बिहार की नई शारदा सिन्हा- नेहा सिंह राठौड़

भोजपुरी महफिल की अस्मिता बचाने आई नेहा सिंह राठौड़.

भोजपुरी महफिल का इतिहासः-

      भोजपुरी जगत हमेशा से ही समृद्ध लोक गीतों की महफिल रही है. यह महफिल की शुरुआत भिखारी ठाकुर से शुरू होकर अनगिनत कलाकारों के नाम सजाती हुई आगे बढ़ती है. भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी संस्कृति व साहित्य को एक नई पहचान देन के साथ समाज में फैली कुरीतियों पर जमकर हल्ला बोला। विदेशिया, गबर-घिचोर के साथ-साथ बेटी-वियोग और बेटी बेंचवा जैसे नाटकों के जरिये उन्होंने समाज में एक नई चेतना फैलाई। बाल-विवाह, मजदूरी के लिए पलायन और नशाखोरी जैसे मामलों पर उन्होने उस समय सवाल खड़े किए जब कोई इसके ओर सोचना तो दूर बोलने को भी तैयार नही था।

इन्हीं कड़ी में 80 के दशक के मशहुर लोक गीत गायिका शारदा सिन्हा ने भी भोजपुरी, मगही और मैथिली में पारम्परिक लोकगीत के ऐसा नाम रोशन किया कि शादी-विवाह, छठ पूजा और अन्य धार्मिक पूजन में इनके गीत आज भी गाये जाते हैं.

बिहार की नई शारदा सिन्हा- नेहा सिंह राठौड़

      इन लोक कलाकारों का क्रम लगातार जारी है. इन्हीं नामों में एक चर्चित नाम जुड़ा है- नेहा सिंह राठौर, नेहा सिंह राठौर का जन्म बिहार के भभुआ (कैमुर) के रामगढ़ में जलदहा गाँव में हुआ था. इनके पिता जी का नाम श्री रमेश सिंह है. इनकी प्रारम्भिक पढ़ाई अपने जिला में हुआ तत्पश्चात उच्च शिक्षा के लिए कानपुर की ओर प्रस्थान किया जहाँ वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेज्युशन पास किया. वर्तमान में कोलकाता में रहकर संगीत की शिक्षा ले रही है. नेहा ने अपना पहला गीत शारदा सिन्हा की लोकगीत को गाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिसके बदौलत आज सोशल मीडिया पर स्टार बन चुकी हैं. इसके बोल है-

पटना से बैदा बुलाई दा नजारा गईनी गुईया.

छोटकी ननदिया है, बड़की सौतनिया....

                       


       इसी लोकगीत के बाद नेहा सिंह राठौर ने कोरोना, अप्रवासी मजदूर, बेरोजगारी, दहेज प्रथा, बाल विवाह, मतदान जागरूकता, चुनावी गीत, बाढ़, छात्रों का दर्द किसान का दर्द और अन्य समसमायिक घटनाओं पर लोकगीत के माध्यम से अपनी आवाज उठा रही है. जिससे सोशल मीडिया पर इनके प्रशंसक बढ़कर करीब तीन मिलियन हो गए हैं. इनके कुछ गीतों को दो मिलियन से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं. जो इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी गीतों की अश्लीलता भोजपुरी गीत-गायन परंपरा का स्वाभाविक गुण न होकर एक थोपा हुआ कल्चर है.

भोजपुरी गीतों में अश्लीलता की बाते गाहे-बेगाहे हर मंच से होती है. इस संबंध में बहुत सारे कलाकारों पर निशाने साधे जाते हैं. भोजपुरी गीत और कलाकारों के संबंध में The Lallantop लिखता है-

यहाँ यह समझने की बात है कि लोक-कला वो नहीं है जो लोक की आड़ में अपनी रोटियां सेंकी जाए और लोक की संस्कृति विकृत हो, बल्कि लोककला तो वो है, जो लोक के पक्ष को कला के माध्यम से फलक तक ले जाए और लोक की छवि को बेहतर बनाते हुए उसे समृद्ध करे. ऐसे में जो व्यक्ति अपनी कला की माध्यम से ये करने का बीड़ा उठाता है, वही असली लोक-कलाकार है.

आज नेहा सिंह राठौर भोजपुरी लोकगीत को बदनामी की दाग को मिटाने आ गई है..यह लोकगीतों के माध्यम से लोक की आवाज को आवाम तक बखुबी से पहुँच रहा है और लोक संगीत की साफ-सुथरी छवि को और समृद्ध करने का कार्य कर रही है. इनका भाषा भोजपुरी, मगही और मैथिली है.

कोरोना महामारी के कारण जब लॉकडाउन हुआ और मजदूरों का एक शहर से दूसरे शहर हजारों किलोमीटर पैदल जाना हुआ तो नेहा सिंह गाती है...

कोरोना महामारी के चलते मजदूर शहर से पैदले आपन गाँव चल दिहल बाडन...

उनकर शरीर थक गईल बा चलत-चलत आ मन रोवत बा...

                      

 

 17 सिंतबर को जब पीएम मोदी का जन्मदिन था उस दिन देश में कई जगह राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस के रूप में मनाया गया।

इस क्रम में नेहा सिंह राठौर ने भी भोजपुरी में एक गीत गाकर बेरोजगारी के मुद्दे को उठाया। इस दौरान नेहा ने कुछ समय अंतराल पर अलग-अलग वीडियो पोस्ट किया। इसमें वह देश में बेरोजगारी की समस्या को उठाती दिखीं।

अच्छा दिन आई गईले हो…’,

हाय-हाय रे गवर्नमेंट तोहार काम देख ला,

बबुआ घूमेलन नाकाम देख ला…’ 

 

 

और बेरोजगारी के आलम में थरिया पीटत बानी, बिहार से बेरोजगार बोलत बानी…’ जैसे शीर्षक के गाने गाए।


 

मोदी सरकार ने तमाम विरोध के बावजूद कृषि बिल को संसद में पारित करवा लिया तो नेहा सिंह लिखती है- मैंने हमेशा कहानियों में यही पढ़ा है कि एक गरीब किसान था. जाने वो दिन कब आएगा जब कहानियों में एक अमीर किसान था जैसी बातें लिखी जाएंगी.

किसान पर इनके नए भोजपुरी गीत के बोल है-

भादो आषाढ़ जाहे जेठ के घाम, केहूं बुझे न कोहीं,


 

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