सुविचार

जेपी-डायरी में आपका स्वागत है । अपना मूल्यवान समय निकालकर आने हेतु आभार । अपनी प्रतिक्रिया देना न भूलें ।

जेपी हंस

मेरी फ़ोटो
मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- jphans25@gmail.com

23 मार्च 2016

हमारा नया वर्ष आया है ।

आत्मीयता का विश्वास लेकर ।
मधुरता का पैगाम लेकर ।
दरिद्रता का अन्न लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
            नवजीवन में मुस्कुराहट लेकर ।
            खिले मन सा सुमन लेकर ।
            वनिता का सिंदूर लेकर ।
            भाई-भाई का प्रेम लेकर ।
            आज धरा पर आया है ।
            हमारा नया वर्ष आया है ।
विषम समाज की समता लेकर ।
दीर्घायू जनतंत्र की कामना लेकर ।
झगड़े-फसाद का कवच लेकर ।
अक्षय भंडार का वसुंधरा लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
            नव रश्मि में उजाला लेकर ।
            निर्बल का निराकरण लेकर ।
            धवल नवल सा प्रभात लेकर ।
            चेहरे का चमकी मुस्कान लेकर ।
            आज धरा पर आया है ।
            हमारा नया वर्ष आया है ।
सुरक्षा का सुदृढ़ आधार लेकर ।
मधुर बंधुत्व का विस्तार लेकर ।
आतंकी हमले से मुक्ति का प्रचार लेकर ।
अमन-चैन का उपहार लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
              -जेपी हंस



20 मार्च 2016

होली आई रे होली आई ।

होली आई रे होली आई ।
पहला होली उनका संग मनाई।
जो गिर पड़े है पउआ चढ़ाई।
पकड़ के उनका ऐसा नली मे गिराई।
जिसका गंध कोई न सह पाई।
होली आई रे होली आई ।
दूजे होली उनका संग मनाई।
जो फ़ूहड़ फ़ूहड़ दिन-रात गाना बजाई।
बहू-बेटी देखकर सीटी बजाई।
पकड़ के उनका ऐसा बंदर बनाई।
जिसका रूप मां-बाप न पहचान पाई।
होली आई रे होली आई ।
तीजे होली उनका संग मनाई।
जो रंग के नाम पर करते है लड़ाई।
पकड़ के उनका सतरंगी बनाई।
सतरंगी रूप मे आब समझ जाइ।
होली आई रे होली आई ।
चौथे होली उनका संग मनाई।
जिनका आपसे कभी नाता न रहाई।
पकड़ के उनका रंग-अबीर लगाई।
प्रेम,सद्भाव से प्रीत बधाई।
होली आई रे होली आई ।
पंचम होली उनका संग मनाई।
जो राग-द्वेष छोड़ गले लगाई।
पकड़ के उनका रंगोली बनाई।
जिसके प्रेम से भेदभाव मिट जाइ।
होली आई रे होली आई ।
                    -- जेपी हंस

शायरी

ये दुनिया ये महफिल बड़े काम का है।
मेरे टेबल पर रखा दवा जुकाम का है ।
खा न लेना दिल के दर्द का दवा समझकर,
ये मत समझना की तेरे जन्नत-ए-इंतजाम का है।
                                -- जेपी हंस

18 मार्च 2016

जयप्रकाश नारायण पर दिनकर की कविता



ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?

ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
किस तरह ठोकरे खाकर पाषाण की तरह हूँ खड़ा ।
आँधी आई, तुफान आया, फिर भी घुट-घुट कर हूँ पड़ा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाजिमी सोच-सोच में अभी मैं जिंदा हूँ ।
बातों को सुन-सुन के कातिल की तरह शर्मिदा हूँ ।
गर्दिश-ए-शर्मिंदगी को कैसे भगाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
सोचते है वे मैं लगता नाजूक सी कली हूँ ।
पर आँधियों के बीच मोम की तरह जली हूँ ।
जलती हुई मोम को कैसे बुझाऊं जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
हालात मेरे ऐसे है जैसे खुन से लथपथ काया ।
देखकर फिर भी न खुली किसी की निर्भिक माया ।
उनके निर्भिक काया को कैसे समझाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
बड़ी जतन से इस तन-मन को किसी ने है पाला-पोसा ।
भले अरमान की खातिर किसी अपने वारिश-ए-कमान सौपा ।
उनके अरमान को कैसे भूल जाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
वो ठोकरे मारता रहा मैं ऊँची सीढियाँ चढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों का आया कारवाँ फिर भी बढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों में उन्हें उलझा सकता था जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाख ठोकर खाया फिर भी न किया उनका विरोध ।
उनके ही कुशल कृत्यों से हमने किया नया शोध ।
मेरे ही शोध पर उनके घर जगमगाऐ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?


2 मार्च 2016

जब पढ़ाई में मन न लगे तो क्या करें....



अगर पढ़ाई में मन नहीं लगता है तो ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है । आप धैर्य रखे, आप जैसे कई बच्चे है, जिनका पढ़ाई में मन नहीं लगता । यह सर्वविदित है कि ईश्वर जब जन्म देता है तो उसके कर्म क्षेत्र को भी निर्धारित कर देता है । हालांकि कोई यह नहीं देखना चाहता है कि बच्चे चाहते क्या हैं, क्या किसी ने प्यार से इसके बारे में जानने की कोई कोशिश की है ? घर-परिवार के लोग, यहाँ तक कि माँ-बाँप भी नहीं समझ पाते या नहीं समझना चाहते कि उनका बच्चा आखिर चाहता क्या है ? प्रथम दृष्टया तो अभिभावक या माता-पिता को यह तहकीकात करना चाहिए कि कहीं बच्चों किसी गलत की संगति में तो नहीं आ गया है, अगर इस तरह कुछ जानकारी प्राप्त होती है तो उसे आध्यात्मिक शिक्षा दे । तब उसे पाठ्यक्रमिक शिक्षा की ओर लाना चाहिए । अगर फिर भी पढ़ाई में मन नहीं लगता हो तो कुछ तो ऐसा होगा जिसमें बच्चों का मन लगता होगा या फिर जिसे करना उसे अच्छा लगता होगा जैसे खेलना, घूमना, एक्टिंग, मिमिक्री करना, पेंटिंग करना, गाना-बजाना इत्यादि । इनमें से कोई या कुछ और भी । सोचें और अपने मन का काम तलाशें । जल्दीबाजी में कुछ न करें । अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए । घर में जो प्रिय हो या जो आपके बात को अच्छी तरह से सुनता समझता हो, उससे इसके बारे में बात करना चाहिए । जो भी चीज अपने मन का लगे, उसी में पूरी तरह डूब कर आगे बढ़ने का प्रयास करें । आप जिस क्षेत्र में अच्छा करेंगे तो चमत्कारी उपलब्धियाँ देखने को मिल सकती हैं । आप साधारण से असाधारण बनने की ओर अग्रसर हो सकते है ।