24 November, 2016

जमशेदपुर कवि सम्मेलन

दोस्तों, कल मैं एक कवि सम्मेलन में गया था,वहां कवि सम्मेलन के पोस्टर में कवि सम्मेलन की जगह कवि सम्म लेन लिखा हुआ था. इस बात की जानकारी जब मैं सम्मेलन के अध्यक्ष महोदय को दी तो यह गुस्सा बैठे तो मैंने भी मौके का तड़का देख खड़का दिया जो इस प्रकार हैं....
अपनी बातों को वे येन- प्रकारेण कह बैठे,
सम्मेलन को वे सम्म लेन कह बैठे ,
मंच पर जो बैठे थे कविवर मित्र,
दाढ़ी देख कर उन्हें भी लादेन कहां बैठे..
इतनी बातों पर पुनः झुंझला गए..जो मैंने इस प्रकार बया किया...

इतनी सी बातों से परेशानी होने लगी,
सुन सुन के मुझे भी हैरानी होने लगी,
उलझ पड़े वो हमसे इस तरह,
  बातों ही बातों में पहलवानी होने लगी...

30 October, 2016

दीपावली के बधाई संदेश...

मेरी दुआ है कि यह पवित्र त्योहार आपके जीवन में उत्साह, खुशियाँ, शांति और प्यार से सदा के लिए आपके जीवन को भर दे!
यह उत्साह वाला पल आपके जीवन को खुशियों से भर दे और दीपों की रोशनी सा आपका जीवन चमक उठे और आपकी सभी तमन्नाएं और सारे सपने पूरे हों!
शुभ दीपावली!

28 October, 2016

दिवाली नहीं आते।

लगे है वाइ-फाई जबसे​ ​तार भी नहीं आते​​;​​
​बूढी आँखों के अब मददगार भी नहीं आते​​;​​
​​गए है जबसे शहर में कमाने घर के छोरे;​​
​​उनके घर में त्यौहार भी नहीं आते।
नोट: जो पर्व-त्योहार में भी अपने माँ-बाप, दादा-दादी से भेट करने नही जाते, उनको समर्पित।
#बेसहारा_माँ
#बूढ़ी_दादी
अंत में, सभी को शब्द क्रांति की तरफ से हार्दिक शुभकामनाये।

18 September, 2016

धरा की जननी कौन है?


विवश है आज धरा पर नारी,
अपनी अस्मत बचाने को ।
रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
पल-पल उन्हें सताने को ।
मुद्दे जघन्य है जर्रा-जर्रा पर,
कर्तव्यवान जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव !
धरा की जननी कौन है ?
पैरों तले लूट जाती इज्जत,
फैलती आसमां तक दूषित विचार ।
धिक्कार है जन्मना उस धरा पर,
जहाँ होती नारी का अपमान ।
छाई है चर्चा देश-दुनिया में,
नेतृत्व जन क्यों मौन है ?
अब बताओं हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?
भूल गया क्या तु मानव,
धरा पर तुझको किसने लाया ।
तन-बदन पर पीड़ा सहकर,
कतरा-कतरा रक्त किसने बहाया ।
चर्चा है हर घर-चौपाल पर,
पास-पड़ोस जन क्यों मौन है ?
अब बताओ हे मानव,
धरा की जननी कौन है ?
रोती बिलखती गर्भस्थ गृह से ही,
अपनी जिंदगी बचाने को।
तड़पनी पड़ती है नव मास तक,
हर नारी को जनमाने को ।
रूह कराहती तब जर्रा-जर्रा में,
पुरूषत्व कहाँ अब मौन है ।
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?
कर ऐसी कारीगरी मानव,
मन से कर तु साक्षात्कार ।
भक्षक भक्ष कर, रक्षक रच कर,
नारी का कर सत्कार ।
चर्चे है हर जिह्वा-जिह्वा पर,
तरूणमन क्यों मौन है ?
अब बताओ है मानव,
धरा की जननी कौन है ?

12 September, 2016

हिंदी भाषा का इतिहास और विकास


हिन्दी मूलतः फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित । हिन्दी शब्द की उत्पति सिन्धु-सिंध से हुई है, क्योंकि ईरानी भाषा में को बोला जाता है । इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है । कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी हिंद से हिन्दी शब्द बना ।
      आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है, वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है । आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत हैं, जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी । वैदिक भाषा में वेद, संहिता एवं उपनिषदों-वेदांत का सृजन हुआ है । वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी, जिसे लौकिक संस्कृत कहा जाता है । संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है । अनुमानतः 8वीँ शताब्दी ई.पू. में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था । संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये । वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, अश्वघोष, भारवी, माघ, भवभूति, विशाख, मम्मट, दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है । इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है । संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते 500 ई.पू के बाद तक काफी बदल गई, जिसे पाली कहा गया । महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया । यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही ।
      पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे प्राकृत की संज्ञा दी गई । इसका काल पहली ई. से 500 ई. तक है । पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषाये-पश्चिमी, पूर्वी, पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी, जिन्हें मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, ब्रांचड़ तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है ।
      आगे चलकर प्राकृत भाषाओं के श्रेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषाये प्रतिष्ठित हुई । इनका समय 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है । अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यतः दो रूप मिलते है-पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानतः 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ । अपभ्रंश से ही हिंदी भाषा का जन्म हुआ । आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है-
अपभ्रंश-                  आधुनिक आर्य भाषा तथा उपभाषा
पैशाची-                  लहंदा, पंजाबी
ब्रांचड़-                   सिन्धी
महाराष्ट्री-                 मराठी
अर्धमागधी-               पूर्वी हिन्दी
मागधी-                   बिहारी, बंगला, उड़िया, असमिया
शौरसेनी-                  पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी गुजराती

      उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि हिंदी भाषा का उद्भव अपभ्रंश के अर्धमागधी, शौरसेनी और मागधी रूपों से हुआ है ।