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जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- jphans25@gmail.com

18 नवंबर 2014

क्या खत्म हो जाएगी लेखनी की दुनिया- भाग-2


कहा जाता है कि एक अच्छा ऐक्टर अपनी ऐक्टिंग से कुछ भी छुपा सकता है, पर उसकी हैंडराइटिंग उसके सारे भेद खोल सकती है । हैंडराइटिंग से व्यक्तित्व और भविष्य बांचने की कला कई सौ साल पुरानी है । अब जब हाथ से लिखना कम होता जा रहा है, तो ऐसे में हस्तलिपि में अटपटापन आएगा ही । लेखन का ताल्लुक आत्मा से है, व्यक्तित्व से है । अब चिट्ठियों को ही ले लीजिए । हाथ से लिखी सामग्री को पढ़ने पर लगता है कि शब्द प्रेम की चाशनी में घुलाकर कागज पर सहेज दिए गए हैं । पर अफसोस कि अब चिठ्ठियों लिखने की परंपरा खत्म हो रही है । अपराध और फॉरेंसिक साइंस के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैंडराइटिंग भी है । जिस तरह शातिर का सुराग कभी डीएनए टेस्ट, तो कभी फिंगर प्रिंट से लगाया जाता है, वैसे ही जरूरत पड़ने पर फॉरेसिंक साइंस एक्सपर्ट मौका-ए-वारदात पर मिली हैंडराइटिंग से अपराधी का पता लगाते हैं या किसी पेचीदा केस को सॉल्व करते हैं । पर हाथ की लिखावट तो अब गुम हो रही है । जो लोग लिख भी रहे हैं, तो उनकी हैंडराइटिंग में एकरूपता नहीं रहती ।
याद कीजिए उस दिन को जब मास्टर जी हर रोज सुलेख लिखवाते थे । वह भी नरकट की कलम से, जी हॉ, कोई 20-25 साल पहले क्लासरूम में बॉलपेन रखना बस्ते में बम रखने के समान था । दरअसल नरकट की कलम से लिखना हैंडराइटिंग अच्छी करने का सबसे कारगर तरीका होता है । क्लास में जिसकी राइटिंग सबसे अच्छी होती थी, उसके भाव चढ़े रहते थे । खराब हैंडराइटिंग वाला न सिर्फ हीनता बोध से ग्रस्त रहती थी, बल्कि इम्तिहान में नंबर भी कम आते थे । हैंडराइटिंग में फिसड्डी आशिक अपने प्रेमपत्र तक दूसरों से लिखवाते थे । अब प्रेमी और प्रेमिका भी अब हैंडराईटिंग वाले प्रेमपत्र नहीं के बराबर भेजते है । क्योंकि उनके जगह एस.एम.एस ने जगह बना लिया है । अब व्हाट्सऐप, टेलिग्राम, हाईक जैसे मैसेजिंग एप ने जगह अपना लिया है । इन एपों के माध्यम से पल-पल का हाल बिना प्रेमपत्र लिखे ही  जान जाता है । बहरहाल, दौर बदला, तो कलम भी बदल गई । नरकट की जगह पहले वॉलपेन ने ली और अब कंप्यूटर और मोबाइल वॉलपेन को भी छीनने पर आमदा है ।

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