02 June, 2021

दो जून की रोटी



भूख मिटाने
के लिये
रोटियां सब की
जरूरत होती है।

कोई मेहनत
करके
पाता है
दो जून की
रोटी,
तो
कोई मेहनत
करने वालों
की पेट काटकर
हासिल करता है
हजारों 
दो जून की रोटी
की कीमत

इसी अंतर को
किताबों में
नौकर-मालिक,
गरीब-अमीर,
और
मजदूर और पूँजीपति
कहा जाता है।
लेकिन
किताबों तक
न पहुँचने
वाला इंसान
इस किताब की
भाषा कैसे
समझे?

         © जेपी हंस





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10 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 03-06-2021को चर्चा – 4,085 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

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  2. धन्यवाद सर, बिल्कुल उपस्थित रहूंगा।

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  3. किताबों तक
    न पहुँचने
    वाला इंसान
    इस किताब की
    भाषा कैसे
    समझे? - एक यक्ष प्रश्न .. पाषाण युग में भी हो .. शायद ...
    नमन आपको ...

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    1. हौसलावर्धक हेतु शुक्रिया...अभी वे पाषाण युग में ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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  4. वाह।अति सुंदर रचना

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  5. Bahut sundar kavita.

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  6. बहुत ही मर्मस्पर्शी और यथार्थपूर्ण सृजन ।समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी भ्रमण करें आपका हार्दिक स्वागत है ।

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    1. अपने अमूल्य टिप्पणी से हौसला बढ़ाने के लिए आभार...

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