29 June, 2021

दीपिका कुमारी- 27 साल में 54 देशों को धूल चटाने वाली भारतीय महिला.

                                              
 

कहा जाता है कि

  कोई भी देश यश के शिखर पर तब तक नहीं पहुँच सकता जब तक उसकी महिलाएं कंधे से कन्धा मिलाकर चले.

  आज महिला हर क्षेत्र में खुद को साबित कर रही हैं एवं पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है. वे परिवार, समाज और देश की तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, लेकिन फिर भी कई क्षेत्रों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिल रहा है. भारतीय समाज पितृसतात्मक होने के कारण आज भी भ्रूण हत्या, महिलाओं के साथ शोषण, अत्याचार, अन्याय और बलात्कार के मामले हो रहे हैं. इस विषय पर पुरुषों को जागरूक होने की जरूरत है.

 

                                    photo credit: gettyimages

                

                  झारखंड की रहने वाली दीपिका कुमारी ने 27 जून, 2021 को 27 वर्ष की उम्र में पेरिस में चल रहे विश्वकप तीरंदाजी में महिलाओं की व्यक्तिगत, टीम और मिश्रित युगल में तीन गोल्ड मेडल हासिल किया साथ ही विश्व की नम्बर वन महिला तीरंदाज बनने वाली पहली भारतीय महिला बनी. इस पर दीपिका कुमारी ने कहा-

 यह पहली बार है, जब मैंने वर्ल्ड कप में तीन गोल्ड मेडल जीते हैं. मैं बहुत खुश हूँ लेकिन साथ ही मुझे लगातार अच्छा प्रदर्शन करना है क्योंकि आने वाले समय में कुछ बहुत महत्वपूर्ण प्रतियोगिताएं होने जा रही है.

  इससे पहले महिला क्रिकेटरों ने विश्वकप महिला क्रिकेट में वर्ल्ड कप जीतकर देश का नाम रौशन किया था.

               इस विश्वकप तीरंदाजी प्रतियोगिता में 55 देश शामिल हुए थे. तीरंदाजी प्रतियोगिता में दीपिका कुमारी के साथ झारखंड की अंकिता दास और कोमोलिका बारी भी शामिल हुई थी. दीपिका इससे पहले मात्र 18 साल की उम्र में वर्ल्ड नम्बर वन खिलाड़ी बन चुकी है. अब तक विश्व कप प्रतियोगिता में 9 गोल्ड मेडल, 12 सिल्वर मेडल और 7 ब्रॉन्ज हासिल कर चुकी है साथ ही भारत की ओर से तीरंदाजी प्रतियोगिता में जाने वाली अकेली महिला है.

                

                                       photo credit: gettyimages

               झारखंड के बेहद गरीब पिछड़े समाज में जन्म लेने वाली 27 वर्षीय दीपिका कुमारी ने पिछले 14 सालों में खेल का लम्बा सफर तय कर इस मुकाम पर पहुँची है. दीपिका के पिता शिवनारायण महतो एक ऑटो-रिक्शा ड्राईवर और माँ गीता महतो एक मेडिकल कॉलेज में ग्रुप-डी कर्मचारी है. ओलंपिक महासंघ द्वारा बनाये गये एक डॉक्मेन्ट्री में दीपिका बताती है कि उनका जन्म एक चलते हुए ऑटो रिक्शा में हुआ था क्योंकि उनकी माँ अस्पताल नहीं पहुँच पाई थी. दीपिका की शादी पिछले साल 30 जून को टाटा आर्चरी अकेडमी में उनके साथ तीरंदाज सीखने वाले अतनु दास के साथ हुआ था.

               आज इस भारतीय पितृसतात्मक समाज में पुत्र की चाहत में भ्रूण हत्या कर न जाने कितने दीपिका कुमारी और मिताली राज जैसे विश्व की उच्च प्रतियोगिता के शिखर पर पहुँचने वाली महान महिलाओं को गर्भ में हत्या की दी जाती है. आज भी महिलाओं को घर से दूर पढ़ने जाने की इजाजत नहीं दी जाती है. अगर दीपिका कुमारी को घर से 200 किलोमीटर दूर तीरंदाजी सिखने नहीं जाने दि जाती तो क्या परिवार, समाज और देश का नाम रौशन कर पाती?

                इससे पहले भी भारतीय राजनीति में सफल महिलाओं की सूची में सुश्री मायावती, श्रीमति राबड़ी देवी, सुश्री ममता बनर्जी, सुश्री जयललीता और श्रीमती सुषमा स्वराज का नाम शामिल है.

 

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18 June, 2021

"जाती" और "जाति" की 'ऐसी की तैसी'




हमारे हेडिंग से ही आपको लग रहा होगा कि हम "जाती" और "जाति" की ऐसी की तैसी करने वाले है। मेरे शब्दों में "जाती" का मतलब 'जाती हुई लड़कीं' मतलब बेवफा लड़कीं। वह लड़कीं जो दिलरुबा लड़को का दिल तोड़कर किसी और के साथ रफूचक्कर हो गयी। इधर लड़का उसके प्यार में पागल बेवड़े बनकर घूम रहे हो, सिगरेट की कश पर कश लगाए जा रहा हो, शराब की बोतलों की हाउस सेलिंग-सी दुकान खोल रखा हो, एग्जाम में क्रॉस पर क्रॉस लग रहे हो। उधर बेवफा सनम अपने नए आशिक के साथ घोड़े बेचकर चैन की नींद सो रहा हो, उसे रति-भर भी फिक्र नहीं हो कि हमने सालों तक जिसके साथ इश्क फरमाया ओ कैसे हालातों में जिंदगी गुजार रहा हो? वैसे कहा जाता है कि प्यार में धोखा खाये इंसान दोबारा जिंदगी शुरू कर सकता है, लेकिन उसको कोई सीख देने वाला तो मिले। हालांकि जब प्यार में धोखा खाया इंसान दुबारा जिंदगी शुरू कर दे तो बेवफा सनम की शामत आना तय है। दिलरुबा बाबू साहब बिना खबर लिए छोड़ नहीं सकता। आखिर खबर भी क्यों न ले? प्यार करने में कितने पापड़ बेले और धोखा खाने का इल्जाम भी अक्सर उन्हें ही झेलने पड़ते हैं। लव और धोखा का इल्जाम भी गोली से निकले खोखे की तरह होता है। जो न घर का होता है न घाट का। जिस तरह से गोली से निकलने के बाद खोखे का महत्व नहीं रहता उसी तरह प्यार में धोखा खाये इंसान का जिंदगी जीने का  कोई मकसद नहीं रह जाता। वह अक्सर यही सोचता था कि जिसको से वह प्यार कर रहा था उसके साथ जिंदगी- भर रिश्ते निभाएगा।  एक तरफा प्यार में पागल होना सनकी कहलाता है। प्यार का खम्बा दोनों तरफ से मजबूत होनी चाहिए।

दूसरा शब्द है "जाति". मतलब यों कहें कि भारत एक कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ एक 'जाति' प्रधान देश है। वैसे कोई किसी से प्रधान हो क्या फर्क पड़ता है? जब तक वह व्यवस्था दूसरों का अहित न करें। भारत के इतिहास में आज तक जितना "जाति व्यवस्था" ने भारतीय समाज को अहित किया है उतना शायद किसी और व्यवस्था ने नहीं किया होगा। तुम फलना जाति के हो, तुम चिलना जाति के हो, तुम ढिकना जाति के। इतनी जातियां है कि उतना किसी जाति वाले गिनती तक नहीं जानते होंगे शायद। उतना से भी पेट नहीं भरता। तुम उच्च जाति के हो, तुम मध्यम जाति के हो, तुम नीच जाति के हो? तुम ये पालते हो, तुम ये चराते हो, तुम ई सब खाते हो, तुम यह काम करते हो। आखिर भला अफ्रीका के जंगलों से उत्पन्न इंसानो में इतनी वर्ग-भेद कैसे हो सकती है? इसके पीछे जरूर कोई असामाजिक तत्वों के हाथ हो सकता है या वर्चस्ववादी वर्ग का हाथ हो सकता है। जो चाहता है कि लोग जातियों में बटे रहे और हम फुट डालकर मौज करते रहे। लेकिन वक्त का करवा बदल रहा है। फुट डालकर मौज करने वाले के दिन जाने वाले हैं। कई बार यह भी देखा गया है कि इंसान बहुत धार्मिक है फिर भी छोटे जाति-बड़े जाति की रट लगाए रहता है। आखिर ये सब सीख कहां से मिलता होगा। हर इंसान कोई न कोई भगवान, अल्लाह, परमात्मा, गुरु इत्यादि को मानता ही है तो किस भगवान, अल्लाह, परमात्मा इत्यादि ने सिखलाया की इंसान-इंसान में भेद करों? हाँ, कुछ अव्यवहारिक और काल्पनिक ग्रंथ या किताब है जिसमें असमानता का उल्लेख है जिसके बारे में डॉ आंबेडकर ने समय रहते सचेत किया था।
    अगर यह भेद जाति के आधार पर जारी रहती है तो ऐसी "जाति" की ऐसी की तैसी जरूर होनी चाहिए। मतलब खात्मा जरूर होनी चाहिए।



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06 June, 2021

हादसा












हादसे होते थे
और होते रहेंगे
जब तक
सड़कों पर गड्ढे रहेंगे।

जब तक लोग
सड़क नियमों का
पालन नहीं करेंगे।

सड़कों पर हादसे होते थे।
और होते ही रहेंगे।

जब तक गाड़ियां
ट्रैफिक नियमों का
पालन नहीं करेंगी।

हादसे होते थे
और होते ही रहेंगे।

समाज में भी हादसे होते थे
और होते रहेंगे

जब तक लोगों में
गैर-बराबरी,
असमानता,
छुआछूत,
भेदभाव जैसे
गढ्ढे बने रहेंगे।

समाज में भी हादसे
होते रहेंगे।

अमीरी-गरीबी
और 
उच्च-नीच की दीवार
लोगों के बीच
खड़े रहेंगे।

समाज में भी 
हादसे होते रहेंगे।

सवैधानिक नियमों
का पालन लोग
नहीं करेंगे।

तब तक
समाज में भी
हादसे होते थे
और होते रहेंगे।

हादसा कोई भी हो
चाहे सड़क पर हो
या समाज में ।

हर बार पीड़ित
इंसान होता है।

हर बार पीड़ित
इंसान होता है।

             ©जेपी हंस

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02 June, 2021

दो जून की रोटी



भूख मिटाने
के लिये
रोटियां सब की
जरूरत होती है।

कोई मेहनत
करके
पाता है
दो जून की
रोटी,
तो
कोई मेहनत
करने वालों
की पेट काटकर
हासिल करता है
हजारों 
दो जून की रोटी
की कीमत

इसी अंतर को
किताबों में
नौकर-मालिक,
गरीब-अमीर,
और
मजदूर और पूँजीपति
कहा जाता है।
लेकिन
किताबों तक
न पहुँचने
वाला इंसान
इस किताब की
भाषा कैसे
समझे?

         © जेपी हंस





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22 May, 2021

जनता हुआ निठल्ला


जनता हुआ निठल्ला ।

 




 

एक-साथ सब अंधभक्त बोले,

सबकुछ बल्ले-बल्ले ।

साहब, तुम्हारे राम राज में,

जनता हुआ निठल्ले ।


खत्म हुआ सरकारी नौकरी,

खत्म सरकारी कम्पनी,

युवा सब बेहाल हुए,

भाग्य को कोसे अपनी ।

 

पग-पग पर पूँजीपति खेले,

लूट का खेल खुल्ला ।

साहब तुम्हारे राम राज में,

जनता हुआ निठल्ला ।

 

निजीकरण से खत्म हुये नौकरियाँ,

सरकारीकरण मांगे हर पल ।

रेलवे, एयरपोर्ट सब बेच दिये,

बचा केवल नदी, समुदर के जल ।

 

महामारी में भी चुनाव कराते,

वाह रे सत्तालोभी पिल्ला 

साहब तुम्हारे राम राज में,

जनता हुआ निठल्ला ।

 

साधु-संत-सी डाढ़ी बढ़ाकर,

फेकते जुमला भाषण ।

घड़ियाली आंसु बहाकर,

जनता को कराते ढ़ोगासन ।

 

काश लोग अब भी कहते

मेरा साहब नल्ला 

साहब तुम्हारे राम राज में,

जनता हुआ निठल्ला ।

             निठल्ला- जिसके पास कोई काम-धंधा न हो; बेरोज़गार,

            नल्ला-  कुछ भी न करने वाला,

 

                           लेखक-  जेपी हंस  

 

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19 May, 2021

पारुल खख्खर - शववाहिनी गंगा की कवयित्री







पारुल खख्खर एक गुजराती लेखिका है । वह न लिबरल है, न वामी, न ही वह विरोध, प्रतिरोध, असहमति की कवि भी कभी रही । असल में तो वे हिन्दुत्वी जमात की लाडली रही हैं । आर.एस.एस के गुजरात मुखपत्र से जुडे राजनीतिक इतिहासकारमोदी द्वारा पदमश्री से सम्मानित विष्णु पांड्या पारुल को गुजराती काव्य साहित्य की आगामी नायिका तक बता चुके थें ।

      कोरोना महामारी के इस दौर में जहाँ सरकार द्वारा मरीजों को समय पर ऑक्सीजन न मिलना, हॉस्पिटल में बेड न मिलना, जब हाउसफुल श्मशानों और लकड़ियों के घोर अभाव के चलते उन्हे गंगा में खुले बहा देना, हाथ-भर जमीन में गड्ढा खोदकर जैसे-तैसे दफनाने और गंगा जैसी पावन नदियों में लाश बहाने पर लोग मजबूर हो रहे हैं ।  महामारी के इस दौर में इस महान विभीषिका को सरकार और नेताओं द्वारा प्रायोजित बता रहे हैं, वहीं न्यायपालिका तक इसे सरकारी नरसंहारकरार देती है. ऐसे में गुजराती कवयित्री की शववाहिनी गंगाकविता मौजूदा कोरोना काल में लाशों को गंगा में दफनाने व बहाने की सरकारी नाकामी को उजागर करती है ।

      संघी आई.टी. सेल को रामराज में मेरा साहब नंगा और रंगा-बिल्ला की उपमा कुछ ज्यादा ही मिर्ची लगने लगी है और ये सब ठीक उसी भाषा में उसी निर्लज्जता के साथ इन कवयित्री के पीछे पड़ गए हैं जैसे वे जेएनयू और जामिया की लड़कियों के पीछे पड़ते हैं । सिर्फ 14 पंक्तियों की इस कविता के लिए मात्र 48 घंटों में 28 हजार गालियां- अपशब्दों से भरी टिप्पणी हासिल की है । इसका कसूर सिर्फ इतना है कि गंगा में बहती लाशों को देखकर वे विचलित हो गई और सरकारी नाकामियों को उजागर करती कविता लिख डाली । इस कविता को असमी, हिन्दी, तमिल, मलयालम, भोजपुरी, अंग्रेजी, बंगाली भाषाओं में अनुवाद हो गया ।


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शववाहिनी गंगा

शववाहिनी गंगा

           गुजराती-कवयित्री पारुल खख्खर द्वारा रचित यह गीत दरअसल मौजूदा कोरोना-काल के दौरान गंगा में बहायी जा रही बेशुमार लाशों एवं दफनाये गये लाशों  को देखकर वर्तमान सरकार की नाकामियों को नंगा करता है.

 



 



एक-साथ सब मुर्दे बोले,

सब कुछ चंगा-चंगा

साब, तुम्हारे रामराज में

शववाहिनी गंगा ।

 

खत्म हुए श्मशान तुम्हारे,

खत्म काष्ठ की बोरी,

थके हमारे कंधे सारे

आंखे रह गयी कोरी;


दर-दर जाकर यमदूत खेले

मौत का नाच बेढंगा ।

साब, तुम्हारे राजराज में

शववाहिनी गंगा ।


नित्य निरंतर जलती चिताएं

राहत मांगे पल-भर;

नित्य निरंतर टूटती चूडियां,

कुटती छाती घर-घर;


देख लपटों को फिडल बजाते

वाह रे बिल्ला- रंगा 

साब, तुम्हारे राजराज में

शववाहिनी गंगा ।


साब, तुम्हारे दिव्य वस्त्र,

दिव्यत तुम्हारी ज्योति

काश, असलित लोग समझते,

हो तुम पत्थर, न मोती,


हो हिम्मत तो आके बोलो

मेरा साहब नंगा

साब, तुम्हारे रामराज में

शववाहिनी गंगा ।


                       लेखिका- पारुल खख्खर (गुजराती)

                       (गुंजराती से अनुवाद- इलियास शेख)

 



                                                         (पारुल खख्खर की विशेष परिचय अगले ब्लॉग में...)

     फोटो क्रेडिटः  संभार गूगल

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17 May, 2021

जन आक्रोश



 




🔥 जन आक्रोश🔥
----------------------------------------
लाशों पर फलता - फूलता व्यापार चाहिए।
कफ़न बेचता हूं,खरीदार चाहिए।।

चाहिए चंद बिकाऊ मीडिया हाउस।
कुछ बिके हुए पत्रकार चाहिए।।

झूठ को भी आंखे मूंद सच मान ले।
कुछ अंधे भक्त,वफादार चाहिए।।

देश की संपदा की लगा सकें बोली।
कुछ ऐसे व्यापारी दोस्त तैयार चाहिए।।

हमसे करेगा कौन अस्पताल की बात।
उनको तो सिर्फ धर्म और मज़हब का बुखार चाहिए।।

जो मर रहे है,उनके लिए अफ़सोस कैसा?
मौतों पर भी उत्सव तैयार चाहिए।।

जो अस्पताल के बाहर है,उनसे पूछो।
उन्हें बेड नही,धर्मरक्षक सरकार चाहिए।।

मरता हो कोई कल,मर जाए आज।
हमको तो चुनाव,कुंभ मेला बरक़रार चाहिए।।

अच्छे दिनों का चूरन ऐसा किया कमाल।
सरकार नही,उनको चौकीदार चाहिए।।

चौकीदार हर बार मिला चैन से सोता।
उसको तो बस भाषण दमदार चाहिए।।


       ✍️सिस्टम से डरा हुआ आक्रोशित नागरिक
           पवन सिंह

फोटो क्रेडिटः गूगल

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गुजर रही है जिंदगी



 




🔥गुजर रही है जिंदगी🔥
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गुज़र रही है ज़िंदगी
   ऐसे मुकाम से
अपने भी दूर हो जाते हैं,
   जरा से ज़ुकाम से।

तमाम कायनात में "एक कातिल बीमारी" की हवा हो गई,
वक्त ने कैसा सितम ढ़ाया कि
"दूरियां"ही "दावा" हो गई।

आज सलामत रहे
तो कल की सहर देखेंगे
आज पहरे में रहे
तो कल का पहर देखेंगें।

सांसों के चलने के लिए
कदमों का रुकना जरूरी है,
घरों में बंद रहना दोस्तों
हालात की मजबूरी है।

अब भी न संभले
तो बहुत पछताएंगे,
सूखे पत्तों की तरह
हालात की आंधी में बिखर जाएंगे।

यह जंग मेरी या तेरी नहीं
हम सबकी की है,
इस की जीत या हार भी
हम सब की है।

अपने लिए नहीं
अपनों के लिए जीना है,
यह जुदाई का जहर दोस्तों
घूंट घूंट पीना है।

आज महफूज़ रहे
तो कल मिल के खिलखिलाएंगे,
गले भी मिलेंगे और
हाथ भी मिलाएंगे।

                      ✍️पवन सिंह


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शुक्र कर रब का






🔥शुक्र कर रब का🔥
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शुक्र कर रब का,
तू अपने घर में है,
पूछ उस से जो
अटका सफर में है...
यहां बाप की शक्ल नही देखी
आखरी वक्त में कुछ लोगों ने,
बेटा हॉस्पिटल में और
बाप कब्र में है ...
तेरे घर में राशन है साल भर का,
तू उसका सोच जो दो वक्त की
रोटी के फ़िक्र में है...
तुम्हे किस बात की जल्दी है
गाड़ी में घूमने की,
अब तो सारी कायनात ही सब्र में है...
अभी भी किसी भ्रम में मत रहना मेरे दोस्त
इंसानों की नही सुनती आज कल,
कुदरत अपने सुर में है...


                     ✍️पवन सिंह


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16 May, 2021

कवि मित्र और सरकारी कर्मचारी


 


 

एक बार एक कवि और उसके सरकारी कर्मचारी मित्र की मुलाकात किसी मोड़ पर हुआ । बात-बात में सरकारी कर्मचारी ने कहाँ, मैं बहुत देशभक्त हूँ और विदेशी चीजों का बहिष्कार करता हुँ ।

कवि मित्र- ज्यादा मत फेको, आप और हम कभी विदेशियों के बिना जी नहीं सकतें ।

सरकारी कर्मचारी- कैसे?

कवि मित्र- अच्छा!  बताओं, अभी कहाँ जा रहे हो आप ?

सरकारी कर्मचारी- तपास से! मैं अभी ऑफिस जा रहा हूँ ।

कवि मित्र- ऑफिस तो अंग्रेजी शब्द है तो अंग्रेजों को अभी तक क्यों ढो रहे हो ?

सरकारी कर्मचारी- अच्छा ! तो दफ्तर जा रहा हूँ ।

कवि मित्र- दफ्तर मत जा, यह तो अरबी शब्द है । अब अरब वालों से दोस्ती क्यों ?

 

सरकारी कर्मचारी- मैं कार्यालय जा रहा हूँ, वहाँ जाकर अपने पेशे का कार्य ईमानदारी से करने जा रहा हूँ ।

कवि मित्र- ईमानदारी छोड़. यह तो फारसी शब्द है और अपनी पेशा भी छोड़ दो क्योंकि यह भी फारसी शब्द है ।

सरकारी कर्मचारी- बिदकते हुए शोर मचाते हुए बोला तो क्या जमालगोटा खाकर साहब को बोल दू कि शूल हो गया है?

कवि मित्र- ज्यादा शोर मचा मचाओ, आप शोर भी नहीं मचा सकते, क्योंकि शोर  भी विदेशी (फारसी) शब्द है, जमालगोटा भी नहीं खा सकता । यह भी विदेशी (पश्तो भाषा) का शब्द है  और हाँ! साहब को यह मत बोल देना कि मुझे हैजा हो गया है. क्योंकि हैजा भी विदेशी (अरबी) शब्द है और हाँ ! आप बीमार का बहाना भी नहीं बना सकते, क्योंकि बीमार शब्द भी विदेशी (फारसी) शब्द है ।

अन्त में सरकारी कर्मचारी खिझते हुए- अच्छा ! मैं सरकारी कर्मचारी तो हूँ न!

कवि मित्र- नहीं ! आप सरकारी कर्मचारी भी नहीं हो सकते, क्योंकि सरकारी शब्द भी विदेशी (फारसी) शब्द है ।

सरकारी कर्मचारी गुस्से से- हवालात जा रहा हूँ।

कवि मित्र- नहीं श्रीमान, आप हवालात  नहीं जा सकते, क्योंकि वह भी अरबी शब्द है । वहां जाओंगे तो वहाँ पर डंडे से स्वागत करने वाला बैठा हुआ दरोगा भी विदेशी है, क्योंकि दरोगा तुर्की शब्द है ।

 

सरकारी कर्मचारी निराश होते हुए बोला, "अब क्या करूँ?"

 

कवि मित्र- हमारा देश वसुधैव कुटु्म्बकं में विश्वास रखता है । देश भक्त का मतलब किसी भाषा या इन्सान से भेदभाव करना नहीं होता। हमने समय-समय पर सभी को अपनाया है ।

इसलिए जोर से बोलो पुरा विश्व हमारा परिवार है इस परिवार के सभी सदस्य को उचित सम्मान देगें ।

 

Photo: Thanks to google

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हम भारत के लोग



कोरोना से मरे हुए लोग,

थे हम भारत के लोग,

 

ऑक्सीजन की कमी से मरे

हुये कोरोना के मरीज,

थे हम भारत के लोग,

 

दवा की कमी से मरे

हुये कोरोना के मरीज,

थे हम भारत के लोग,

 

विधुत शवगृह के आगे,

लगी कोरोना से मरे

लोगों की लाशों की कतारें,

थे हम भारत के लोग,

 

श्मशान घाट पर जलते हुए,

कोरोना मरीज की लाशे,

थे हम भारत के लोग,

 

गंगा नदी के बालू में दफनाये

गये कोरोना से मरे लोग,

थे हम भारत के लोग,

 

गंगा नदी में तैरते हुए

कोरोना से मरे लोगों की लाशे,

थे हम भारत के लोग,

 

 

हम भारत के लोगों को

गर्व था,

अभिमान था,

उम्मीद थी,

अपनी सरकार पर,

अपनी सिस्टम पर,

अपनी भगवान पर,

 

वे हमें बचा लेंगे,

जैसे धर्म और संस्कृति की रक्षा

के लिए बना

मठाधिश शंकराचार्य,

आज बचा रहे धर्म और संस्कृति को,

 

मठाधीश बाबा,

राम मंदिर बनाकर

करोड़ों लोगों की रक्षा

कर रहे...

 

हम भारत के लोगों

की रक्षा करना जिनकी ईबादत है,

मृत्यु के मुँह से,

खिच लाना

जिनकी आदत है,

 

 

वे व्यस्त थे,

चुनाव में, कुम्भ में,

क्योंकि पुनः लाशों के

ढेर पर फिर

वहाँ कोई मंदिर

बनाना था।

 

फिर लाशों के

ढेर  पर

कोई मंदिर बनाना था।

 

 फोटोः संभार गूगल.


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कोरोना माता




आखिर कब खत्म होगी,
भांति-भांति और 
नाना प्रकार की
माता गढ़ने की होड़।
जब हर इंसान को
जन्म देने वाली
"माता" होती ही है।
इंसान का जन्म
इंसान ही देती है,
यह सार्वभौम सत्य हैं,
इंसान का जन्म
कोई जानवर, पशुपक्षी
भूखंड या कोई वायरस
जन्म नहीं देता।
तो फिर गाय माता,
भारत माता और
और अब नई माता
"कोरोना माता" को अवतार
लेने की जरूरत क्यों?
किसी चीज की,
पवित्रता अपनी जगह 
हो सकती है लेकिन
दूसरी माता के सत्कार
के चक्कर में,
अपनी जन्म देने वाली
माता को उचित 
सेवा-सत्कार देकर
वृद्धाश्रम जाने से
कब रोकेंगे हम?


फोटोः www.dainikbhaskar.com से संभार..