जेपी हंस

मेरी फ़ोटो
मूल रूप से बिहार राज्य के अरवल जिला के निवासी । मां भारती का सच्चा सपूत। स्वतंत्र लेखक। मन की भावनाओं को लेखनी के रूप में कागज पर उतारना । पूर्वी दिल्ली से प्रकाशित पूर्वालोक, आयकर विभाग राँची से प्रकाशित आयकर जोहार, आयकर विभाग, पटना से प्रकाशित आयकर विहार, ऑनलाईन वेब पत्रिका पुष्पवाटिक टाईम्स, ब्लॉग-बुलेटिन, अनुभव एवं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाऐ. ई-मेल आई.डी- जेपी@डाटामेल.भारत या drjphans@gmail.com

सुविचार

शब्द क्रांति में आपका स्वागत है । अपना मूल्यवान समय निकालकर आने हेतु आभार । अपनी प्रतिक्रिया देना न भूलें ।

5 सितंबर 2019

शिक्षक का उद्देश्य, लक्ष्य एवं संदेश ।


      आमतौर पर शिक्षक शब्द का जिक्र आते ही हमारे मन में जो पहली तस्वीर उभरती है । वह हमारे स्कूल या कॉलेज के शिक्षक की होती है । इसमें दो राय नहीं कि इन दो संस्थाओं के शिक्षक हमें सबसे ज्यादा ज्ञान देते हैं । व्यक्ति के जीवन को बनाने में इन शिक्षकों का अमूल्य योगदान होता है । एक तरफ जहाँ स्कूल, कॉलेज के शिक्षक हमें सही दिशा दिखाते है तो वहीं इस संस्थाओं के बाहर भी हमें जीवन के हर मोड़ पर शिक्षक अलग-अलग रूप में मिल सकते हैं । देश-दुनिया की प्रेरणादायक शख्सियते, कोई किताब, कोई स्थान, कोई कहानी या यहाँ तक कि कोई फिल्म भी हमें शिक्षा दे सकती है ।
      शिक्षक का उद्देश्य विद्यार्थियों में सत्य, अहिंसा, त्याग, बंधुत्व, नैतिकता, राष्ट्रीय एकता एवं विश्वमैत्री जैसी उतम भावनाओं को विकसित करने के साथ-साथ व्यक्ति को समर्थ बनाती है तथा समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए मार्ग प्रशस्त करती है । छात्रों को समकालीन जीव की चुनौतियों से मुकाबला करने में सक्षम बनाने के साथ ही उनमें नैतिक एवं श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों का विकास ही हमारी शिक्षक का लक्ष्य होना चाहिए । इस उद्देश्यों की प्राप्ति में शिक्षकों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है ।
संदेशः- विद्यार्थियों को हमेशा सफलता के सपने देखना चाहिए । उसके लिए काम भी करें, दिशा-निर्देश लेते रहें । आपने यदि ईमानदारी से मेहनत किया है तो इसका परिणाम भी अच्छा आएगा । माता-पिता, अभिभावकों एवं शिक्षकों के निर्देशों को ध्यान से सुने । आपका उद्देश्य पैसे कमाने की मशीन बनना नहीं है अपितु सफल इंसान बनना है जो मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं को समझ सकें ताकि मानवता हमेशा जिंदा रहें । जीवन सुखमय होना चाहिए, न कि केवल भौतिक सुख-संसाधन को इकट्ठा करने में व्यस्त हो जाए । संस्कार को बचाकर रखें ताकि हम आने वाले समय में इसका नमूना पेश कर पाएं ।
विद्यार्थियों को है कि सफलता का की शॉर्टकट फॉर्मूला नहीं होता । खुदा-न-खास्ता अगर किसी को मिल भी जाता है तो वह टिकाऊ नहीं होता ।
      आज के तकनीकी युग में ऑनलाइन साइट की आपके शिक्षक हैं । निश्चित हो आप आधुनिक तकनीकी का उपयोग करें किंतु सोशल मीडिया के भ्रामक, अश्लील और दिशाविहीन सामग्री के उपयोग करने से बचें ।
अंत में- ओशो ने शिक्षक के बारें में एक गम्भीर बात कही है । वे कहते है, शिक्षक ज्ञान का प्रसारक नहीं है । राजनीतिज्ञ ये समझ गया, इसलिए शिक्षक का शोषण राजनीतिज्ञ भी करता है । सबसे आश्चर्य की बात है कि इसका शिक्षक को कोई बोध नहीं है कि उसका शोषण होता है । इस नाम पर कि वो समाज की सेवा करता है, उसका शोषण हो रहा है ।
अब सवाल ये है कि क्या हमारा शिक्षक सिस्टम के एक टूल में परिवर्तित हो गया है ? यदि ऐसा है तो यह किसी भी जीवंत-जाग्रत समाज के लिए खतरे की घंटी है । फिर भी चाहे कितने भी शिक्षक दिवस मना लिए जाएं, बदलाव की उम्मीद निष्फल रहेगा । जरूरी ये है कि हम कोशिश करें और शिक्षकों की मर्यादा को वापस लौटाएं । उनका सम्मान करें और गाहे-बगाहे उन्हें अपनी समीक्षा खुद करने के लिए प्रेरित भी करें ।

कैसे बने शिक्षक?


हमें अपने आस-पास जितने भी कैरिअर क्षेत्र दिखते है, उनमें जाने के लिए सामान्य या विशेष अध्ययन की जरूरत होती है । स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी में सामान्य शिक्षक, विभिन्न विषयों के शिक्षकों से लेकर मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, मेडिकल, बिजनेस, मार्केटिंग, फाइन आर्ट, नृत्य, संगीत, योग, शारीरिक शिक्षा आदि तक ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जहां शिक्षक की आवश्यकता नहीं हो । मूक-बधिर व मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पढ़ाने-सिखाने के लिए शिक्षकों में अलग तरह की योग्यता की जरूरत होती है । उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इन क्षेत्रों में शिक्षक बनने के लिए जहां पढ़ाई की जाती है, वहां भी शिक्षक होते हैं । इसलिए सबसे पहले तो यह तय करना जरूरी है कि आप कौन-से शिक्षक बनना चाहते हैं और क्यों ।
      आम-तौर पर बच्चे अपने शिक्षकों को देख कर बचपन में ही तय कर लेते हैं है कि उन्हें शिक्षक बनना है । लेकिन अगर आप शिक्षक बनने के प्रति गंभीर है तो आपको 11वीं कक्षा में तय कर लेना चाहिए, क्योंकि 12वीं कक्षा में अच्छे अंक लाकर आप स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए सर्टिफिकेट, डिप्लोमा या डिग्री कोर्स में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा दे सकते हैं । यदि आप कॉलेज अथवा यूनिवर्सिटी में टीचर (लेक्चरर या असिस्टेंट प्रोफेसर) बनना चाहते है तो विषय पहले तय करना होगा, वह विषय ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन में लेना होगा । उसमें 55% से अधिक अंक भी लाने होंगे । फाइन आर्ट, नृत्य, संगीत आदि का टीचर बनना हो तो बहुत कम उम्र (4 से 6 साल भी हो सकती है ) में ही अभ्यास शुरू करना होगा ।

शिक्षक दिवस विभिन्न देशों की नजरों में ।


शिक्षक के सम्मान में पूरी दुनिया झुकती है । 56 देशों की संस्कृतियों में शिक्षक का स्थान सबसे ऊपर है । अलग-अलग देशों में शिक्षक दिवस अलग-अलग दिन मनाया जाता है । यूनेस्को ने 5 अक्टूबर को वर्ल्ड टीचर्स डे घोषित किया है। यह दुनियाभर के शिक्षकों के मुद्दों को उठाने का दिन है ।
Ø  भारत में टीचर्स डे 5 सितम्बर को मनाया जाता है । दार्शनिक, शिक्षक एवं राष्ट्रपति रहे डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस पर मनाया जाता है ।
Ø  चीन में टीचर्स डे 10 सितम्बर को मनाया जाता है । दार्शनिक कन्फ्यूशियस की याद में यह परंपरा शुरू हुई थी ।
Ø  ईरान में प्रोफेसर अयातुल्ला मोर्तेजा मोताहारी की हत्या की याद में 2 मई को शिक्षक दिवस मनाया जाता है ।
Ø  तुर्की में शिक्षक कमाल अतातुर्क की याद में टीचर्स डे 24 नवंबर को मनाया जाता है ।
Ø  मलेशिया में यह दिन 16 मई को मनाया जाता है। किसी त्योहार की तरह मनाया जाने वाला यह दिन हरी गुरु कहलाता है ।
Ø  अमेरिका में मई के पहले मंगलवार को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
Ø  रुस में 5 अक्टूबर को शिक्षक सम्मानिक किए जातें हैं ।
Ø  बांग्लादेश में 4 अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है ।
Ø  नेपाल में अषाढ़ महीने की पूर्णिमा को शिक्षक दिवस मनाया जाता है ।
Ø  इसके अलावा पाकिस्तान, फिलीपींस, कुवैत, कतर, मालदीव, मॉरीशस, नीदरलैंड, अरबैजान, बुल्गारिया, कैमरुन, कनाडा आदि कुल 19 देश अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाते हैं ।

3 अगस्त 2019

बुढ़ी नानी का चश्मा


अक्सर याद आती है,
वो पुरानी चश्मा बुढ़ी नानी के ।
नित्य धूल झाड़ कर,
रेक पर ऐसे सहजती,
मानो कोई अनमोल हीरा ।
वो हीरा ही था,
नानी के लिए,
हर चीज देख पाती आज भी ।
जैसे वह वर्षों पहले देखा करती थी ।
उसे पहनकर,
जवानी अहसास होती ।
वरना, खो जाने पर,
बेसहारा बुढ़ापे की कसक में
सपने बुनती रहती ।

रविश कुमार जी को बहुत-बहुत बधाई...


सर्वप्रथम रेमन मैग्सेसे पुरस्कार फाउंडेशन को बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार कि उनकी संस्था ने सच्चाई की राह पर चलने वालों को बियाबान अंधेरे में आशा की एक किरण दिखा दी।
दूसरे नंबर पर एनडीटीवी इंडिया को बधाई और धन्यवाद कि उसने रवीश कुमार
को तमाम झंझावातों के बाद अपने न्यूज़ चैनल के साथ  दृढ़ता पूर्वक बनाए रखा।
रवीश कुमार ने बेसहारा और बेजुवान समाज को निरंतर कठिनाइयों के मार्ग पर चलते हुए जो सम्बल प्रदान किया है, उसके लिए शब्दों में आभार व्यक्त कर पाना असम्भव लग रहा है।
आम आदमी की आवाज और समस्या को सुनकर निराकरण का प्रयास करना, निभीक, निडर बन कर सत्य की राह पर सच्ची पत्रकारिता के मानदंड स्थापित करने के लिए श्री रवीश कुमार जी को एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले रेमैन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित होने को लख लख बधाईया ओर शुभकामनाए।

23 जुलाई 2019

पुल

चाहा था बनाऊंगा एक पुल तेरे दिल तक पहुचने को।
तुम्हें क्या पता कितना दर्द होता है प्यार में अपनों का।
मर-मिटने की कसमें खायी थी उस दिन,
आज बड़ी शिद्दत से जरूरत पड़ी है दिल तोड़ने का।

मेहंदी

मेहंदी मेरे नाम की लगने वाली थी।
फूल सपनों की खिलने वाली थी।
बीत गयी सोलह सावन देखते-देखते,
आज उनके घर पराये की शहनाई बजने जा रही थी।

4 जुलाई 2019

प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति हो।


सेवा में,
माननीय  मुख्यमंत्री, बिहार
पटना
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा  द्वारा कराने
 के संबंध में ।
महोदय,
आप भारतीय राजनीति के बहुमूल्य मोती रहे हैं, इसलिए बिहार के छात्रों का एक बड़ा समूह आपसे एक महत्वपूर्ण विषय पर हस्तक्षेप की मांग करते हैं । हम ऐसे छात्र हैं जिनकी पृष्ठभूमि कई कारणों से 'गोल्डेन' नहीं है लेकिन हममें अच्छा परिणाम देने का जज्बा है । आप स्वच्छ छवि के प्रशासक हैं । मितभाषी स्वभाव आपके नाम के अनुरुप है और परिणाम-उन्मुख कार्यशैली आपकी पहचान है । योग्यता के बावजूद पीछे रह जाने की पीड़ा कैसी होती है, आप हमसे बेहतर जानते हैं । अत: हम आपसे उम्मीद कर रहे हैं कि असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली में ''डिग्री लाओ, नौकरी पाओ'' की पुरानी परिपाटी को तोड़ डालने की ऐतिहासिक कोशिश के सूत्रधार बनेंगे । हमारे प्रार्थना पत्र को पढने की कृपा कीजिए और हो सके तो सरकार में हमारी आवाज बनिए ।
1.                   आज के दौर में किसी भी क्षेत्र में बेहतर प्रतिभा को प्रतियोगिता परीक्षा के द्वारा चुना जाता है । ग्रुप डी के पदों की बहाली में भी अकादमिक रिकार्ड की गुणवत्ता संदिग्ध मानी जाती है । असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया इससे बाहर क्यों रहे !!
2.                   यदि सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को वास्तव में नीति में स्थान दिया गया है तो फिर वैसे लोगों की असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली में स्थान सुनिश्चित करना होगा जो समाज के हाशिए से आते हैं , जिनके पुरखे साधनविहीन हैं, सतर्क नहीं रहे हैं । सवर्णों में भी देहातों से आने वाले छात्रों की पृष्ठभूमि ऐसा ही है ।
3.                   अकादमिक रिकार्ड के आधार पर बहाली में उस असमानता का निराकरण कैसे होगा जो अलग- अलग बोर्डों एवं विश्वविधालयों के मार्किंग पैटर्न की भिन्नता से जन्मी है । बीएचयू में पीजी में जितना अंक मिलता है उतना मगध विवि, पटना विवि इत्यादि में नहीं मिलता । साथ ही एक ही विवि के अलग- अलग कालखंड में दिए गए अंकों में भिन्नता है ।
4.                   संविधान सभी भारतीयों को बराबरी का दर्जा देता है । इसे ब्रह्म वाक्य समझकर बिहारी छात्र दूसरे राज्यों में इंटरव्यू देने जाता है, खाली हाथ वापस आता है और बिहार ज्यूडसरी सहित तमाम दूसरे अच्छे पदों पर हम बाहरी को दिल खोल कर स्वागत करते हैं । आखिर ऐसी उदारता दूसरे प्रांत वाले नहीं दिखाते तो हमारी सरकार अपने बच्चों का संरक्षण करने का उपाय वैधाधिक, व्यवहारिक तरीकों से क्यों नहीं करती ? यदि इंटरव्यू लेने का प्रावधान रखा जाता है तब इंटरव्यू बोर्ड के लिए चुने जाने वाले सदस्य यूपी, झारखंड, दिल्ली, एमपी, राजस्थान से न लिये जाएं ।
5.                   अकादमिक रिकार्ड में यूजीसी रेगुलेशन 2018 के तहत जो भारांक पीएचडी डिग्रीधारियों और नेट पास अभ्यर्थी को दिया जा रहा है वह बहुत बङी विसंगति है । जब पीएचडी को वरीयता ही देना है तब फिर हरेक साल दो--दो बार नेट की परीक्षा आयोजित करने का क्या औचित्य है !
6.                    पीएचडी की डिग्री की साख पर कई रिपोर्ट सवालिया निशान लगा चुके हैं । खुद यूजीसी अब 2009 के रेगुलेशन के तहत पीएचडी किए जाने को अब मान्यता दे रहा है । सवाल है कि जिन्होनें 2009 के रेगुलेशन के पहले ईमानदारी से पीएचडी किया है, उनके हित कैसे सुरक्षित रखे जायेंगे ? साथ ही 2009 के रेगुलेशन से जिन्होनें पीएचडी किया है उन्होनें अपने थिसिस लेखन में कट- पेस्ट- कापी का सहारा नहीं लिया है , इसकी गारंटी भी नहीं है ।यूजीसी ने हाल ही में इस सम्बंध में सवाल उठाये हैं । यही कारण है कि यूपी सहित कई राज्य इसकी बहाली प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए करते हैं ।
7.                   कई सारे तकनीकी पेंचों को देखते हुए यह ज्यादा जरुरी हो जाता है कि
 सभी सम्बद्ध पक्षों का हित यथासंभव सुरक्षित रहे । इसलिए एक ऐसे माडल पर विचार किया जाए जिसमें कुछ इस तरह प्रावधान हो :-
(क) 70 अंक प्रतियोगिता परीक्षा + 20 अकादमिक भारांक + 10 अंक साक्षात्कार ।
(ख) 70 अंक प्रतियोगिता परीक्षा + 30 अकादमिक भारांक । परीक्षा में आये अंकों और अकादमिक भारांक के आधार पर मेरिट लिस्ट बनायी जाए । साक्षात्कार नहीं होने से बहाली की प्रक्रिया बेहद कम समय में पूरी हो सकती है ।
8.        प्रतियोगिता परीक्षा में नेट / सेट / बेट / पुराने - नये सभी  पीएचडी को बैठने                      का मौका मिले । 
9.        प्रतियोगिता परीक्षा की प्रक्रिया बदनामी से मुक्त बेदाग हो, इसके लिए जरुरी है कि परीक्षा हर विषय की वस्तुनिष्ठ Objectivesली जाए । सब्जेक्टिव में परीक्षक की मर्जी चलने लगती है । परीक्षार्थी की बायोमिट्रिक आधार आधारित हाजिरी बने । कार्बन कापी वाली उत्तर पुस्तिका हो और हर आप्शन के बगल में उत्तर का पहला शब्द लिखा जाए ताकि कापी नहीं बदला जा सके , न ही बाद में दूसरों के द्वारा उसमें बदलाव हो । बेहतर मानिटरिंग के लिए परीक्षा केंद्र केवल पटना हो । विषयवार परीक्षा के लिए अलग-अलग तिथि चुन लिया जाए । स्ट्रांग रुम पर सीसीटीवी कैमरा की निगरानी चढ जाए । चाहे तो सरकार NTA को परीक्षा लेने की जिम्मेवारी सौंप सकती है ।
10.      असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किये जाने के पांच वर्ष के भीतर पीएचडी करना अनिवार्य बनाया जा सकता है । नेट के साथ पीएचडी करने वाले चयनित असिस्टेंट प्रोफेसर को वेतन में एक इंक्रिमेंट का लाभ दिया जा सकता है ।
11.    बीपीएससी की परीक्षाओं में पूछे गए सवालों में से के कुछ के विकल्पों के सही-गलत को लेकर हाईकोर्ट जाने का रिवाज रहा है । इसके लिए प्रश्न पत्र बनाने वालों की यूपीएससी परीक्षा पद्धति से अपडेट न रहना है । अत: विवि के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली के लिए होने वाली प्रतियोगिता परीक्षा को इस विवाद से बचाना होगा । विवादास्पद सवालों से बचने के लिए यूपीएससी की 2011 के पहले की आप्शनल पेपर के पीटी एक्जाम के सवालों, नेट के विषयवार पेपर के सवालों को चुना जा सकता है ।
श्रीमान, बहाली वैसे भी अनियमित रहती है । इतनी बड़ी रिक्तियां आने वाले निकट भविष्य में बिहारी छात्रो को प्राप्त नही होगी ।  यह हम मेधावी किंतु बैकग्राउंडलेस बिहारियों के लिए उच्च शिक्षा में प्राप्त सबसे बड़ा अवसर होगा । अत: आप हस्तक्षेप अवश्य करें । आपका हस्तक्षेप नई शिक्षा नीति की भावना के अनुरुप होगा ।
निवेदक

(जेपी हंस)
                     अध्यक्ष, बिहार राज्य नेट-पीएचडी उतीर्ण छात्र संघ, पटना

28 जून 2019

बिहार की सहायक प्रोफेसर के अभ्यर्थियों की मांग ।


सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार राज्य ने इस अति उच्च योग्यता वाले पद को भरने में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ को भर्ती का आधार बनाया है । हमारे देश में कई बोर्ड और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई (C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E) बोर्ड के औसत छात्रों से भी 20% तक कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है । बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65% पर गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक सामान्य छात्र भी 80% तक अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है । फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता परीक्षा को अपनाये, क्योंकि बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
मध्यप्रदेश, ओडिसा, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश आदि अन्य अनेक राज्य खुली प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करवाते है एवं अपने-अपने राज्य का डोमिसाईल नीति भी लागू करते है, जिससे वहां के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा अवसर मिलता है । उसी तरह अपने राज्य बिहार से भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति की मांग करते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो सके, साथ ही अपने राज्य की डोमिसाईल नीति को लागू किया जाये, जिससे यहाँ के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें । बिहार में अब तक जितने सहायक प्रोफेसर की भर्ती हुई है, उसमें बिहार के बाहर के विद्यार्थी ज्यादा से ज्यादा नियुक्त हुए हैं । वें एक बार नियुक्त तो होते हैं पर इस ताक में रहते हैं कि अपने स्टेट में किस तरह जाऊं, वे मन से यहां ड्यूटी भी नहीं करते हैं और अततः वें यहाँ के भैकेन्सी बर्बाद कर अपने स्टेट चले जाते हैं । अगर डोमिसाईल नीति लागू होता है तो बिहार के विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और वे मन से यहां ड्यूटी भी करेंगे । कहीं और जगह जाने की ताक में भी नहीं रहेंगे । बिहार के विद्यार्थी अहिंदी-भाषी राज्यों में जा ही नहीं सकते, क्योंकि वे मूल भाषा का ज्ञान माँगते हैं और बाकि बचे हुए हिंदी-भाषी राज्य भी मूल निवासियों को प्राथमिकता देते हैं । यहाँ तक कि राज्य के बाहर के छात्रों के लिए उम्र अत्यंत कम रखी जाती है । ऐसे में बिहारी छात्र जाएँ तो कहाँ जाएँक्या मज़दूर बनने को ही हम अपनी नियति मान लेंअगर डोमिसाईल नीति लागू होती हैं तो यहाँ के छात्रों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और यहाँ के बेरोजगार युवकों की समस्या भी दूर होगी ।
अंत में, जो एकेडमिक में कम मार्क्स प्राप्त करते हैं, क्या उनमें गुणवता की कमी होती है ? वे भी उच्च मार्क्स प्राप्त करने वाले की भाँति इस क्षेत्र में कुछ करना चाहते है, लेकिन पूर्व में ली गई भर्ती प्रणाली(एकेडमिक सिस्टम) से ऐसे कई गुणवता वाले विद्यार्थियों को छँटनी कर दी गई थी । अगर  बिहार सरकार इस पुरानी पद्धति डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा भर्ती करती है तो बिहार के  अभ्यर्थियों को इस नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकती है ।

24 जून 2019

सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” सिस्टम की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने के संबंध में ।


सेवा में,
माननीय ......................................
.....................................................
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ
             सिस्टम की जगह  प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने के संबंध
             में ।
महोदय,
          सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति उच्च योग्यता वाले पद को भरने में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने की मांग करते हैं ।
1.                                   महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई (C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E) बोर्ड के औसत छात्रों से भी 20% तक कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है ।
2.                                   महोदय, बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65% पर गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक सामान्य छात्र भी 80% तक अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.                                   महोदय, बिहार में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.                                   महोदय, डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है । फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
अतः हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा भर्ती कराने की कृपा करें, ताकि बिहार के सभी विद्यार्थियों को इस नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें।
                                                                            निवेदक
बिहार के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं
         

26 मई 2019

सहायक प्रोफेसर की भर्ती में “डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ” प्रणाली की जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं डोमिसाइल नीति लागू करने के संबंध में ।

सेवा में,
माननीय...................
बिहार
विषयः- सहायक प्रोफेसर की भर्ती में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ
             सिस्टम की जगह  प्रतियोगिता परीक्षा आयोजन कराने एवं
             डोमिसाईल नीति लागू करने के संबंध में ।
महोदय,
          सम्पूर्ण भारत में सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा से होती है पर हमारे बिहार लोक सेवा आयोग ने इस अति उच्च योग्यता वाले पद को भरने में डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ को भर्ती का आधार बनाया है । महोदय, हम निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर बिहार में भी सहायक प्रोफेसर की भर्ती प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करने एवं बिहार की अपनी डोमिसाईल नीति लागू करने की मांग करते हैं ।
1.                                   महोदय, हमारे देश में कई बोर्ड और कई विश्वविद्यालय है, जिनके मार्किंग पैटर्न में बहुत अंतर है- जैसे कठिन सिलेबस के कारण बिहार बोर्ड के टॉपर को भी सी.बी.एस.ई (C.B.S.E) बोर्ड और आई.सी.एस.ई (I.C.S.E) बोर्ड के औसत छात्रों से भी 20% तक कम नम्बर मिलता है । इसके वजह से सहायक प्रोफेसर की बहाली में बिहार के विद्यार्थियों को कम अवसर मिलता है ।
2.                                   महोदय, बिहार के लगभग सभी विश्वविद्यालय भी भारत में सबसे कम मार्किंग के लिए जाने जाते हैं । इससे भी बड़ा अंतर समेस्टर और ऐनुअल एक्जाम सिस्टम के प्राप्तांकों में है । ग्रेडिंग और नन ग्रेडिंग के बीच प्राप्तांकों में तो और ज्यादा अंतर है- उदाहरणस्वरूप बिहार के विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में जहां 65% पर गोल्ड मेडलिस्ट हो जाता है वहीं बनारस हिन्दी विश्वविद्याल (BHU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक सामान्य छात्र भी 80% तक अंक पाता है । ऐसे में प्रतियोगिता परीक्षा के जगह डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ के आधार पर भर्ती घोर अन्यायपूर्ण और अवसर की समानता के खिलाफ है ।
3.                                   महोदय, बिहार में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में इसी डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ नियम को आधार बनाया जाता रहा है, जिसके कारण बिहारी छात्रों को कम अवसर मिल पाता है । चूंकि बिहार बोर्ड और बिहार के यूनिवर्सिटीज भारत के सबसे कम मार्किंग वाले बोर्ड और यूनिवर्सिंटी है ।
4.                                   महोदय, डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली भर्ती की सबसे पुरानी पद्धतिओं में से एक है, जिसका प्रत्येक राज्य इनमें व्याप्त खामियों को देखते हुए इसके जगह प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करवा रहें है । फिर हमारा राज्य क्यों न पुरानी पद्धति को त्याग कर नयी पद्धति- प्रतियोगिता परीक्षा को अपनाये, क्योंकि हम बिहारी कठिन मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है और किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा सफलता हासिल करते हैं ।
5.                                   महोदय, मध्यप्रदेश, ओडिसा, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश आदि अन्य अनेक राज्य खुली प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करवाते है एवं अपने-अपने राज्य का डोमिसाईल नीति भी लागू करते है, जिससे वहां के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा अवसर मिलता है, उसी तरह हमारा राज्य बिहार से भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति की उम्मीद करते हैं ताकि शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हो सके, साथ ही अपने राज्य की डोमिसाईल नीति को लागू किया जाये, जिससे यहाँ के मूल निवासी को नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें ।
6.                                   महोदय, बिहार में अब तक जितने सहायक प्रोफेसर की भर्ती हुई है, उसमें बिहार के बाहर के विद्यार्थी ज्यादा से ज्यादा नियुक्त हुए हैं । वें एक बार नियुक्त तो होते हैं पर इस ताक में रहते हैं कि अपने स्टेट में किस तरह जाऊं, वे मन से यहां ड्यूटी भी नहीं करते हैं और अततः वें यहाँ के भैकेन्सी बर्बाद कर अपने स्टेट चले जाते हैं । अगर डोमिसाईल नीति लागू होता है तो बिहार के विद्यार्थियों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और वे मन से यहां ड्यूटी भी करेंगे । कहीं और जगह जाने की ताक में भी नहीं रहेंगे ।
7.                                    महोदय, हमलोग अहिंदी-भाषी राज्यों में जा ही नहीं सकते, क्योंकि वे मूल भाषा का ज्ञान माँगते हैं और बाकि बचे हुए हिंदी-भाषी राज्य भी मूल निवासियों को प्राथमिकता देते हैं । यहाँ तक कि राज्य के बाहर के छात्रों के लिए उम्र अत्यंत कम रखी जाती है । ऐसे में हम बिहारी छात्र जाएँ तो कहाँ जाएँ? क्या मज़दूर बनने को ही हम अपनी नियति मान लें? महोदय, अगर डोमिसाईल नीति लागू होती हैं तो यहाँ के छात्रों को ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलेगा और यहाँ के बेरोजगार युवकों की समस्या भी दूर होगी ।
अतः हम महोदय से प्रार्थना करते हैं कि इस पुरानी पद्धति डिग्री-लाओ-नौकरी-पाओ प्रणाली के जगह खुली प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा भर्ती कराने एवं बिहार की अपनी डोमिसाईल नीति लागू करने की कृपा करें, ताकि बिहार के निवासी को इस नियुक्ति में ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकें ।
                                                                             निवेदक
बिहार के सहायक प्रोफेसर के योग्य समस्त छात्र-छात्राएं