सुविचार

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5 जनवरी 2016

आराम करो महाशय जी...

#कॉपी_पेस्ट
आराम करो  महाशय जी
गरम  रजाई को ओढ़ ।
समझ गए नहीं दे पाओगे
तुम जवाब मुँह तोड़ ।।
बर्दास्त नहीं अच्छे दिनों में
घुट घुट कर यूं जीना ।
आर्टिफीशियल लगता है
वो छप्पन इंची सीना  ।।
मरते जाएँ सैनिक अपने
देते रहे  यूं  शहादत ।
फर्क नहीं पड़ता तुम्हे
यह है तुम्हारी आदत
मंचो पर जब भी आते
झूठी हुंकार भरते हो ।
पता नहीं क्या है मन में
बस मन की बातें करते हो ।।
प्रेमपत्र तुमने भी भेजे
कर ली खूब मुलाकातें ।
तुमने हाथ मिलाया खूब
पर उसने मारी लातें  ।।
अब भी खून न खौला हो तो
फिर से एक दौरा कर लो ।
रह गया हो बाकी कुछ तो
फिर से अपनी छाती भर लो ।।
ट्विटर पर  हुंकार लो फिर से
शब्दों के तीर छोड़ .....।
समझ गए  नहीं दे पाओगे
तुम जवाब मुँह तोड़   ।।
                       -अज्ञात

साथी घर जाकर मत कहना...

पठानकोट .........
जब वो युद्ध में घायल हो जाता है तो अपने साथी से बोलता है :
“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी माता पूछे तो, जलता दीप बुझा देना!
इतने पर भी न समझे तो, दो आंसू तुम छलका देना!!"
“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी बहना पूछे तो, सूनी कलाईदिखला देना!
इतने पर भी न समझे तो, राखी तोड़ देखा देना !!"
“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरी पत्नी पूछे तो, मस्तक तुम झुका लेना!
इतने पर भी न समझे तो, मांग का सिन्दूर मिटा देना!!"
“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरे पापा पूछे तो, हाथो को सहला देना!
इतने पर भी न समझे तो, लाठी तोड़ दिखा देना!!"
“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरा बेटा पूछे तो, सर उसका तुम सहला देना!
इतने पर भी ना समझे तो, सीने से उसको लगा लेना!!"
“साथी घर जाकर मत कहना, संकेतो में बतला देना;
यदि हाल मेरा भाई पूछे तो, खाली राह दिखा देना!
इतने पर भी ना समझे तो, सैनिक धर्म बता देना!!"
#जय_हिन्द
                                        -अज्ञात

पठानकोट कैम्प पर हमले के विरोध में देशभक्ति गीत

1 जनवरी 2016

ये न्यू ईयर मंजूर नही

हवा लगी पश्चिम की सारे कुप्पा बनकर फूल गए
ईस्वी सन तो याद रहा अपना संवत्सर भूल गए
चारों तरफ नए साल का ऐसा मचा है हो-हल्ला
बेगानी शादी में नाचे ज्यों दीवाना अब्दुल्ला
धरती ठिठुर रही सर्दी से घना कुहासा छाया है
कैसा ये नववर्ष है जिससे सूरज भी शरमाया है
सूनी है पेड़ों की डालें, फूल नहीं हैं उपवन में
पर्वत ढके बर्फ से सारे, रंग कहां है जीवन में
बाट जोह रही सारी प्रकृति आतुरता से फागुन का
जैसे रस्ता देख रही हो सजनी अपने साजन का
अभी ना उल्लासित हो इतने आई अभी बहार नहीं
हम नववर्ष मनाएंगे, न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं
लिए बहारें आँचल में जब चैत्र प्रतिपदा आएगी
फूलों का श्रृंगार करके धरती दुल्हन बन जाएगी
मौसम बड़ा सुहाना होगा दिल सबके खिल जाएँगे
झूमेंगी फसलें खेतों में, हम गीत खुशी के गाएँगे
उठो खुद को पहचानो यूँ कबतक सोते रहोगे तुम
चिन्ह गुलामी के कंधों पर कबतक ढोते रहोगे तुम
अपनी समृद्ध परंपराओं का मिलकर मान बढ़ाएंगे
भारतवर्ष के वासी अब अपना नववर्ष मनाएंगे
 हमारी संस्कृति  हमारी विरासत 
                                   -अज्ञात