भारतीय समाज और संविधान




     सिंधु घाटी सभ्यता से उपजी भारतीय समाज आर्यों, कुषाण, हुन, अफगान, तुर्क, खिलजी, लोधी, मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक के विदेशी आक्रमण, गुलामी और शोषण का दंश पाँच हजार सालों तक झेलते हुए 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ और इस आजाद भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ साथ ही पाँच हजार साल तक चले सारे मनुवादी विधान को शुन्य घोषित कर दिया.

     भारतीय संविधान को निर्माण करने वाले और कोई नहीं वह व्यक्ति था जिसके समाज को मनुवादी विधान से पाँच हजार सालों से मानसिक रूप से गुलाम बनाकर रखा गया था वो वह वर्ग था जिसका मनुवादी विधान से एक मात्र कार्य दिया गया था मैले का गट्टर साफ करना/मैला साफ करना/मरे हुए पशुओं को उठाना. उन्हें पाँच हजार सालों तक अछूत बनाकर रखा गया था, वो वह वर्ग से था जिसको भारत के धार्मिक ग्रन्थों में शुद्र का दर्जा दिया गया है, जिसकी उत्पति पैर से मानी गई है, जिन्हें शिक्षा, शस्त्र और सम्पति हासिल करने का कोई अधिकार नहीं था लेकिन उस व्यक्ति ने सारे मनुवादी बेड़ियों को तोड़ते हुए 32 डिग्रियाँ हासिल कर ऐसा विधान रच डाला जहाँ सभी वर्गों के लोगों को समानता का अधिकार हो. न कोई राजा होगा और न ही कोई रंग. वह व्यक्ति था विश्व रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर. इन्होंने लगातार 2 वर्ष 18 दिन तक संविधान निर्माण के लिये कार्य किया और अंततः 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा को संविधान निर्माण कर सौप दिया ।




भारतीय संविधान के 70 साल-  भारतीय संविधान लागु हुए 70 साल हो गए है लेकिन मनुवादी मानसिकता वालों के दिलों पर अभी भी मनुवादी विधान की रट लगी हुई है. वे धर्मरूप अफीम का नशा चखाकर फिर से मानसिक गुलामी की दलदल में धकेलना चाहते हैं. भारतीय समाज विश्व का एक मात्र ऐसा समाज था जो जानवर के मुत्र तो पी सकता था लेकिन इंसानों के हाथ का पानी नहीं पी सकता था, आज भी कही-कही इस तरह की भावना है. भारतीय संविधान बनने से छुआछूत, भेदभाव, बेगारी प्रथा, देवदासी प्रथा, खाप की प्रथा जैसे अनेक धार्मिक कुप्रथाओं पर लगाम लगा हैं. आजादी के बाद भी कही-कही यह स्थिति थी कि जैसे वर्ग विशेष के लोगों के सामने जाने के लिए जुता/चप्पल उतार कर जाना पड़ता था. उनके घर जाने पर साथ में बैठने नहीं दिया जाता था. अपने घर पर भी ऐसे वर्ग विशेष के लोगों के आने पर खाट, कुर्सी छोड़कर उनके सामने गुलामों की तरह हाथ जोड़कर खड़े होना पड़ता था. वर्ग विशेष लोगों के छोटे बच्चों को भी मालिक कहकर पुकारना पड़ता था. वर्ग विशेष के लोगों को बाबू साहब जैसे गुलामी मानसिकता वाले शब्द कहकर पुकारना पड़ता था. वर्ग विशेष के सुदखोरों के सामने अपनी जमीन जायदाद, गहना जेवर या खुद के परिवार के सदस्यों को गिरवी रखकर पैसा लेना पड़ता था. यहाँ तक की चापाकल से पानी पीने के लिए और शादी में घोड़-सवारी के लिए भी कोर्ट की लड़ाई लड़नी पड़ी है.

     आज देश में फिर से मनुवादी तंत्र हावी है और येनकेनप्रकारेन भारतीय संविधान को कमजोर करने में लगे है. उन्हें अपनी धर्म की तो फिक्र है लेकिन किसी इंसान के लिए रोजी-रोटी, मकान और शिक्षा की फिक्र नहीं है. उन्हें दलितों, शोषितों और पीड़ितों की हक की कोई चिंता नहीं है, सभी लोगों को स्वतंत्र रूप से तार्किक शिक्षा की जरूरत है. डॉ भीमराव अम्बेडकर ने कहाँ था- शिक्षित हो, संगठित हो और संघर्ष करों. इसी मूल मंत्र के सहारे संविधान को मनुवादियों के बलि चढ़ने के बचा सकते हैं.

      जय भारत, जय संविधान

 


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