21 December, 2014

पप्पू का घड़ी


क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब सोता हूँ तो,
उठने का समय बताती है घड़ी ।
जब उठता हूँ तो,
स्कूल जाने के समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब खेलता हूँ तो,
घर वापस जाने की याद दिलाती है घड़ी ।
जब घर आता हूँ तो,
टीवी देखने की याद दिलाती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब टीवी देखता हूँ तो,
पढ़ने का समय बताती है घड़ी ।
जब पढ़ता हूँ तो,
दोस्तों से मिलने का समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब दोस्तों से मिलता हूँ तो,
माँ की याद दिलाती है घड़ी,
कि जल्दी घर आना ।
पर जब  घर पहुँचने में लेट होती है,
माँ डाँट सुनाती है , सोचता हूँ
काश ये घड़ी न होती ।
चैन से सोता ।
चैन से उठता ।
चैन से खेलता ।
चैन से टीवी देखता ।
चैन से पढ़ता ।
                  जे.पी. हंस






18 December, 2014

भोजपुरी का शेक्सपीयर-श्री भिखारी ठाकुर


बिहार के प्रसिद्ध गवइया श्री भिखारी ठाकुर का नाम शायद कौन नहीं जानता ? यह गवइया के साथ-साथ प्रसिद्ध नाटककार, गीतकार, कवि, भाषासेवी, लोक कलाकार, रंगकर्मी, लोक जागरण के संदेशवाहक, नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के उद्घोषक, लोकगीत एवं भजन कीर्तन के अनन्य साधक थे । इनका जन्म 18 दिसम्बर, 1887 ई. को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर (दियारा) गॉव में एक नाई परिवार में हुआ था । उनके पिता जी का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता जी का नाम शिवकली देवी था । वे एक गरीब परिवार से थे । बचपन में ही जीविकोपार्जन के लिए गॉव छोड़कर खड़गपुर चले गए । वहाँ उन्होंने काफी रूपया-पैसा कमाया, किन्तु वे अपने काम से संतुष्ट नहीं रहते थे । रामलीला में उनका मन लग गया था, इसके चलते ही वे अपने गॉव आकर एक नृत्य मण्डली बनाया और रामलीला खेलने लगे । इसके साथ ही वे गाना-गाते एवं सामाजिक कार्यों से जुड़े । उनकी पढ़ाई-लिखाई 30 वर्ष की उम्र में हुआ, इससे पहले वे अपने पुश्तैनी काम नाई का कार्य करते थे । इसके साथ ही उन्होंने नाटक, गीत और पुस्तकें लिखना भी आरम्भ किया । इनके पुस्तके की भाषा बहुत सरल होती थी, जिसके चलते ही बहुत लोग उनके तरफ आकृष्ट हुए । उनके द्वारा लिखे गए नाटक है- विदेशिया, भाई-विरोध, पुत्रवध, विधवा-विलाप, गवर-घिचोर, बेटि बेचवा, बिरहा-बहार, राधेश्याम-विहार, कलियुग-प्रेम । इसने भोजपुरी भाषा को जन-जन तक पहुँचाने में अहम योगदान दिया, जिसके कारण इन्हें भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा जाता है । इनका निर्धन 10 जुलाई सन् 1971 को हुआ था । यह हिन्दी के लिए दुर्भाग्य की बात है कि इस महान लोक कलाकार को भोजपुरी का शेक्सपीयर तो कहती है पर इनको साहित्य में पहुच से दूर रखा गया है ।




17 December, 2014

इंसाफ-ए-पेशावर













वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
थी इतनी छोटी सी उम्र ।
 किया क्या था उसने जुर्म ।
अगर जुर्म उसने नहीं किया  ।
क्यों फिर ऐसा बदला लिया ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
पढ़ रहा था पाठ जीवन में,
इंसानियत और सच्चाईयों का ।
फिर क्या समझकर तुने,
तरफदारी किया बुराईयों का ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
कर दिया उनको किनारा,
सच्चाईयों की राह से ।
दरिंदों को मजबुती मिली है,
बुराईयों की स्याह से ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
अगर सियासत में खोट है,
तो क्या करेंगा ये चाँद तारा ।
सोचा था हमने एक दिन,
लाएंगे अमन और भाईचारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
ये जमीं है तेरी,
ये वतन है तेरा ।
इस तन पे लिपटे,
कफन भी है तेरा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
एक दिन निकलना था,
घर-गली से बैंड-बाजा ।
उन्हीं गलियों से आज,
क्यों निकला है जनाजा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
मरने के बाद भी इंसानियत जज्बा हमारा,
बुराईयों का नाश ही है शपथ हमारा ।
हिम्मत और इंसानियत भरी हो,
अगर देना इस धरती पर जन्म दूबारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
                         जे.पी.हंस



श्रद्धांजली (पेशावर स्कूली हमला में मारे गये बच्चों पर)










क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
माता-पिता ने उनको,
प्यार-दुलार से पाला-पोसा ।
कितनी भी की गलती उसने,
फिर भी ऐसा नहीं कोसा ।
इतनी कठोर न होता,
दिल-ए-पाषाण को  ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
कोमल-सी थी बदन उनके ।
कमल-सी थी नयन उनके ।
वाणी थे जैसे मिठे रस ।
मिठे रस को न पिलाकर,
क्यों छोड़ दिया उस नौजवान को ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
सीख रहे थे पाठ वे,
प्रेम, शांति और भाईचारे के ।
तोड़ना था तारे उनको,
पहुँचना था चाँद पे ।
ऐसे सपने को तोड़कर,
ला दिया क्यों शमशान पे ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
                 जे.पी.हंस





16 December, 2014

मजदूर का बच्चा













पुस की  कुँहरे भरी सुबह ।
एक अनजान बालक से मिला ।
आते ही उसने,
सादर प्रणाम किया ।
था वह बेहद खुश ।
लेकिन मैं सकुचाया ।
फिर भी अपनी संस्कार समझकर ।
हमने अभिवादन स्वीकार किया ।
अनजान बालक को देखकर ।
मन में हिलोड़ पैदा होने लगा ।
हिलोड़ भी ऐसी, जो थी
काफी बेजोड़ ।
सोचा-खैर छोड़ो
अपना कार्य करना था
सो अपने कार्य में लगा
मैने सोचा-
आखिर होगा इसी गाँव का
जिस गाँव गया था मैं ।
था वह एक दलित बस्ती ।
केवल एक प्राथमिक विद्यालय,
पक्की सड़क के किनारे,
बाकी थी सपनों की कश्ती ।
फिर भी विचार और व्यवहार से,
उसके वार्तालाप में खो गया ।
बात ही बात में कुछ पूछा  ।
लेकिन न पूछ सका माँ-बाप का नाम ।
कौन है यह बालक ।
अद्भुत, अदंभ है जिसमें साहस ।
अंत में वह अपने घर लाया ।
पहले तो सकुचाया ।
फिर गया
तब पहचान में आया
वह था मेरे गाँव के मजदूरनी का बच्चा ।
टूटी-फूटी घर ।
बिखरे सामान
लेकिन थे बड़े सपने
नए तराने ।
शायद इस उम्र में ,
मैंने भी ऐसे सपने नहीं देखे ।
मजदूरनी हमारे गाँव में,
खेती-बाड़ी में कार्य करता था ।
था वह जाना पहचाना ।
उसने अपने बच्चे के बारे में
बताया था मुझे,
पर कभी देखा था नहीं, नहीं सोचा भी था
कि होगा ऐसा साहसी बच्चा ।
बिना कहे ही उसने, खुशी-खुशी
अपने सारे प्रमाण-पत्र लाकर दिखाया ।
मैंने भी हौसले, इरादे और धैर्य को बढ़ाया
समझाया, बताया ।
उसके माँ के दिल में था सपना ।
मेरा लाडला एक दिन
इस गरीबी से छूटकारा दे ।
मजदूरी करके भी
दो बेटे और एक
बेटियों को पढ़ाना ।
आज के महंगी की दौर में
कैसी टेढ़ी खीर है ?
फिर भी अजीब हिम्मत वाली थी वह
खुद फटेहाल रहकर भी,
लाडले को होनहार चाह रही थी ।
कैसी होती है माँ जो लाख
कष्ट सहकर भी
पुत्र के सपने साकार करती है
धन्य है वह माँ...धन्य है...
                         जे.पी.हंस