहराएंगे,
दुश्मनों को छक्के छुड़ाकर,
देश का सम्मान बढ़ाएंगे।
कर्तव्य पथ पर अडिग रहकर,
शीश कभी न झुकाएँगे।
जो थाती मिली है  गर्दिश में,
उसको हम मिलकर बचाएंगे ।
हम ऐसा राष्ट्र बनाएंगे ।
सर्व-धर्म का हित जहां होगा।
स्वतंत्रता, प्रेम और बंधुत्व का,
गुण ही केवल समाहित होगा।
      लेखक-जेपी हंस

14 मई 2016

चक्कर @ का

चक्कर कई तरह के होते हैं, जैसे चक्कर खाना, चक्कर खाकर गिर जाना, दफ्तर का चक्कर लगाना, किसी अधिकारी का चक्कर लगाना या पूजा-पाठ के समय देवी-देवताओं का परिक्रमा (चक्कर) लगाना, किसी मन्दिर का परिक्रमा (चक्कर) लगाना । लेकिन इन दिनों बिहार में @ का चक्कर कुछ छात्र-छात्राओं को लगाना पड़ रहा है । दरअसल बात यह है कि बिहार सरकार ने मैट्रिक के रजिस्ट्रेशन नौवी वर्ग से ही शुरू कर दिया है । एक तो जो बच्चे दसवीं में जाने वाले है उन्हें अभी तक नौवीं की परीक्षा नहीं हुआ है । दूसरी इनके मैट्रिक के रजिस्ट्रेशन नौवी से शुरू हो गई है । खैर, रजिस्ट्रेशन कोई बड़ी बात नहीं हैं वो आज या कल होना ही था या नौवीं में हो या दसवीं में, पर खास बात यह है कि नौवी क्लास में होने वाली रजिस्ट्रेशन में व्यक्तिगत जानकारी के साथ-साथ छात्र-छात्राओं के बैंक खाता संख्या, आई.एफ.एस.सी कोड, मोबाईल नम्बर और ई-मेल आई.डी की मांग की जा रही है । जब तक ये सब उपलब्ध नहीं रहेगें । रजिस्ट्रेशन होगा ही नहीं । इतना तो आप भी जानते है कि बैंक खाता तो ठीक है, खुलवाया जा सकता है, प्रधानमंत्री जन-धन योजना के अंतर्गत भी खुलवाया जा सकता है साथ ही साथ मोबाईल नम्बर तो हर घर के व्यक्ति-व्यक्ति के पास मौजूद है, भले ही वो चाहे रिक्सा चलाने वाला हो या खोमचा बेचने वाला, पर भला ई-मेल आई.डी कहाँ से लायेंगे । बिहार सरकार के नौवी के छात्र भला ई-मेल आई.डी बनाना कैसे जाने वो भी देहाती क्षेत्र के रहने वाले । शहर के रहने वाले तो ई-मेल आई.डी क्या वो तो दिन भर फेसबुक, ट्विटर, मूषक, वाट्सएप्प की सैर करते रहते हैं । इसी बीच मुझे अपने गाँव से फोन आया । मेरा गाँव देहाती क्षेत्र से संबंध रखता है । बताया गया कि नौवी क्लास में ऑनलाईन फार्म भरा जा रहा है जिसमें ई-मेल आई.डी की मांग की जा रही है । जब उन्हें ई-मेल आई.डी बनाकर मैसेज किया । पहले तो उन्हें मैसेज निकालना नहीं आ रहा था, जब मैसेज निकालना बताया तो चक्कर आ गया @ का । वो @ को जीरो पढ़ते थे । मैंने बार-बार बताया कि यह रोमन लिपि- अंग्रेजी का विशेष चिन्ह है । कम्प्युटर की जानकारी रखने वाले ही जानते है । उन्होंने बताया कि इतने छोटे का इतना लम्बा पढ़ा जाता है, पहली बार सुना है । दरअसल @ को ‘एट दी रेट’ पढ़ा जाता है । खैर नौवी के बच्चे कम्प्युटर सीखे या न सीखे @ चक्कर पड़ ही गया और इसी बहाने थोड़ा कम्प्युटर का ज्ञान भी हो गया ।

11 मई 2016

एक और निर्भया...

वक्त बदला, सत्ता बदली,
न बदला कोई आचार-व्यवहार ।
पहले दिल्ली फिर केरल,
नारी शक्ति हुई शर्मसार ।
अन्तर सिर्फ इतना रह गया,
सत्ता और तंत्र का ।
नहीं कोई काम आया,
बदले सरकार के मंत्र का ।
कही सोशलिस्ट, कही कम्युनिस्ट,
कही संघ की सरकार कहते ।
जाति, धर्म की ठेकेदारी देखकर,
मिडिया भी उफान भरते ।
पार्टी-पोल्टिस, पुलिस, पडोसी,
वक्त देखकर दंभ भरते ।
बारी आती जब क्रांति की,
शांति की कहानी गढ़ते ।
न कोई यहाँ सोशलिस्ट,
कम्युनिस्ट, संघी के पंख है ।
मानो तो मानो मेरी बात मानो,
सबके सब ढपोरशंख है ।
सभ्य, शिक्षित प्रांत में कैसी,
दरिंदगी की कोमल काया ।
पशु भी इतना निर्मम न होती,
रहती उनकी हृदय में दया ।
दरिंदों का न होता जाति, पंथ,
न रहती कोई हृदय में माया ।
कितने निर्भया ने जान गवाई,
हमने अबतक क्या कर पाया ।
जागो नारी पंथ आक्रोश भरो,
जगाओ लहू में चिंगारी ।
कोई न पर पुरुष छूं सके ।
न बन सके कोई व्याभिचारी ।
लिंग भेद का मर्म समझकर,
मत पहने रहो तुम चूड़ी ।
दुर्गा, काली, लक्ष्मीबाई बनो,
ताकि सब बनाये रखे कुछ दूरी ।
  -जयप्रकाश नारायण उर्फ जेपी हंस

3 अप्रैल 2016

प्रत्यूषा बनर्जी पर एक गजल।

जमशेदपुर शहर के मशहूर टीवी कलाकार प्रत्यूषा बनर्जी का असमय गुजरने पर जमशेदपुर शहर में रहने वाले जेपी हंस की कलम भला कैसे चुप रह सकता । प्रस्तुत है एक गजल।
कम उम्र की जिंदगी मे कोई दीवाना न होता।काश ये जिंदगी बीच छोड़कर जाना न होता।
बहुत काँटे है जिंदगी के इस सफर में।
हर कांटों पर गुजरना सबको गवारा न होता।
वादे किये थे बहुत जहां सवारने को ।
इस तरह छोड़ने से उजाला न होता।।
चाहने वालों के दिल पर चर्चा है आपकी।
काश इनके सपनों को कोई सवांरा होता।
गम छाए है बहुत इस शहर में।
काश दुबारा जन्म लेकर यहाँ आना होता।
                           -जेपी हंस

प्रत्यूषा बनर्जी से एक सवाल

एक अप्रैल को बालिका वधु में आनंदी के नाम से हर घर मे छाने वाली प्रत्यूषा बनर्जी ने आत्महत्या कर अपनी जिंदगी समाप्त कर ली। प्रत्यूषा जमशेदपुर शहर के सोनारी के रहने वाली थी। मैं भी प्रत्यूषा के आवास से चंद कदमो की दूरी पर डेढ़ साल रहा । अभी भी जमशेदपुर मे ही हूँ ।
प्रत्यूषा की आत्महत्या पर इनके चाहने वाले बस एक ही लब्ज कह रहे है।
"हमें गम है शिकवे भी है,हजारों उन परवानो से।
कैसे बनू फैन उनके जो छोड़ चले जाते है जमाने से।

23 मार्च 2016

हमारा नया वर्ष आया है ।

आत्मीयता का विश्वास लेकर ।
मधुरता का पैगाम लेकर ।
दरिद्रता का अन्न लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
            नवजीवन में मुस्कुराहट लेकर ।
            खिले मन सा सुमन लेकर ।
            वनिता का सिंदूर लेकर ।
            भाई-भाई का प्रेम लेकर ।
            आज धरा पर आया है ।
            हमारा नया वर्ष आया है ।
विषम समाज की समता लेकर ।
दीर्घायू जनतंत्र की कामना लेकर ।
झगड़े-फसाद का कवच लेकर ।
अक्षय भंडार का वसुंधरा लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
            नव रश्मि में उजाला लेकर ।
            निर्बल का निराकरण लेकर ।
            धवल नवल सा प्रभात लेकर ।
            चेहरे का चमकी मुस्कान लेकर ।
            आज धरा पर आया है ।
            हमारा नया वर्ष आया है ।
सुरक्षा का सुदृढ़ आधार लेकर ।
मधुर बंधुत्व का विस्तार लेकर ।
आतंकी हमले से मुक्ति का प्रचार लेकर ।
अमन-चैन का उपहार लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
              -जेपी हंस



20 मार्च 2016

होली आई रे होली आई ।

होली आई रे होली आई ।
पहला होली उनका संग मनाई।
जो गिर पड़े है पउआ चढ़ाई।
पकड़ के उनका ऐसा नली मे गिराई।
जिसका गंध कोई न सह पाई।
होली आई रे होली आई ।
दूजे होली उनका संग मनाई।
जो फ़ूहड़ फ़ूहड़ दिन-रात गाना बजाई।
बहू-बेटी देखकर सीटी बजाई।
पकड़ के उनका ऐसा बंदर बनाई।
जिसका रूप मां-बाप न पहचान पाई।
होली आई रे होली आई ।
तीजे होली उनका संग मनाई।
जो रंग के नाम पर करते है लड़ाई।
पकड़ के उनका सतरंगी बनाई।
सतरंगी रूप मे आब समझ जाइ।
होली आई रे होली आई ।
चौथे होली उनका संग मनाई।
जिनका आपसे कभी नाता न रहाई।
पकड़ के उनका रंग-अबीर लगाई।
प्रेम,सद्भाव से प्रीत बधाई।
होली आई रे होली आई ।
पंचम होली उनका संग मनाई।
जो राग-द्वेष छोड़ गले लगाई।
पकड़ के उनका रंगोली बनाई।
जिसके प्रेम से भेदभाव मिट जाइ।
होली आई रे होली आई ।
                    -- जेपी हंस

शायरी

ये दुनिया ये महफिल बड़े काम का है।
मेरे टेबल पर रखा दवा जुकाम का है ।
खा न लेना दिल के दर्द का दवा समझकर,
ये मत समझना की तेरे जन्नत-ए-इंतजाम का है।
                                -- जेपी हंस

18 मार्च 2016

जयप्रकाश नारायण पर दिनकर की कविता



ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?

ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
किस तरह ठोकरे खाकर पाषाण की तरह हूँ खड़ा ।
आँधी आई, तुफान आया, फिर भी घुट-घुट कर हूँ पड़ा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाजिमी सोच-सोच में अभी मैं जिंदा हूँ ।
बातों को सुन-सुन के कातिल की तरह शर्मिदा हूँ ।
गर्दिश-ए-शर्मिंदगी को कैसे भगाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
सोचते है वे मैं लगता नाजूक सी कली हूँ ।
पर आँधियों के बीच मोम की तरह जली हूँ ।
जलती हुई मोम को कैसे बुझाऊं जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
हालात मेरे ऐसे है जैसे खुन से लथपथ काया ।
देखकर फिर भी न खुली किसी की निर्भिक माया ।
उनके निर्भिक काया को कैसे समझाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
बड़ी जतन से इस तन-मन को किसी ने है पाला-पोसा ।
भले अरमान की खातिर किसी अपने वारिश-ए-कमान सौपा ।
उनके अरमान को कैसे भूल जाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
वो ठोकरे मारता रहा मैं ऊँची सीढियाँ चढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों का आया कारवाँ फिर भी बढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों में उन्हें उलझा सकता था जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाख ठोकर खाया फिर भी न किया उनका विरोध ।
उनके ही कुशल कृत्यों से हमने किया नया शोध ।
मेरे ही शोध पर उनके घर जगमगाऐ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?


4 मार्च 2016

जेएनयू में लगाये गए नारे अभिव्यक्ति की आजादी नही ।


दिल्ली हाईकोर्ट ने जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को छह महीने की अंतरिम जमानत मंजूर की लेकिन कहा कि परिसर के एक कार्यक्रम के संबंध में दर्ज प्राथमिकी से लगता है कि यह राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का मामला है जिसका राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा करने का प्रभाव है। कन्‍हैया को जमानत देते समय हाईकोर्ट ने देशभक्ति का पाठ पढ़ाते हुए कई गंभीर टिप्‍पणियां कीं, जो नीचे दिए गए हैं:-
- जेएनयू में 9 फरवरी को हुए कार्यक्रम में जो पोस्टर और नारे लगाए गए थे उसकी तुलना दिल्‍ली हाईकोर्ट ने संक्रमण से की है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यह संक्रमण जेएनयू के छात्रों में फैल गया है और यह महामारी का रूप ले इससे पहले इस पर नियंत्रण जरूरी है।
- यह राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का मामला है जिसका राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा करने का प्रभाव है। कन्हैया को सशर्त राहत देने वाले उच्च न्यायालय ने कहा कि वह ऐसी किसी गतिविधि में सक्रिय या निष्क्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेंगे जिसे राष्ट्रविरोधी कहा जाए।
-हाईकोर्ट ने कहा है कि नारेबाजी व पोस्टरों में जिस तरह का विरोध हुआ या भावनाएं जाहिर की गईं उससे छात्र समुदाय को आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है।
-हाईकोर्ट ने कहा है कि इस तरह की गतिविधियों से शहीद के परिवारों का मनोबल गिरता है जो सीमा पर देश की रक्षा करते हुए कुर्बानी देते हैं।
-जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहा है कि जेएनयू के शिक्षकों को रास्ते से भटके छात्रों को सही रास्ते पर लाने में भूमिका निभानी चाहिए, जिससे कि वे देश के विकास में योगदान दे सकें, उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकें जिसके लिए जेएनयू की स्थापना हुई।
-जेएनयू में कार्यक्रम में जो भी नारे या पोस्टर लगाए गए थे, उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं कही जा सकती। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है लेकिन यह अधिकार संविधान के दायरे में होनी चाहिए। अनुच्छेद 51ए में जिम्मेदारियां भी हैं।
-अदालत ने हिन्दी फिल्म ‘उपकार’ के देशभक्ति गीत का हवाला देते हुए यह बात रखी कि जेएनयू परिसर में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
- दिल्ली हाईकोर्ट जज कन्‍हैया को देशप्रेम का पाठ पढ़ाया।
-न्यायाधीश ने जमानत आदेश की शुरुआत में कहा कि 'रंग हरा हरिसिंह नलवे से, रंग लाल है लाल बहादुर से, रंग बना बसंती भगत सिंह, रंग अमन का वीर जवाहर से, मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती, मेरे देश की धरती।’
- ये राष्ट्रभक्ति से भरा गीत संकेत देता है कि हमारी मातृभूमि के प्रति प्यार के अलग-अलग रंग हैं। वसंत के इस मौसम में जब चारों ओर हरियाली है और चारों ओर फूल खिले हुए हैं, ऐसे में जेएनयू कैंपस से शांति का रंग क्यों गायब हो रहा है।
- कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ हमारे कुछ कर्तव्य भी हैं, जिसे समझने की जरूरत है। अगर कोई आजादी के नारे लगाता है, तो वह यह नहीं सोच पाता कि वह सुरक्षित इसलिए है क्योंकि हमारे जवान वहां अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं, जहां ऑक्सीजन तक नहीं है।
- यह विचार करने योग्य बातें हैं कि जिस तरह से छात्रों के बीच एक संक्रमण फैला है, उसे कंट्रोल करना जरूरी है। इससे पहले की यह महामारी का रूप ले ले, इसे खत्म करना होगा।
विशेष टिप्पणी:-  इससे सीख ले  वोट बैंक से ऊपर देशभक्ति होता है ।

2 मार्च 2016

जब पढ़ाई में मन न लगे तो क्या करें....



अगर पढ़ाई में मन नहीं लगता है तो ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है । आप धैर्य रखे, आप जैसे कई बच्चे है, जिनका पढ़ाई में मन नहीं लगता । यह सर्वविदित है कि ईश्वर जब जन्म देता है तो उसके कर्म क्षेत्र को भी निर्धारित कर देता है । हालांकि कोई यह नहीं देखना चाहता है कि बच्चे चाहते क्या हैं, क्या किसी ने प्यार से इसके बारे में जानने की कोई कोशिश की है ? घर-परिवार के लोग, यहाँ तक कि माँ-बाँप भी नहीं समझ पाते या नहीं समझना चाहते कि उनका बच्चा आखिर चाहता क्या है ? प्रथम दृष्टया तो अभिभावक या माता-पिता को यह तहकीकात करना चाहिए कि कहीं बच्चों किसी गलत की संगति में तो नहीं आ गया है, अगर इस तरह कुछ जानकारी प्राप्त होती है तो उसे आध्यात्मिक शिक्षा दे । तब उसे पाठ्यक्रमिक शिक्षा की ओर लाना चाहिए । अगर फिर भी पढ़ाई में मन नहीं लगता हो तो कुछ तो ऐसा होगा जिसमें बच्चों का मन लगता होगा या फिर जिसे करना उसे अच्छा लगता होगा जैसे खेलना, घूमना, एक्टिंग, मिमिक्री करना, पेंटिंग करना, गाना-बजाना इत्यादि । इनमें से कोई या कुछ और भी । सोचें और अपने मन का काम तलाशें । जल्दीबाजी में कुछ न करें । अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए । घर में जो प्रिय हो या जो आपके बात को अच्छी तरह से सुनता समझता हो, उससे इसके बारे में बात करना चाहिए । जो भी चीज अपने मन का लगे, उसी में पूरी तरह डूब कर आगे बढ़ने का प्रयास करें । आप जिस क्षेत्र में अच्छा करेंगे तो चमत्कारी उपलब्धियाँ देखने को मिल सकती हैं । आप साधारण से असाधारण बनने की ओर अग्रसर हो सकते है ।

26 फ़रवरी 2016

पोमपोर की घटना पर कायराना हरकत



आप जो तस्वीर देख रहे है वह 24 फरवरी, 2016 के दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण की कटिंग है ।
      जिसमें 23 फरवरी को जम्मू के पोमपोर के एक इमारत में छिपे आतंकियों पर हुई कार्रवाई  का जिक्र है । साथ ही इस कटिंग में जो बातें पढिएगा उससे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएगा ।
      जी, हाँ दोस्तों, मैं उस बात का जिक्र कर रहा हूँ जिसमें हमारे भारतीय सेना जान जोखिम में डाकर सौ से ज्यादा लोगों को उस इमारत से बाहर निकाला जिसमें आतंकी छिपे थे । सेना ने आतंकियों को मार गिराया । उक्त कार्रवाई में हमारे जाबाज सैनिक भी शहीद हुए, लेकिन वहाँ के कुछेक नवयुवकों ने सैनिक बल पर पत्थर फेके साथ ही आसपास स्थित बहुत से मस्जिदों से पाकिस्तान के समर्थन में नारे भी लगाए गए ।
     वाह, यह कौन सा देश है, जिसके सैनिक आपके लिए जान देने के लिए तैयार रहे और आप उलटे उसे हतोत्साहित करें और पथवार करें । हमारे देश में इस तरह की घटना को कुछेक नवयुवकों की भ्रमित मानसिकता बताकर छोड़ दिया जाता है । मस्जिदों से सेना को हतोत्साहित करने वाले नारे लग रहे थे । क्या उसपर कोई कार्रवाई होगी ? होगी भी नहीं क्योंकि इस तरह की बातों को विचारों की अभिव्यक्ति कहा जाता है ।
      अगर बचाव में कोई सैनिक हवाई फायरिंग करता है और किसी नागरिक की मौत हो जाती है तब तो हमारे देश के ढपोरसंखी सेकुलर जमात के लोग छाती पीट-पीट कर विधवा विलाप करेंगे, क्योंकि वे उनके वोट बैंक है । वो देश के साथ कुछ भी करे सब माफ है । किसी राजनेता ने तो यहाँ तक कहा है कि सैनिक तो सीमा पर मरने के लिए जाते हैं । यह कोड़ा बकवास है । हाँलाकि यह बात सच है कि इंसान तो जन्म ही इसलिए लेता है कि उनका एक दिन मृत्यु जरूर होगा, लेकिन कायरों की भाँति नहीं, वीर शहीदों की भाँति। अगर किसी भी देश में सबसे ज्यादा विश्वास रहता है तो वह सरकार से ज्यादा सेना पर होता है । सेना बल किसी भी परिस्थिति में हमारे मदद के लिए तैयार रहता है अगर इसी तरह आतंकियों को महिमामंडित किया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जब पूरा भारतवर्ष आतंकियों को गढ़ बन जाएगा ।
     तभी मेरे मन से यही उद्गार उत्पन्न होता है ।
न हमें डर है मस्जिद के इन नारों से,
न हमें डर है तिरगे के बदले लहराने चाँद तारों से,
न डर है नेता जी के आरोप-प्रत्यारोप के वारों से,
हमें तो डर है देश में छिपे छद्म ढपोरसंखी गद्दारों से ।
                                                                                                                                           
हमें न नक्सलवाद प्यारा है और न हमें तेरे ढपोरसंखी सेकुलरवाद प्यारा है ।
हमारे रगों में जिसका बहता है खून, उस मातृभूमि का राष्ट्रवाद प्यारा है ।

                                    जय हिन्द
                                    जेपी हंस


21 फ़रवरी 2016

राजदीप सरदेसाई जी के आलेख पर काउन्टर कमेंन्ट्स

प्रिय राजदीप सरदेसाई जी,         
            दिनांक 20 फरवरी, 2016 को दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में छपी आलेख, हाँ, मैं राष्ट्र विरोधी हूँ, क्योंकि मैंने पढ़ा, अधूरा नहीं, पूरा पढ़ा ।
लेख पढ़कर मुझे आपसे सहमति तो नहीं, लेकिन सहानुभूति जरूर हुई ।
आपकी कुंठा, आपकी छटपटाहट.........  
आपके हर एक शब्द से झलक रही थी । स्वाभाविक है, क्योंकि जिस विचारधारा को आप लगातार विरोध करते आयें हैं ।
उसी विचारधारा को डंका पूरे भारत ही नहीं, विश्व में बजने लगा हो तो आपको फ्रस्ट्रेशन आना अत्यंत स्वाभाविक है । आप निश्चित नहीं भूले होंगे इस वाकया को जब प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहली बार अमेरिका गए और न्यूयार्क के मेडिसन स्कवायर में वहाँ के प्रवासी भारतीयों की एक विशाल सभा को उन्होंने संबोधित किया ।
आप भी उस ऐतिहासिक सभा को कवर करने गए थे ।
आपको दुर्भाग्य से वहाँ की भीड़ ने आपको पहचान लिया......
वो आपको खरी-खोटी सुनाने लगे । आपको तो बहस करने में महारत हासिल है तो आप भी भीड़ गए...
और आपका तो उस भीड़ ने केवल बोलती बंद की न केवल आपको ट्रेटर (गद्दार) कहा, वरन आपको दो/चार घूसे भी जड़े । तब की आप की कुंठा को मैं समझ सकता हूँ ।
तब आपने कहा था-                                             
भारत के लोग तो अनपढ, गवार, उन्मादी होते है......
लेकिन अमेरिका के न्यूयार्क में जहाँ पढ़े-लिखे, उच्च शिक्षित भारतीय रहते है,
 ये लोग भी आपको ट्रेटर (गद्दार) कहते है ।
क्या है जी, क्या आपने कभी सोचा होगा कि ये सारे पढे-लिखे लोग भी
आपके बारे में ऐसे क्यूँ सोचते हैं, जरा मन में विचार करें...
            आगे आपने लिखा है कि हाँ, मैं राष्ट्र-विरोधी हूँ क्योंकि मेरा भरोसा मुक्त रूप से भाषण देने के अधिकार की व्यापक परिभाषा है, जैसा की संविधान के अनुच्छेद 19 में दी गई है । केवल दो ही विवेक संगत बंधन है हिंसा को उकसावा और नफरत फैलाने वाला भाषण न हो । नफरत फैलाने वाला भाषण क्या हो सकता है, यह बहस का विषय है ।
जैएनयू जैसे प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों को इन्हीं भारत विरोधी विचारों और संस्कारों को पनपने की नर्सरी बना दिया गया,
जहाँ छतीसगढ़ में माओवादी हमले में शहीद सैनिक पर जश्न मनाया जाता है । 
जहाँ क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया जाता है ।
जहाँ भारत को दस-दस टुकड़े कर देने की नारे लगते है ।
जहाँ कश्मीर को भारत से आजाद कराने के नारे लगते है ।
जहाँ भारत की संप्रबुत की प्रतीक संसद पर हमला करने वाले अफजल को शहीद के रूप में महिमामंडित करने जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं ।
संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर यह सब राष्ट्र-विरोधी कृत्य करने वाले यह भूल रहे हैं कि उसी संविधान के अनुच्छेद 19(2) में इस अभिव्यक्ति की सीमाएं तय की गई है । इसमें देश की संप्रभुता, देश के प्रति निष्ठा और देशहित को बनाये रखने के विरूद्ध अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक है, यानि ऐसी अभिव्यक्ति या कृत्य देशद्रोह की श्रेणी में आता है, जो जेएनयू में 9 फरवरी को हुआ, उसे देशद्रोह के दायरे से बाहर कैसे रखा जा सकता है, जबकि यह भारत की संप्रभूता और अखंडता को खुली चुनौती है ।
आपका
अनपढ, गवार, भारतीय राष्ट्रवादी नागरिक
जेपी हंस

11 फ़रवरी 2016

सरस्वती संघ, पटना के पावन संदेश

                                                    
आध्यात्मिक चेतना के कारण भारत का अतीत सदा से गौरवमय रहा है । विदेशी आक्रमण के कारण हमारा सांस्कृतिक पक्ष कुछ अस्त व्यस्त जरूर हुआ परन्तु हमारी लेखनी आदर्श और कर्तव्य-बोध कराने में कभी पीछे नहीं रही । तभी तो कहा जाता है-
            ।। दुर्लभ भारतं देशे जन्म: ।।
प्रारम्भ से ही किसी भी राष्ट्र के आधार स्तम्भ और कर्णधार के रूप में छात्रों को जाना जाता रहा है । गुरूकुल में अपनी त्यागशीलता, सेवा और समर्पण का पाठ पढ़कर गुरू से आशीर्वाद प्राप्त कर छात्र कर्म-पथ निकलते थे और सम्पूर्ण राष्ट्र के गौरव को उज्जवल से उज्जवलतम रूप प्रदान करने में सफल होते थे । आज भी राष्ट्र का विकास, आध्यात्मिक चेतना की जागृति एवं नये कल का निर्माण के लिए उन्हीं की ओर हमारी दृष्टि जाती है । इतिहास साक्षी है कि जब भी राष्ट्र में कोई बड़ा परिवर्तन हुआ है तो छात्रों के सहयोग से ही संभव हो सका है ।
            युग और परिस्थिति के कारण अथवा नैतिक पक्षों पर ध्यान नहीं देने के कारण आज के प्रायः छात्र अपने कर्तव्य को भूलते जा रहे हैं । शिक्षा के स्तर में आई गिरावट के कारण छात्र जाति-पाति, राजनितिक दलबन्दी आदि के शिकार हो गये हैं । चुनाव से लेकर दैनिक जीवन में भी इनका जमकर दुरुपयोग होता है । आज के छात्र आध्यात्मिकता से पृथक अपने चेहरे पर चरित्रहीनता, जातिवाद, संक्रीर्ण मानसिकता आदि के कलंक निरन्तर लगाते जा रहे हैं । छात्रों से लोगों की आस्था अब इस तरह उठ चुकी है कि इनसे सृजनात्मक कार्यों की अपेक्षा बिल्कुल नहीं की जा सकती है । आधुनिक छात्रों ने पशुवत प्रवृति को लेकर स्वार्थ में जीना सिख लिया है । शिक्षकों और माता-पिता के प्रति सेवा और समर्पण की भावना मिट चुकी है ।
            ऐसी बात नहीं कि हमारे राष्ट्र के सभी छात्रों की स्थिति यही है । अभी भी सीमित संख्या में ही सही एक से एक प्रतिभावान लाल गुदड़ी में छिपे है । क्या  हमारा यह दायित्व नहीं बनता है कि हम सभी मिलकर अपने खोते जा रहे गौरव को लौटायें ? क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम मानवता की पूजा करें ? क्या अपने गुरुजनों एवं माता-पिता का आशीर्वाद हमें फिर से नहीं मिल सकता ? क्या विनाश और ध्वंसात्मक कृत्यों की ओर कदम बढ़ाने वाले भाईयों को हम लौटा नहीं सकते ?
            इन्हीं लक्ष्यों की पुर्ति हेतु सन् 1964 ई. के श्रावण मास में सरस्वती संघ की स्थापना की गई । आज इस संघ की विभिन्न शाखायें अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु विभिन्न दिशाओं में कार्यरत है, अर्चना प्रार्थनाओं के आधार पर ही हम अपना कार्यक्रम प्रत्येक रविवार को माँ सरस्वती के समक्ष पूर्ण समर्पित भाव से प्रस्तुत करते हैं । आज हजारों की संख्या में भटकती हुई युवा मानसिकता अध्ययन के साथ-साथ अध्यात्म की महता को व्यवहारिक रूप में समझ रही है । संघ के सदस्य संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कदम से कदम मिलाकर चलने में गौरव का अनुभव कर रहे हैं ।
गुलाब जी की शब्दावली में-                                                                
            विषमती, फूट, मिथ्याचार भागे ।
            सभी को उदय, नव ज्योति जागे ।।
            विजित को प्यार से तक्षक विषैले ।

            दयामय ! विश्व में सद्भाव फैले ।।