जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

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18 मार्च 2016

ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?

ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
किस तरह ठोकरे खाकर पाषाण की तरह हूँ खड़ा ।
आँधी आई, तुफान आया, फिर भी घुट-घुट कर हूँ पड़ा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाजिमी सोच-सोच में अभी मैं जिंदा हूँ ।
बातों को सुन-सुन के कातिल की तरह शर्मिदा हूँ ।
गर्दिश-ए-शर्मिंदगी को कैसे भगाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
सोचते है वे मैं लगता नाजूक सी कली हूँ ।
पर आँधियों के बीच मोम की तरह जली हूँ ।
जलती हुई मोम को कैसे बुझाऊं जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
हालात मेरे ऐसे है जैसे खुन से लथपथ काया ।
देखकर फिर भी न खुली किसी की निर्भिक माया ।
उनके निर्भिक काया को कैसे समझाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
बड़ी जतन से इस तन-मन को किसी ने है पाला-पोसा ।
भले अरमान की खातिर किसी अपने वारिश-ए-कमान सौपा ।
उनके अरमान को कैसे भूल जाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
वो ठोकरे मारता रहा मैं ऊँची सीढियाँ चढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों का आया कारवाँ फिर भी बढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों में उन्हें उलझा सकता था जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाख ठोकर खाया फिर भी न किया उनका विरोध ।
उनके ही कुशल कृत्यों से हमने किया नया शोध ।
मेरे ही शोध पर उनके घर जगमगाऐ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?


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