18 September, 2016

धरा की जननी कौन है?






विवश है आज धरा पर नारी,
अपनी अस्मत बचाने को ।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
पल-पल उन्हें सताने को ।


मुद्दे जघन्य है जर्रा-जर्रा पर,
कर्तव्यवान जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव !
धरा की जननी कौन है ?

पैरों तले लूट जाती इज्जत,
फैलती आसमां तक दूषित विचार ।
धिक्कार है जन्मना उस धरा पर,
जहाँ होती नारी का अपमान ।

छाई है चर्चा देश-दुनिया में,
नेतृत्व जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?

भूल गया क्या तु मानव,
धरा पर तुझको किसने लाया ।
तन-बदन पर पीड़ा सहकर,
कतरा-कतरा रक्त किसने बहाया ।

चर्चा है हर घर-चौपाल पर,
पास-पड़ोस जन क्यों मौन है ?
अब बताओ हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?

रोती बिलखती गर्भस्थ गृह से ही,
अपनी जिंदगी बचाने को।
तड़पनी पड़ती है नव मास तक,
हर नर-नारी को जनमाने को ।

रूह कराहती तब जर्रा-जर्रा में,
पुरूषत्व कहाँ अब मौन है ।
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?

कर ऐसी कारीगरी मानव,
मन से कर तु साक्षात्कार ।
भक्षक भक्ष कर, रक्षक रच कर,
नारी का कर सत्कार ।

चर्चे है हर जिह्वा-जिह्वा पर,
तरूणमन क्यों मौन है ?
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?

         -जेपी हंस

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "छोटा शहर, सिसकती कला और १४५० वीं ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. धरा की जननी की चिंता जन को करनी ही होगी।
    सार्थक चिंतन कविता में !

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