जेपी हंस

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मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

सुविचार

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13 सितंबर 2015

हिन्दी की पोषण

किसी भी देश की राष्ट्रभाषा वहां की ज्ञान, चेतना और चिंतन की मूल धुरी होती है । ऐसे मे, हमारे ही घर-परिवारों में हिन्दी की उपेक्षा चिंतनीय है । अपनी राष्ट्रभाषा को मान देने की आकांक्षा कहीं गुम है । इसीलिए हर परिवार, हर नागरिक इसे अपना कर्तव्य समझे । जो राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी अस्मिता और सम्प्रभुता की प्रतीक है वह अपने आंगन में बेगानी-सी खड़ी है । ऐसे में जरूरी है कि भाषा को समृद्ध करने का प्रयाश हर भारतीय परिवार करे और समाज भी इसमे सकारात्मक सहयोग दे ।

राष्ट्रभाषा को मान और सम्मान दिलाने का काम केवल सरकारी प्रयासों और स्कूलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता । समाज और परिवार की भूमिका भी बड़ी अहम है । हिन्दी हमारी अपनी राजभाषा और मातृभाषा है । यदि हमारे परिवारों में कोई बच्चा अंग्रेजी शब्द का गलत उच्चारण भी करता है तो घर-परिवार के लोग उसे टोक देते हैं पर हिन्दी के मामले में इतनी सतर्कता देखने को नहीं मिलती । हमारा देश हिन्दी भाषी देश है । लेकिन हिन्दी के प्रति जो रवैया हमारे समाज और परिवार में देखने को मिलता है वह न केवल दुखद है बल्कि चिंतनीय भी है । मात्र स्कूली शिक्षा और सरकारी प्रयासों और सेमिनारों से हिन्दी को हमारे मन और जीवन में स्थान नहीं दिला सकता । हमारे घरों में बेगानेपन का दंश झेल रही हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने की शुरुआत और सद्प्रयास हमें अपने घरों के भीतर ही करना होगा । आने वाली पीढियों के मन में अपनी भाषा के लिए सम्मान और प्रेम हो न कि स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होने के नाते उसे जानने और पढ़ने की विवशता ।

हिन्दी का बेगानापन

हिन्दी को कामकाज की भाषा बनाने की कितनी ही दलीलें क्यों न दी जाएं पर अच्छी नौकरियों में प्राथमिकता अंग्रेजी बोलने और जानने वालों को दी जाती है । ये मुट्ठीभर अंग्रेजी पढ़ने और समझने वाले ही पद पाकर देश की दशा और दिशा तय करते हैं और हिन्दी के जानकार मन मसोस कर रह जाते हैं । आजादी के बाद का हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सपना आज भी अधूरा है । सरकारी संस्थान हिन्दी को तिरस्कार ही देते आए है वहीं राजभाषा अधिनियम के चलते भले ही कुछ काम हिन्दी में करना पड़े, पर अधिकता अंग्रेजी को ही रहती है यानि देश के अंदर आज भी हिन्दी अपनी पहचान और हक तलाश रही है । इसकी वजह देश की भाषाई अनेकता जैसे कारण भी है यथा मिजोरम, नागालैंड. तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, असम, गोवा और उतर-पूर्वी राज्य खुद को हिन्दी से नहीं जोड़ पाए है । खेद की विषय है कि राष्ट्रभाषा के नाम पर आज भी देश एकमत नहीं है मगर समय की मांग है कि शासन के स्तर पर इस दिश में सहमति बनाते हुए सार्थक और दृढ़तापूर्वक किया जाए ।

हिन्दी का सफरनामा

हिन्दी की संस्कृत के अति क्लिष्ट स्वरूप और अरबी, फारसी जैसी  विदेशी और पाली, प्राकृत जैसी देसी भाषाओं के मिश्रण ने व्यापक आधार प्रदान किया है । जिस भाषा को इतनी सारी बोलियां और भाषाएं सीचें, उसके गठन की मजबूती का अंदाजा लगाया जा सकता है । देखा जाए तो पुरातन हिन्दी का अपभ्रंश के रूप में जन्म 400 ई. से 550 ईं. में हुआ जब वल्लभी के शासन धारसेन ने अपने अभिलेश में अपभ्रंश साहित्य का वर्णन किया । प्राप्त प्रमाणों में 933 ईं. की श्रावकवर नामक पुस्तक अपभ्रंश हिन्दी का पहला ग्रंथ है परन्तु अमीर खुसरो हिन्दी के वास्तविक जन्मदाता थे, जिन्होंने 1283  में खड़ी बोली हिन्दी को इसका नाम हिन्दवी दिया । बस, तब से ही यह हिन्दवी, हिन्दी बनती गई, बढ़ती चढ़ती गई है और पूरी दुनिया में निरंतर पल्लवित-पुष्पित हो रही है ।