होली की यादें- भाग-2

बात आज से 18-19 वर्ष पहले की है, जब मैँ अपने ननिहाल में रहता था । होली में हमलोग गोबर और कीचड़ को एक- दूसरे पर फेककर मजे लेते थे । कोई भी व्यक्ति इस दौरान खाली नहीं जाता था । होली के दिन सुबह में हमलोग बाल्टी में गोबर घोलकर रखते थे । मेरे ननिहाल में नाना जी के घर के बगल से गली गुजरती है । इस गली से दूसरे गाँव के व्यक्ति अपने गाय, भैस, बैल को नदी में धोने के लिए ले जाते थे। सब हमारे नाना जी के घर से होकर जाते थे। मैं अपने ममेरे भाइयों के साथ छत से गली से गुजरने वाले सभी व्यक्तियों को गोबर घोरकर पराते थे, जिसे हम लोगों को बड़ा मजा आता था। हद तब हो गयी जब एक ऐसे व्यक्ति पर गोबर के घोल फेक दिया जो नदी से अपने जानवर को धोकर और खुद स्नान करके आ रहा था । फिर क्या था, हम लोग नाना जी के पिटाई के डर से छिप गए, लेकिन शाम को डांट सुननी ही पड़ी ।
जयप्रकाश नारायण
रामनगर, जमशेदपुर, झारखंड

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