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3 अगस्त 2014

जिंदगी में हो अगर करना करिश्मा


आदमी जब ठान लेता स्वयं मन में,
ऊंगलियों से छेद कर देता गगन में,
मुँह लगाकर सोख लेता है समन्दर,
उलट देता है हिमालय एक क्षण में ।
जिंदगी में हो अगर करना करिश्मा,
बदल डालों तुम पुरातन आज चश्मा,
पालकी से उतर कर किरणें हँसेगा,
घाटियों में फिर भरेगी भव्य सुषमा
आपके ऊपर कहें किसकी दुआ है,
खिल उठा वो आपने जिसके हुआ है,
जिंदगी में आपने जब भी जहाँ पर ,
जो लिया संकल्प पूरा ही हुआ है ।
बात मत करना यहाँ संवेदना की
आदमी की भावभीनी भावना की,
लोग कब तारीफ करते हैं किसीकी,
रात दिन चलती हवा आलोचना की।
                                  -अज्ञात         


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