23 March, 2016

हमारा नया वर्ष आया है ।

आत्मीयता का विश्वास लेकर ।
मधुरता का पैगाम लेकर ।
दरिद्रता का अन्न लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
            नवजीवन में मुस्कुराहट लेकर ।
            खिले मन सा सुमन लेकर ।
            वनिता का सिंदूर लेकर ।
            भाई-भाई का प्रेम लेकर ।
            आज धरा पर आया है ।
            हमारा नया वर्ष आया है ।
विषम समाज की समता लेकर ।
दीर्घायू जनतंत्र की कामना लेकर ।
झगड़े-फसाद का कवच लेकर ।
अक्षय भंडार का वसुंधरा लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
            नव रश्मि में उजाला लेकर ।
            निर्बल का निराकरण लेकर ।
            धवल नवल सा प्रभात लेकर ।
            चेहरे का चमकी मुस्कान लेकर ।
            आज धरा पर आया है ।
            हमारा नया वर्ष आया है ।
सुरक्षा का सुदृढ़ आधार लेकर ।
मधुर बंधुत्व का विस्तार लेकर ।
आतंकी हमले से मुक्ति का प्रचार लेकर ।
अमन-चैन का उपहार लेकर ।
आज धरा पर आया है ।
हमारा नया वर्ष आया है ।
              -जेपी हंस



20 March, 2016

होली आई रे होली आई ।

होली आई रे होली आई ।
पहला होली उनका संग मनाई।
जो गिर पड़े है पउआ चढ़ाई।
पकड़ के उनका ऐसा नली मे गिराई।
जिसका गंध कोई न सह पाई।
होली आई रे होली आई ।
दूजे होली उनका संग मनाई।
जो फ़ूहड़ फ़ूहड़ दिन-रात गाना बजाई।
बहू-बेटी देखकर सीटी बजाई।
पकड़ के उनका ऐसा बंदर बनाई।
जिसका रूप मां-बाप न पहचान पाई।
होली आई रे होली आई ।
तीजे होली उनका संग मनाई।
जो रंग के नाम पर करते है लड़ाई।
पकड़ के उनका सतरंगी बनाई।
सतरंगी रूप मे आब समझ जाइ।
होली आई रे होली आई ।
चौथे होली उनका संग मनाई।
जिनका आपसे कभी नाता न रहाई।
पकड़ के उनका रंग-अबीर लगाई।
प्रेम,सद्भाव से प्रीत बधाई।
होली आई रे होली आई ।
पंचम होली उनका संग मनाई।
जो राग-द्वेष छोड़ गले लगाई।
पकड़ के उनका रंगोली बनाई।
जिसके प्रेम से भेदभाव मिट जाइ।
होली आई रे होली आई ।
                    -- जेपी हंस

शायरी

ये दुनिया ये महफिल बड़े काम का है।
मेरे टेबल पर रखा दवा जुकाम का है ।
खा न लेना दिल के दर्द का दवा समझकर,
ये मत समझना की तेरे जन्नत-ए-इंतजाम का है।
                                -- जेपी हंस

18 March, 2016

जयप्रकाश नारायण पर दिनकर की कविता



ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?

ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
किस तरह ठोकरे खाकर पाषाण की तरह हूँ खड़ा ।
आँधी आई, तुफान आया, फिर भी घुट-घुट कर हूँ पड़ा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाजिमी सोच-सोच में अभी मैं जिंदा हूँ ।
बातों को सुन-सुन के कातिल की तरह शर्मिदा हूँ ।
गर्दिश-ए-शर्मिंदगी को कैसे भगाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
सोचते है वे मैं लगता नाजूक सी कली हूँ ।
पर आँधियों के बीच मोम की तरह जली हूँ ।
जलती हुई मोम को कैसे बुझाऊं जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
हालात मेरे ऐसे है जैसे खुन से लथपथ काया ।
देखकर फिर भी न खुली किसी की निर्भिक माया ।
उनके निर्भिक काया को कैसे समझाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
बड़ी जतन से इस तन-मन को किसी ने है पाला-पोसा ।
भले अरमान की खातिर किसी अपने वारिश-ए-कमान सौपा ।
उनके अरमान को कैसे भूल जाऊँ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
वो ठोकरे मारता रहा मैं ऊँची सीढियाँ चढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों का आया कारवाँ फिर भी बढ़ता गया ।
कंटिली झाड़ियों में उन्हें उलझा सकता था जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?
लाख ठोकर खाया फिर भी न किया उनका विरोध ।
उनके ही कुशल कृत्यों से हमने किया नया शोध ।
मेरे ही शोध पर उनके घर जगमगाऐ जरा ।
ऐ जिंदगी तुझे कैसे बताऊँ जरा ?