जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- jphanspatna@gmail.com

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6 मई 2019

रिश्ते, समाज और हम


कहा जाता है कि रिश्ते और परिवार समाज की अहम डोर होते हैं । जब नये-नये रिश्ते जुड़ते है तो नये समाज का निर्माण होता है । आधुनिकता के इस दौर में भौतिकता के चक्कर में समाज निर्माण की कार्य-गति धीमी पड़ती जा रही है । नित्य नये रिश्ते तो जुड़ रहे हैं, लेकिन पुराने रिश्ते में धीरे-धीरे दरार पैदा हो रही है । भौतिक साधनों की प्राप्ति में हम इस कदर व्यस्त हो चुके हैं कि किसी के पास बातचित और मिलने-जुलने की फुर्सत नहीं । जबकि आज बातचित का सबसे आसान और सस्ता साधन सबके पास उपलब्ध है ।
      हमारे समाज में ऐसे कई मौके आते है जिसमें मिलने-जुलने का अवसर मिलता है जैसे- शादी-विवाह, बर्थ-डे पार्टी, मैरेज एनिवर्सरी, गृह-प्रवेश, मुंडन समारोह, मृतक-भोज कार्यक्रम तथा पर्व-त्योहार । यह वह वक्त होता है जिसमें आप अगर सरकारी कार्यालय में भी कार्यरत हो तो छुट्टी मिलने की गुजाईश रहती है ।
      अभी शादी-विवाह का मौसम चल रहा है । यह वह समय है जब एक-दूसरे रिश्तेदारों से भेट-मुलाकात हो सकता है । इस समारोह में जाने से नये दोस्त और नये रिश्तेदारों के साथ अपने पुराने दोस्त, पास-पड़ोसियों और रिश्तेदारों से मिलकर खोयो आत्मीय रिश्तों को रिचार्ज कर सकते हैं । रिश्तों में दरार का एक ही कारण हो सकता है- आपसी मन-मुटाव या अपने आप को बड़ा महसुस करना, जिसे अहम भाव पैदा हो जाना भी कह सकते हैं । जब दो रिश्तों के बीच जब अहम भाव पैदा हो जायेंगे या मन-मुटाव कायम रहता तो इन आत्मीय रिश्तों को कभी रिचार्ज नहीं कर पायेगे और इस डोर को जुड़ने का फिर से वर्षों इंतजार करना पड़ेगा ।
      रिश्तेदारों और पड़ोसियों में टकराव इस कदर हो रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर मुंह मोड़ लिया जा रहा है । जिस किसी व्यक्ति का गाँव-घर उसके कार्यस्थल से एक-दो किलोमीटर दूर है वो पारिवारिक कलह की वजह से कार्य-स्थल का सफर पाँच-सात किलोमीटर दूर से जाना मुनासिब समझ रहा है, लेकिन पारिवारिक कलह को दूर करने का कोई प्रयास नहीं कर पा रहा है ।
      कई परिवार तो मुझे ऐसे मिले जो पास-पड़ोस और परिवार में बदले माहौल की वजह से अपने बच्चे और खुद गाँव-घर से दस-बीस किलोमीटर दूर रहते हैं । वहीं से घर आकर अपनी खेती-गृहस्थी की देखभाल करते और परिवार चलाते है । उनका कहना यहीं होता है कि गाँव-घर का माहौल बदला हुआ है । पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, जब एक-दूसरे से प्रेम पूर्वक मिलना जुलना होता था, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते थे, आज यह प्रचलन लगभग खत्म हो रहा है ।
      आखिर रिश्ते, रिश्तेदार, गाँव-घर में बदले माहौल के लिए कौन जवाबदेह है ? उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है ? कोई इसे सुधार करने के लिए आगे क्यों नहीं आ पा रहा है ? हमारे समाज में हर तरह की व्यवस्थायें मौजूद है, वो भी पहल क्यों नहीं कर पा रहा है ? हम कब तक इंतजार करेंगे, कही ऐसा न हो इंतजार करते-करते इतना देर हो जाए कि फिर इन्हें सुधरने की गुजाईश ही न हो । कहीं हमारे अकेले मस्त रहने की आदत हम पर ही भारी न पड़ने पड़ जाये ।


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