जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । वर्तमान में हिन्दी आशुलिपिक के पद पर पटना में कार्यरत । बेझिझक सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करना । अपनी मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

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21 फ़रवरी 2016

राजदीप सरदेसाई जी के आलेख पर काउन्टर कमेंन्ट्स

प्रिय राजदीप सरदेसाई जी,         
            दिनांक 20 फरवरी, 2016 को दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में छपी आलेख, हाँ, मैं राष्ट्र विरोधी हूँ, क्योंकि मैंने पढ़ा, अधूरा नहीं, पूरा पढ़ा ।
लेख पढ़कर मुझे आपसे सहमति तो नहीं, लेकिन सहानुभूति जरूर हुई ।
आपकी कुंठा, आपकी छटपटाहट.........  
आपके हर एक शब्द से झलक रही थी । स्वाभाविक है, क्योंकि जिस विचारधारा को आप लगातार विरोध करते आयें हैं ।
उसी विचारधारा को डंका पूरे भारत ही नहीं, विश्व में बजने लगा हो तो आपको फ्रस्ट्रेशन आना अत्यंत स्वाभाविक है । आप निश्चित नहीं भूले होंगे इस वाकया को जब प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहली बार अमेरिका गए और न्यूयार्क के मेडिसन स्कवायर में वहाँ के प्रवासी भारतीयों की एक विशाल सभा को उन्होंने संबोधित किया ।
आप भी उस ऐतिहासिक सभा को कवर करने गए थे ।
आपको दुर्भाग्य से वहाँ की भीड़ ने आपको पहचान लिया......
वो आपको खरी-खोटी सुनाने लगे । आपको तो बहस करने में महारत हासिल है तो आप भी भीड़ गए...
और आपका तो उस भीड़ ने केवल बोलती बंद की न केवल आपको ट्रेटर (गद्दार) कहा, वरन आपको दो/चार घूसे भी जड़े । तब की आप की कुंठा को मैं समझ सकता हूँ ।
तब आपने कहा था-                                             
भारत के लोग तो अनपढ, गवार, उन्मादी होते है......
लेकिन अमेरिका के न्यूयार्क में जहाँ पढ़े-लिखे, उच्च शिक्षित भारतीय रहते है,
 ये लोग भी आपको ट्रेटर (गद्दार) कहते है ।
क्या है जी, क्या आपने कभी सोचा होगा कि ये सारे पढे-लिखे लोग भी
आपके बारे में ऐसे क्यूँ सोचते हैं, जरा मन में विचार करें...
            आगे आपने लिखा है कि हाँ, मैं राष्ट्र-विरोधी हूँ क्योंकि मेरा भरोसा मुक्त रूप से भाषण देने के अधिकार की व्यापक परिभाषा है, जैसा की संविधान के अनुच्छेद 19 में दी गई है । केवल दो ही विवेक संगत बंधन है हिंसा को उकसावा और नफरत फैलाने वाला भाषण न हो । नफरत फैलाने वाला भाषण क्या हो सकता है, यह बहस का विषय है ।
जैएनयू जैसे प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थानों को इन्हीं भारत विरोधी विचारों और संस्कारों को पनपने की नर्सरी बना दिया गया,
जहाँ छतीसगढ़ में माओवादी हमले में शहीद सैनिक पर जश्न मनाया जाता है । 
जहाँ क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाया जाता है ।
जहाँ भारत को दस-दस टुकड़े कर देने की नारे लगते है ।
जहाँ कश्मीर को भारत से आजाद कराने के नारे लगते है ।
जहाँ भारत की संप्रबुत की प्रतीक संसद पर हमला करने वाले अफजल को शहीद के रूप में महिमामंडित करने जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं ।
संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर यह सब राष्ट्र-विरोधी कृत्य करने वाले यह भूल रहे हैं कि उसी संविधान के अनुच्छेद 19(2) में इस अभिव्यक्ति की सीमाएं तय की गई है । इसमें देश की संप्रभुता, देश के प्रति निष्ठा और देशहित को बनाये रखने के विरूद्ध अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक है, यानि ऐसी अभिव्यक्ति या कृत्य देशद्रोह की श्रेणी में आता है, जो जेएनयू में 9 फरवरी को हुआ, उसे देशद्रोह के दायरे से बाहर कैसे रखा जा सकता है, जबकि यह भारत की संप्रभूता और अखंडता को खुली चुनौती है ।
आपका
अनपढ, गवार, भारतीय राष्ट्रवादी नागरिक
जेपी हंस