जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । वर्तमान में आयकर विभाग मे हिदी आशुलिपिक के पद पर कार्यरत । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

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2 अगस्त 2014

गजल


                            गजल

तोते दिखते ही नहीं, बाज नजर आते हैं ।
            बगुले और गिद्ध के समाज नजर आते हैं ।

मायने के आइने वे अन्दाज नजर आते हैं ।
             महफिल यह खुशियाँ बिखरेंगी कैसे ।

जब गाने वाले गायब, सिर्फ साज नजर आते हैं ।
            पद को जो दुनिया में हद करके छोड़ दें ।

कपटी के सर पे ही ताज नजर आते हैं ।
            असल में हम जिसका है उसे नहीं मिल पाता ।
ऐसे में कुटिल दगाबाज नजर आते हैं ।
                                        -अज्ञात        


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