19 April, 2020

बहुत याद आती है तेरी


 

   डियर ऑफिस बहुत याद आती है तेरी

वो ऑफिस पहुँचकर

सबको दुआ-सलाम करना,

बगल में लगे,

माँ सरस्वती को चरण स्पर्श करना,

आई.टी.बी.ए पर वर्क करना,

कितना अच्छा लगता था न ।

 

पानी की बोतल उठाकर,

गटक-गटक कर पीना,

कभी कैंटीन निकल जाना,

चाय ऑफि में रहते हुए भी,

बाहर जाकर चाय पीना,

कितना अच्छा लगता था न ।

 

फिर दोस्तों के साथ लंच

करते-करते

गप्पे करना

काम के लिए,

कभी उस साहब के पास,

तो कभी इस साहब के

 पास जाना ।

कितना अच्छा लगता था न ।

-    जेपी हंस


हाँ, मैं मजदूर हूँ न !



भारतीय मजदूर,

सदियों से शोषित,

वर्षों से पीड़ित रहने वाला,

कभी जमींदारों के गुलाम,

कभी पूजीपतियों के गुलाम,

गुलामी ही जिसका नसीब

वहीं जंजीर हूँ न !

हाँ, मैं मजदूर हूँ न !

 

बंजर खेतों को उपजाऊं बनाकर,

हरे-भरे फसल लहराकर,

मोटे-मोटे अन्न उपजाने वाला,

मालिकों का पेट भरकर,

भुखे पेट सोने वाला

वहीं बदनसीब

भूखा पेट सुलाने,

परिवार को आतुर हूँ न !

हाँ, मैं मजदूर हूँ न !

 

 

वोटो के समय,

नोटों के गड्डियों से

तौला जाने वाला,

जीतने के बाद,

पर्वत सी,

झूठी वादे सुनकर

अपने रहमोकरम पर रहकर,

जीने वाला,

हादसे का

 कब्रिस्तान हूँ न !

हाँ, मैं मजदूर हूँ न !

 

फैक्ट्री मालिकों के

फिर से गुलाम बनकर,

बात-बात में भठियों में

फेकने की गालियां

सहने वाला,

पगार काटने की धमकी,

सहते-सहते

पत्थर दिल बनने वाला,

वाला इंसान हूँ न !

हाँ, मैं मजदूर हूँ न !

 

 

तपती धूप में

पत्थर तोड़ने वाला,

सर्द दिनों में कम कपड़ों

में रात-दिन एक कर

कम्पनी का उत्पादन

बढ़ाने वाला,

मेहनतकस काम

के पक्के उसूल

हूँ न!

हाँ, मैं मजदूर हूँ न !

 

पापा पेट को भरने,

घर-गाँव-दुआर छोड़कर

शहर आने वाला

वक्त-बे-वक्त अपने

रहमोकरम पर रहकर,

झुठे ढाढस दिलाये जाने वाला

 बदस्तूर हूँ न !

हाँ, मैं मजदूर हूँ न !

        -जेपी हंस

 

 


05 April, 2020

हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।



 

हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।

जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।

वक्त भी उसकी रहमत करेगी जो खुद डरे,

वरना कायामत को आये कोरोना को पूरा मानता हूँ ।

 

हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।

जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।

 

 

मैं ईश्वर को मानता हूँ, तुम अल्लाह को मानते हो ।

बढ़े वैसे कदम जहाँ, हर शख्स को जानता हूँ ।

फिर छलके न आँसू किसी आफत पर

वैसे आँसु को अधुरा मानता हूँ ।

 

हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।

जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।

 

मैं मंदिर में फँसा हूँ, वे मस्जिद में छिपे हैं ।

हजारों सालों से यही दकियानुसी दलदल में धसे हैं ।

चले करने जिस करामात को, हर करामात जानता हूँ ।

करे ऐसे करामात जो उसे बेहुदा मानता हूँ ।

 

हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।

जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।

 

कुछ धर्म का नशा पिलाते हैं, कुछ मर्म का नशा पीते हैं ।

पिलाकर नशा वे बड़े खुशगहमी में जीते हैं ।

उसके हर एक खुशगहमी को मैं कुराफात मानता हूँ ।

ऐसे करने वाले हर शख्स को जानता हूँ ।

 

हर उस जमात को मैं बुरा मानता हूँ ।

जो कर न सके खुद की हिफाजत, अधुरा मानता हूँ ।

                        -जेपी हंस

 

 

 

 

 

 


26 March, 2020

कैद में मौज

यू ही खाली नहीं है दूर-दूर की सड़कें,
कोरोना का खौफ सब के जेहन में है।
कल जो एक-दूसरे को कत्ल को उतारू थे,
वे भी कोरोना के डर से घर में कैद है।

यू तो नहीं देखा ऐसा बंदी किसी जमाने में।
शहर-दर-शहर बंद है इंसान को बचाने में।
तकलीफ होती है घर पर रहकर बर्तन मांजने में,
टूटने दो लॉकडाउन, देखना, कितनी भीड़ जुटती है पउआ के दुकानों पे।

आशिको के जख्मों का हिसाब कौन करेगा।
निठल्ला बैठा हूँ घर पे हाल-ए-बया कौन करेगा।
इस लॉकडाउन में रिचार्ज के दुकान भी बंद है,
होती थी दिन भर बातें बिन-बात के कौन मरेगा।
                                -जेपी हंस

07 March, 2020

इतनी आसानी से तो मै तुझे भूला भी नहीं सकता।



खो भी नहीं सकता तुझे और पा भी नहीं सकता।
किस कशमकश में उलझा हूँ तुझे बता भी नहीं सकता।
छुपा भी नहीं सकता और बता भी नहीं सकता।
है कितना दर्द सीने में किसी को बता भी नहीं सकता।
हर मोड़ पर टकराएगी तुझसे यादें मेरी
इतनी आसानी से तो मै तुझे भूला भी नहीं सकता।

बड़ी शिद्दत से चाहा था मैंने तुझे,
इतनी आसानी से तो भूला नहीं सकता।
चाहे तेरा प्यार झूठा था,
पर मेरे सच्चे प्यार का तू कर्ज कभी चुका भी नहीं सकता।
तेरे दिल में बोझ बनकर रहूंगा।
तेरे याद में हर रोज बनकर रहूंगी।
जिंदगी से तो निकाल दिया मुझे पर दिल से कभी निकाल नहीं पाओगे।
जब दर-बदर तुझे भी धोखे मिलेंगे
तो तू खुद भी संभाल भी नहीं पाएगी।
जैसे मुझे चुप कर दिया करता था,
अब तू मेरे तरह किसी और को समझा भी नहीं सकता
इतनी आसानी से तो मैं तुझे भुला नहीं सकता।

चाहे कुछ भी कह देते है
पर दिल से आज भी तेरे खुशियों की दुआ मांगते है।
अब तो हम अपना हाल-ए-दिल किसी को सुना भी नहीं सकता।
पर इतनी आसानी से तो मैं तुझे भुला भी नहीं सकता। 
                                        -गूंज चांद