21 December, 2014

हिन्दी के साथ अन्याय का पत्र देश के नीति-नियंता के नाम

 सेवा में,
1. महामहिम राष्ट्रपति, भारत सरकार, नई दिल्ली
2. माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली
3. राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, नई दिल्ली
4. मानव संसाधन एवं विकास मंत्री, भारत सरकार
5. क्षेत्रीय निर्देशक, कर्मचारी चयन आयोग, नई दिल्ली
महोदय,
निवेदनपूर्वक आपका ध्यान इस विषय की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ जिससे हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अनुचित व्यवहार ही नहीं, वरन राष्ट्रीय अपमान भी हो रहा है । महोदय, कर्मचारी चयन आयोग, जिसका मुख्यालय सीजीओ कम्पलेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली में है । जिसकी देश भर में चार-पाँच क्षेत्रीय शाखाएं है । वह देश भर के लिए कर्मचारियों की भर्ती करती है । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रति वर्ष आशुलिपिक हिन्दी ग्रेड-डी और ग्रेड-सी की भर्ती की जाती है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस आशुलिपिक हिन्दी के पद की भर्ती के पाठ्यक्रम में हिन्दी से एक भी प्रश्न तक पूछा नहीं जाता है । इसके पाठ्यक्रम है- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक । क्या यह हिन्दी भाषी छात्रों को इस पद पर बहाली से दूर रखने का कही षड्यंत्र तो नहीं ? या वे अन्य भाषा को बढ़ावा देना चाहते है? क्या वे हिन्दी दिवस पर केवल गोष्ठियाँ और सप्ताह मनाकर अपने कर्तव्य की ईतिश्री नहीं कर रहे हैं ? क्या यह हिन्दी का अपमान नहीं है कि हिन्दी आशुलिपिक की भर्ती किये जाए और उसमें एक भी प्रश्न हिन्दी से पूछे नहीं जाए ? क्या यह बेहतर नहीं होता कि हिन्दी और अंग्रेजी आशुलिपिक दोनों पद के लिए पाठ्यक्रम में हिन्दी-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक होता । या हिन्दी आशुलिपिक के हिन्दी-100, अंग्रेजी आशुलिपिक के लिए अंग्रेजी-100 और दोनों के लिए सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक हो ।
साथ ही साथ इस तरफ भी ध्यान आकृष्ट करूँ कि कर्मचारी चयन आयोग देशभर में मैंट्रिक लेबल परीक्षा, इन्टर लेबल परीक्षा और स्नातक लेबल परीक्षा आयोजित करती है, लेकिन यहाँ हिन्दी भाषा के साथ इतना भेदभाव है कि इनमें से किसी भी लेबल के परीक्षा में एक भी अंक हिन्दी भाषा से जुड़े प्रश्न नहीं होते हैं । क्या यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ अन्याय नहीं है कि केन्द्रीय भर्ती बोर्ड द्वारा इस तरह के भेदभाव किए जाए और उसके नाक के तले बैठे हमारे नीति-नियंता चुपचाप देखते रहे ? क्या केवल हिन्दी दिवस पर देशभर में गोष्ठियाँ और हिन्दी-सप्ताह मनाने से राष्ट्रभाषा अपने मुकाम तक पहुँच सकती है, इस बात पर विचार किया जाए ।
कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली कुछ परीक्षाएं और उनके पाठ्यक्रम इस प्रकार हैः-
मैट्रिक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-अंग्रेजी-50 अंक
इन्टर स्तरीय
पद- क्लर्क, डाटा इन्ट्री ऑपरेटर प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट
इन्टर स्तरीय
पद- आशुलिपिक हिन्दी व अंग्रेजी प्रथम परीक्षा- अंग्रेजी-100 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक
द्वितीय परीक्षा-शॉर्टहैंड का टेस्ट
स्नातक स्तरीय प्रथम परीक्षा-गणित-50 अंक, सामान्य अध्ययन- 50 अंक, रिजनिंग-50 अंक, अंग्रेजी-50 अंक
द्वितीय परीक्षा गणित-100, अंग्रेजी-100
तृतीय परीक्षा-टाईपिंग टेस्ट व इंटरभ्यू (पदानुसार)
अतः इस संबंध में भारतवर्ष के एक नागरिक होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि भारतीय संविधान में उल्लेखित हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की अस्मिता और गरिमा को बरकरार रखने हेतु आपका ध्यान दिलाऊँ । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा संचालित उपरोक्त परीक्षाओं के पाठ्यक्रमों में हिन्दी को शामिल करें, ताकि राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास हो, हिन्दी का उत्थान हो, हिन्दी भाषियों के साथ न्याय हो ।
                                                                                                  आपका भारतवासी,
                                                                                                  जयप्रकाश नारायण
                                                                                                ग्राम-दनियाला (पश्चिमी)
                                                                                                     डाकघर- शादीपुर
                                                                                                   जिला-अरवल (बिहार)
                                                                                          ईमेल- jpn.nsu@gmail.com
                                                                                 ब्लॉग- www.jphans.blogspot.com 




पप्पू का घड़ी


क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब सोता हूँ तो,
उठने का समय बताती है घड़ी ।
जब उठता हूँ तो,
स्कूल जाने के समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब खेलता हूँ तो,
घर वापस जाने की याद दिलाती है घड़ी ।
जब घर आता हूँ तो,
टीवी देखने की याद दिलाती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब टीवी देखता हूँ तो,
पढ़ने का समय बताती है घड़ी ।
जब पढ़ता हूँ तो,
दोस्तों से मिलने का समय बताती है घड़ी ।
क्या चैन लेने देती है घड़ी
सोचता हूँ, नहीं! नहीं!
जब दोस्तों से मिलता हूँ तो,
माँ की याद दिलाती है घड़ी,
कि जल्दी घर आना ।
पर जब  घर पहुँचने में लेट होती है,
माँ डाँट सुनाती है , सोचता हूँ
काश ये घड़ी न होती ।
चैन से सोता ।
चैन से उठता ।
चैन से खेलता ।
चैन से टीवी देखता ।
चैन से पढ़ता ।
                  जे.पी. हंस






18 December, 2014

भोजपुरी का शेक्सपीयर-श्री भिखारी ठाकुर


बिहार के प्रसिद्ध गवइया श्री भिखारी ठाकुर का नाम शायद कौन नहीं जानता ? यह गवइया के साथ-साथ प्रसिद्ध नाटककार, गीतकार, कवि, भाषासेवी, लोक कलाकार, रंगकर्मी, लोक जागरण के संदेशवाहक, नारी विमर्श एवं दलित विमर्श के उद्घोषक, लोकगीत एवं भजन कीर्तन के अनन्य साधक थे । इनका जन्म 18 दिसम्बर, 1887 ई. को बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर (दियारा) गॉव में एक नाई परिवार में हुआ था । उनके पिता जी का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता जी का नाम शिवकली देवी था । वे एक गरीब परिवार से थे । बचपन में ही जीविकोपार्जन के लिए गॉव छोड़कर खड़गपुर चले गए । वहाँ उन्होंने काफी रूपया-पैसा कमाया, किन्तु वे अपने काम से संतुष्ट नहीं रहते थे । रामलीला में उनका मन लग गया था, इसके चलते ही वे अपने गॉव आकर एक नृत्य मण्डली बनाया और रामलीला खेलने लगे । इसके साथ ही वे गाना-गाते एवं सामाजिक कार्यों से जुड़े । उनकी पढ़ाई-लिखाई 30 वर्ष की उम्र में हुआ, इससे पहले वे अपने पुश्तैनी काम नाई का कार्य करते थे । इसके साथ ही उन्होंने नाटक, गीत और पुस्तकें लिखना भी आरम्भ किया । इनके पुस्तके की भाषा बहुत सरल होती थी, जिसके चलते ही बहुत लोग उनके तरफ आकृष्ट हुए । उनके द्वारा लिखे गए नाटक है- विदेशिया, भाई-विरोध, पुत्रवध, विधवा-विलाप, गवर-घिचोर, बेटि बेचवा, बिरहा-बहार, राधेश्याम-विहार, कलियुग-प्रेम । इसने भोजपुरी भाषा को जन-जन तक पहुँचाने में अहम योगदान दिया, जिसके कारण इन्हें भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा जाता है । इनका निर्धन 10 जुलाई सन् 1971 को हुआ था । यह हिन्दी के लिए दुर्भाग्य की बात है कि इस महान लोक कलाकार को भोजपुरी का शेक्सपीयर तो कहती है पर इनको साहित्य में पहुच से दूर रखा गया है ।




17 December, 2014

इंसाफ-ए-पेशावर













वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
थी इतनी छोटी सी उम्र ।
 किया क्या था उसने जुर्म ।
अगर जुर्म उसने नहीं किया  ।
क्यों फिर ऐसा बदला लिया ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
पढ़ रहा था पाठ जीवन में,
इंसानियत और सच्चाईयों का ।
फिर क्या समझकर तुने,
तरफदारी किया बुराईयों का ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
कर दिया उनको किनारा,
सच्चाईयों की राह से ।
दरिंदों को मजबुती मिली है,
बुराईयों की स्याह से ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
अगर सियासत में खोट है,
तो क्या करेंगा ये चाँद तारा ।
सोचा था हमने एक दिन,
लाएंगे अमन और भाईचारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
ये जमीं है तेरी,
ये वतन है तेरा ।
इस तन पे लिपटे,
कफन भी है तेरा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
एक दिन निकलना था,
घर-गली से बैंड-बाजा ।
उन्हीं गलियों से आज,
क्यों निकला है जनाजा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
मरने के बाद भी इंसानियत जज्बा हमारा,
बुराईयों का नाश ही है शपथ हमारा ।
हिम्मत और इंसानियत भरी हो,
अगर देना इस धरती पर जन्म दूबारा ।
वो जन्म देने वाले,
क्यों बे-मौत दे डाला ।
तेरा ही सपूत था,
क्यों जीवन रौंद डाला ।
                         जे.पी.हंस



श्रद्धांजली (पेशावर स्कूली हमला में मारे गये बच्चों पर)










क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
माता-पिता ने उनको,
प्यार-दुलार से पाला-पोसा ।
कितनी भी की गलती उसने,
फिर भी ऐसा नहीं कोसा ।
इतनी कठोर न होता,
दिल-ए-पाषाण को  ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
कोमल-सी थी बदन उनके ।
कमल-सी थी नयन उनके ।
वाणी थे जैसे मिठे रस ।
मिठे रस को न पिलाकर,
क्यों छोड़ दिया उस नौजवान को ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
सीख रहे थे पाठ वे,
प्रेम, शांति और भाईचारे के ।
तोड़ना था तारे उनको,
पहुँचना था चाँद पे ।
ऐसे सपने को तोड़कर,
ला दिया क्यों शमशान पे ।
क्यों ढाते को कहर ईश्वर,
अबोध इंसान पर ।
                 जे.पी.हंस